शुगर और किडनी जैसी बीमारियों से जूझ रहे आम लोगों के लिए वरदान बना ‘नेफ्रोप्लस’

बैंगलोर आधारित तीन इंजीनियरों कमल शाह, संदीप गुडीबंदा और विक्रम वुप्पाला किया शुरूवर्ष 2009 में हैदराबाद में शुरू होने वाले ‘नेफ्रोप्लस’ के अब 14 राज्यों के 34 शहरों में हैं डायलिसिस केंद्रमधुमेह और किडनी की अन्य पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिये साबित हो रहे हैं वरदान आने वाले दिनों में पूरे देश सहित समूचे एशिया का सबसे बड़ा डायलिसिस नेटवर्क बनने का है लक्ष्य

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डायलिसिस एक बेहद महंगा उपचार है..... अगर आपने जीवन बीमा करवा रखा है या फिर सरकार से आपको ईलाज के लिये रियायत मिल पा रही है तो ठीक है वर्ना यह इसकी कीमत इतनी अधिक आती है कि एक प्रभावी उपचार करवा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। मुंबई किडनी फाउंडेशन द्वारा करवाये गये एक अध्ययन के मुताबिक भारत में लगभग 950 नेफ्रोलाॅजिस्ट होने के अलावा 7 हजार डायलिसिस सेंटर और 4 हजार डायलिसिस करने वाली मशीनें मौजूद हैं। हालांकि यह अध्ययन करीब 6 वर्ष पूर्व करवाया गया था। इस सबके बावजूद डायलिसिस करनावे में आने वाली कठिन परिस्थितियां अब भी जस की तस ही हैं और स्थायी रूप से किडनी से संबंधित स्थाई और पुरानी बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की स्थिति तो और भी बद्तर है। वर्ष 2009 में अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान और स्वास्थ्य मंत्रालय के शोध में यह तथ्य प्रकाश में आया था कि सीकेडी विकसित होने की स्थिति में पहुंचने वाले 2 लाख 30 हजार मरीजों में से 90 प्रतिशत से अधिक की मृत्यु ईलाज के कुछ महीनों के भीतर ही हो जाती है।

यह संख्या किसी भी रूप में भारतीयों के लिये शुभ संकेत नहीं है विशेषकर वर्ष 1990 के बाद से तो मधुमेह (मुख्यतः टाईप 2) से ग्रस्त मरीजों की संख्या में ही 123 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है। सीधे और सरल शब्दों में बात की जाए तो भारत तेजी से नाकाम होते दिल और गुर्दों का देश बनता जा रहा है जिसके कई कारण हैं जिनमें से एक हमारी बिगड़ती हुई जीवनशैली है।

वर्ष 2009 में कमल शाह, संदीप गुडीबंदा और विक्रम वुप्पाला ने हैदराबाद में एक उच्च गुणवत्ता वाले एक डायलिसिस नेटवर्क ‘नेफ्रोप्सल’ की स्थापना की। विक्रम कहते हैं, ‘‘मैंने वर्ष 1999 में आईआईटी खड़गपुर से स्नातक करने के बाद 10 वर्षों का समय अमरीका में बिताया। अमरीका में अपने पिछले कुछ वर्षों के प्रवास के दौरान मैं न्यूजर्सी स्थित मैंक्किंसे एंड कंपनी के साथ रणनीतिक सलाहकार के रूप में कार्यरत था। मैंने उसी दौरान फैसला कर लिया था कि मैं जल्द ही भारत लौटकर स्वास्थ्यसेवा से संबंधित एक उद्यम प्रारंभ करूंगा।’’ विक्रम देख रहे थे कि भारतीय बहुत तेजी से उच्चरक्तचाप और मधुमेह की चपेट में आते जा रहे हैं और वे विशेषकर इन्हीं बीमारियों से संबंधित ईकोसिस्टम का एक हिस्सा बनकर कुछ सकारात्मक करना चाहते थे। विक्रम बताते हैं कि उस समय भारत में 65 मिलियन लोग मधुमेह और 140 मिलियन लोग उच्चरक्तचाप की बीमारियों से पीडि़त थे। इस क्षेत्र में जारी अपने शोध के दौरान उनकी मुलाकात एप्पल साॅफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे एक कैमिकल इंजीनियर कमल शाह से हुई। शाह वर्ष 1997 में हीमोलिटिक यूरेमिक सिंड्रोम से ग्रस्त पाये जाने के बाद से पिछले 12 वर्षों से निरंतर डायलिसिस पर थे। इस बीमारी के बारे में पता चलने के बाद से शाह अपनी डायलिसिस सत्रों के मध्य के जीवन को लगातार एक ब्लाॅग के माध्यम से व्यक्त कर रहे थे। विक्रम आगे कहते हैं, ‘‘जब मैं अमरीका में था तब मैं लगातार फोन के माध्यम से उनके संपर्क में रहता था। उनकी एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है। वर्तमान में वे पिछले 18 वर्षों से डायलिसिस पर हैं। इसके बावजूद वे रोज सुबह उठते हैं और तैराकी करते हैं, हर महीने यात्रा करते हैं और पूर्णकालिक रूप से काम करते हैं।’’ ऐसे लोगों को जो इस महंगे उपचार को वहन करने में असमर्थ हैं और उनके जीवन में खुशियां वापस लाने के उद्देश्य से शाह, विक्रम और संदीप ने ‘नेफ्रोप्लस’ की नींव रखने का फैसला किया। सौभाग्य से यह तीनों ही बैंगलोर के रहने वाले इंजीनियर है और पूर्व से ही कैंसर के मरीजों की देखभाल करने वाले सामाजिक संगठनों के साथ जुड़े भी रहे हैं।

