भीषण प्राकृतिक आपदा के बावजूद गुलाब की खेती से मालामाल हो रहे हैं उत्तराखंड के पहाड़ी किसान

गुलाब की खेती से महमहा उठे उत्तराखंड के पहाड़

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सन् 2013 की भीषण प्राकृतिक आपदा के बाद से लाखों लोगों के पलायन कर जाने के बावजूद उत्तराखंड के पहाड़ी किसान एक बार फिर जिंदगी की जद्दोजहद से उबरने लगे हैं। और इसका सबब बन रही है गुलाब की खेती। यहां के किसान गुलाब के फूल से कम, गुलाब जल और गुलाब के तेल से ज्यादा मालामाल हो रहे हैं। विदेशों तक गुलाबी उत्पादों का निर्यात हो रहा है।

सांकेतिक फोटो
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उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में गुलाब जल और गुलाब के तेल के अलावा फूलों का कारोबार भी दिल्ली तक का बाजार पकड़ने लगा है। पर्वतीय क्षेत्रों में फूलों की खेती परंपरागत खेती के बजाए ज्यादा मुनाफे की साबित हो रही है। इससे बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। दिल्ली, देहरादून, बरेली, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद आदि में यहां के गेंदा फूल की भी भारी मांग और खपत हो रही है।

तमाम प्राकृतिक झटकों और सरकारी उपेक्षाओं के बावजूद उत्तराखंड के किसान पलायन से जूझते हुए भी अब अपनी जमीन पर अपने पैर मजबूती से जमाने लगे हैं। इस आत्मनिर्भरता का सबब बन रही है गुलाब की खेती और फूलों से तैयार किया जा रहा गुलाब जल और गुलाब तेल, जिसकी आपूर्ति भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया तक निर्यात किया जा रहा है। चूंकि उत्तराखंड पर्यटक बहुल राज्य है, यहां दुनियाभर के विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं, उनमें से तमाम पर्यटक जोशीमठ के गांवों में जाकर मौके पर भी गुलाब जल और तेल खरीद रहे हैं। इस वक्त

जोशीमठ क्षेत्र में सैकड़ों किसान गुलाब की खेती कर रहे हैं। इसकी खेती कई रूपों में की जा रही है। यहां तक कि यह फसल सुरक्षा में भी काम आ रही है। किसान खेतों के किनारे गुलाब के पौधे रोप देते हैं, जिससे जंगली जानवरों से फसल बच जाती है। ये किसान गुलाब के फूलों से कुटीर उद्योग की तरह घर पर ही गुलाब जल और तेल तैयार कर बाजार से अतिरिक्त कमाई कर रहे हैं। क्षेत्र में गुलाब के किसानों के लिए आठ सगंध पौध केंद्र भी बने हैं, जिनमें गुलाब जल तैयार किया जा रहा है। इन केंद्रों की ओर से ही तैयार उत्पाद के विपणन के लिए पैकिंग सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।

गुलाब के उत्पादों का राज्य में लगने वाले मेलों में प्रचारित किया जाता है। इसके साथ ही बाहरी सौंदर्य प्रसाधन तैयार करने वाली कंपनियां भी सीधे यहां के किसानों से संपर्क साधने लगी हैं। गौरतलब है कि उत्तराखंड के इस सीमांत क्षेत्र जोशीमठ, चमोली आदि में गांवों की आबादी घटने से सरकार चिंतित है। इस बीच चमोली के पांच गांवों में किसान हर्बल गुलाब की सामूहिक खेती कर हजारों लीटर गुलाब जल तैयार कर ले रहे हैं और उसे ज्यादातर हाथोहाथ बेंच भी दे रहे हैं। गुलाब की खेती करने वाले गांवों के किसानों ने अपने यहां गुलाब जल बनाने की प्रोसेसिंग यूनिट आसवन संयंत्र भी लगा लिए हैं।