नैफ्रोप्लस के संस्थापक विक्रम वुप्पाला, संदीप गुडीबंदा और कमल शाह
नैफ्रोप्लस के संस्थापक विक्रम वुप्पाला, संदीप गुडीबंदा और कमल शाह

‘‘हमने हैदराबाद से प्रारंभ करने का फैसला किया क्योंकि हम शुरू में अपने गृहनगर के आसपास रहना चाहते थे। इसके बाद हमनें कई केंद्रो को चलाने का अनुभव लेने के इरादे के साथ शहर में ही एक अन्य केंद्र खोलने का फैसला किया।’’ यह इनके लिये अपने गृहनगर से धीरे-धीरे दूर जाते हुए अन्य स्थानों पर भी केंद्र खोलने का एक अभ्यास सरीखा था। ‘‘हालांकि प्रारंभिक दौर में सबकुछ इतना आसान नहीं रहा और हमें भी निगरानी, स्टाफ और इन्वेंट्री से संबंधित कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। अस्पतालों से निबटने और नेफ्रोलाॅजिस्टों के साथ साझेदारी का काम जटिलताओं से भरपूर था और उस दौर में हमने छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ना प्रारंभ किया। इसके बाद हमने अपना विस्तार बैंगलोर, चेन्नई, पुणे, नोएडा, रोहतक, बोकारो, नालगोडा ओर कानपुर सहित देश के अन्य में करना प्रारंभ किया और वर्तमान में 14 राज्यों के 34 शहरों में हमारे केंद्र सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।’’

‘‘सांस्कृतिक मुद्दों और भिन्नताओं के बावजूद हमारा ध्यान मुख्यतः उच्च गुणवत्ता वाली पूर्णतः रोगी-केंद्रित देखभाल प्रदान करने पर है। हम लोग अपने काम के प्रति बहुत जुनूनी हैं और शायद इसीलिये हम सामने आने वाली चुनौतियों से आसानी से पार पाने में सक्षम होते हैं। लेकिन हैदराबाद में स्थित होते हुए उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में केंद्र को संचालित करना इतना आसान भी नहीं है। वास्तव में हमारे लिये उत्तर प्रदेश किसी दूसरे देश जैसा है और हमारे वहां पांच केंद्र सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं।’’