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जोशीमठ ब्लॉक के गांवों बड़गांव, मेरग, सुनील, परसारी और पगनों में सैकड़ों किसान लगभग दस हेक्टेयर क्षेत्रफल में गुलाब की खेती कर रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व यहां के किसानों ने सगंध पादप केंद्र की ओर से गुलाब की खेती के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। बाद में उन्हें समझ में आया कि गुलाब की खेती से उन्हें अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। उसके बाद सगंध पादप केंद्र पुनः उनकी मदद करने लगे। गांवों में आसवन संयंत्रों से भारी मात्रा में गुलाब जल तैयार किया जाने लगा। बाटलिंग कर हजारों लीटर गुलाब जल की आसपास के बाजारों में बिक्री होने लगी। गुलाब जल प्रति लीटर दो सौ रुपए तक में बिक जाता है। सबसे महंगा बिक रहा है गुलाब का तेल, जिससे बाजार में प्रति लीटर आठ लाख रुपये तक मिल जाते हैं। 

पिछले एक वर्ष में किसानों ने करीब 50 किलोग्राम यानी लगभग एक करोड़ चालीस लाख का तेल तैयार किया था। इस तरह यहां के किसानों को गुलाब के फूलों, गुलाब जल और गुलाब तेल से सालाना लाखों की आमदनी होने लगी हैं। यद्यपि यहां के गांवों में राजमा, चौलाई आदि कई तरह की नकदी फसलों का भी उत्पादन परंपरागत रूप से हो रहा है रहा है, यहां के किसान पर्वतीय ढलानों पर मुख्यतः गुलाबी बल्गेरियन रोज की खेती कर रहे हैं। एक बार गुलाब रोप दिए जाने के बाद ये डेढ़ दशक तक फूल देते रहते हैं। केमिकल इस्तेमाल न होने से ये गुलाब हर्बल माने जाते हैं। इसीलिए इनसे तैयार गुलाब जल और तेल महंगे दामों पर बिक रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जोशीमठ के ठंडे इलाके में तैयार किया जा रहा गुलाब का तेल ज्यादा बेहतर गुणवत्तापूर्ण है। इसका आस्ट्रेलिया के लिए निर्यात भी किया जा रहा है। बदरीनाथ धाम के यात्री यहां से भारी मात्रा में गुलाब जल खरीद कर ले जा रहे हैं।

कैलाश-मानसरोवर यात्रा मार्ग पर नारायण आश्रम के निकट स्थित जयकोट गांव में पहले सिर्फ आलू, राजमा की खेती होती रही है लेकिन अब गुलाब का उत्पादन यहां का मुख्य उद्यम बन चुका है। यहां तैयार हो रहे गुलाब जल का जब देहरादून स्थित लैब में परीक्षण कराया गया तो वह शत-प्रतिशत शुद्ध निकला। उसके बाद ही किसानों में गुलाब की खेती का रुझान तेज हो गया। अब किसान तरह तरह से अपने गुलाब जल की मार्केटिंग भी करने लगे हैं। महेंद्र सिंह, रुकुम सिंह, जमन सिंह, दलीप सिंह, बहादुर सिंह, दलीप सिंह बड़ाल, गोपाल सिंह कार्की आदि पहले मजदूरी से घर चलाते थे लेकिन अब उनकी जीविका पूरी तरह गुलाब के उत्पादन पर केंद्रित हो गई है।