विक्रम कहते हैं कि महानगरों मे काम करना छोटे शहरों और कस्बों की तुलना में कहीं अधिक आसान है। ‘‘जब आप उत्तर प्रदेश के आगरा जैसे एक शहर का रुख करते हैं तो आपको टैक्स इत्यादि जैसे विभिन्न जटिल स्थानीय मुद्दों से भी दो-चार होना पड़ता है। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छोटे शहरों में अच्छे क्लीनिकल और प्रशासनिक कर्मचारियों को तलाशना एक बहुत गंभीर चुनौती साबित होता है। चूंकि वहां के अधिकतर लोग इस क्षेत्र में काम करना नहीं चाहते इसलिये हमें अच्छे कर्मचारियों को तलाशने और नौकरी पर रखने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ता है। हम अब भी इस चुनौती का सामना करते हैं। किसी भी शहर में अपना केंद्र खोलने से पहले हम ऐसे लोगों को तलाशने पर जोर देते हैं जो उसी शहर के रहने वाले हों। इसी वजह से मैं भी अमरीका से वापस अपने गृहनगर हैदराबाद आया।’’

चिकित्सीय दृष्टि से देखें तो डायलिसिस एक बिल्कुल सीधा काम है। ‘‘आप जापान या जर्मनी से तकनीक का आयात कर सकते हैं और भारत में सबके वितरक मौजूद हैं। लाईसेंस इत्यादि जैसे पहलुओं से निर्माता खुद निबटते हैं और इसके अलावा इन मशीनों में विकिरण से संबंधित भी कोई परेशानी नहीं है। इस वजह से इनसे संबंधित कानून भी इतने सख्त नहीं हैं। सिर्फ यह है कि करीब 7 लाख रुपये के करीब की कीमत के साथ यह मशीनें काफी महंगी पड़ती हैं।’’

विक्रम का कहना है कि इसके बावजूद ‘नेफ्रोप्लस’ सस्ती स्वास्थ्यसेवा प्रदान करने के लक्ष्य को सामने रखकर काम कर रहा है। उनका कहना है कि एक महंगा इलाज होने के बावजूद वे अपने मरीजों के लिये इसकी कीमतों को कम से कम रखने के लिये अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं। वे आगे कहते हैं कि चूंकि वे फिलहाल भारत के सबसे विशाल डायलिसिस केंद्र हैं और इस वजह से उनके लिये ऐसा कर पाना संभव हो रहा है। ‘‘यह हमें बेहतर तरीके से काम करने का मौका देने के अलावा गुणवत्ता में निवेश करने के अवसर भी प्रदान करता है। छोटे पैमाने पर खोले हुए केंद्रो के साथ आप ऐसी आजादी की कल्पना नहीं कर सकते।’’

इसी वजह से ‘नेफ्रोप्लस’ ने जितना संभव हो सके उतने अधिक से अधिक रोगियों को गंणवत्ता वाली डायलिसिस सुविधा उपलब्ध करवाने की दृष्टि से सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी में भी कदम रखा है। ‘‘हम सरकार के साथ काम करना जारी रखेंगे लेकिन यह एक कटु सत्य है कि वह प्रतिक्रिया देने के मामले में बहुत धीमी है। हम अपना ध्यान निजी क्षेत्र पर अधिक दे रहे हैं लेकिन सरकार के साथ जुड़ने के लिये हमेशा तैयार हैं। डायलिसिस बेहद महंगी प्रक्रिया है। अगर किसी को इसका भुगतान अपनी जेब से करना पड़े तो इसकी कीमत पहुंच से बाहर हो जाती है। ऐसे में सरकार की प्रतिक्रिया सकारात्मक होनपी चाहिये लेकिन अधिकतर ऐसा नहीं होता है।’’

‘नेफ्रोप्लस’ का अगला कदम अन्य एशियाई देशों में अपना विस्तार करने का है। ये आने वाले कुछ दिनों में खुद को इस क्षेत्र के सबसे बड़ा डायलिसिस नेटवर्क के रूप में स्थापित करना चाहेत हैं। इसके साथ ही साथ इनका इरादा विभिन्न सरकारों को किडनी संबंधित बीमारियों को गंभीरता से लेने के महत्व के बारे में जागरुक करना है। बीते कुछ दशकों के दौरान पूरे विश्व में चिकित्सा विज्ञान में बहुत तरक्की हुई है लेकिन साथ ही साथ वैश्विक स्वास्थ्य संकेतकों में गिरावट का भी दौर जारी है। चिरस्थायी बीमारियों का इलाज करवाना दिन-प्रतिदिन महंगा होता जा रहा है और ऐसे में ‘नेफ्रोप्लस’ एक ऐसे संस्थान के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं जो यह मानते हैं कि उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से आम इंसान की पहुंच में होनी चाहियें।