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उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में गुलाब जल और गुलाब के तेल के अलावा फूलों का कारोबार भी दिल्ली तक का बाजार पकड़ने लगा है। पर्वतीय क्षेत्रों में फूलों की खेती परंपरागत खेती के बजाए ज्यादा मुनाफे की साबित हो रही है। इससे बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। दिल्ली, देहरादून, बरेली, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद आदि में यहां के गेंदा फूल की भी भारी मांग और खपत हो रही है। हार्टिकल्चर टेक्नालाजी मिशन योजना के तहत उद्यान विभाग की ओर से यहां के किसानों को फूलों की खेती के लिए अनुदान पर पाली हाउस और पुष्प रोपण सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। उद्यान विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस समय तराई भाबर और पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों सैलकुई, रामनगर, नयागांव, पहाड़पानी, कालाढूंगी, भीमताल आदि में 69.67 हेक्टेयर में अलग-अलग प्रजातियों के फूलों लिलियम, कारनेशन, ग्लैडूलस और गुलाब की खेती हो रही है। भीमताल और रामगढ़ क्षेत्रों में जगह-जगह पाली हाउस सीजनल फूलों पिटौनिया, पैंजी, सालविया से अटे रह रहे हैं। इनके पोटेट प्लांट की बाहर के महानगरों में मांग बढ़ती जा रही है। ये सैलानियों को भी खूब रिझा रहे हैं। वे भी इसे खरीद कर अपने साथ ले जाते हैं।

गुलाब जल बनाने के लिए तीन चीजों की अवश्यकता होती है- गुलाब की पंखुड़ियाँ, जल और बर्फ। इसके लिए एक ऐसा बर्तन लीजिये, जिसमें एक दूसरा बर्तन भी समां सके। अब इस बर्तन में एक स्टैंड रख दीजिये। दो ग्लास जल में लगभग 15 गुलाब के फूल की पंखुड़ियाँ डाल दीजिये। स्टैंड के उपर एक खाली बर्तन रखिये। अब इस बर्तन को आग के ऊपर, लगभग 20 से 25 मिनिट तक के लिए रखिये और गरम होने दीजिये। गरम होने पर यह भाप के रूप में ऊपर आएगा, लेकिन हमें इसे इक्कठा करने के लिए इस बर्तन के ऊपर एक उल्टा ढक्कन रखना होगा। इस ढक्कन पर बर्फ के टुकड़े रखें, जिससे यह भाप बाहर न निकले और ठंडी होकर उस खाली बर्तन में जल के रूप में इक्कठी हो। फिर इसे आग से हटाकर ठंडा होने दें। इस तरह गुलाब जल घर पर ही तैयार।

गुलाब की खेती वैज्ञानिक विधि से की जाय तो इसके बगीचे से लगभग पूरे वर्ष फूल प्राप्त किये जा सकते हैं। जाड़े के मौसम में गुलाब के फूल की छटा तो देखते ही बनती है। इसके एक फूल में पांच पंखुड़ियों से लेकर कई पंखुड़ियों वाली किस्में विभिन्न रंगों में उपलब्ध हैं। इनसे भारी मात्रा में गुलदस्ते, गजरा, बटन होल, गुलाब जल, इत्र एवं गुलकन्द उत्पादित हो रहे हैं। ठंड एवं शुष्क जलवायु गुलाब के लिए उपयुक्त होती है। गुलाब के लिए दोमट, बलुआर दोमट या मटियार दोमट मिट्टी जिसमें ह्यूमस प्रचुर मात्रा हो, उत्तम होती है। सोनिया, स्वीट हर्ट, सुपर स्टार, सान्द्रा, हैपीनेस, गोल्डमेडल, मनीपौल, बेन्जामिन पौल, अमेरिकन होम, गलैडिएटर किस ऑफ फायर, क्रिमसन ग्लोरी आदि गुलाब की प्रमुख किस्में हैं।

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भारत में मुख्यतः पूसा सोनिया प्रियदर्शनी, प्रेमा, मोहनी, बन्जारन, डेलही प्रिसेंज, नूरजहाँ, डमस्क रोज की खेती अन्य क्षेत्रों में हो रही है। व्यावसायिक स्तर पर खेती करने के लिए पांच-छह किलोग्राम सड़ा हुआ कम्पोस्ट, 10 ग्राम नाइट्रोजन, 10 ग्राम फास्फोरस एवं 15 ग्राम पोटाश प्रति वर्ग मीटर इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह गुलाब की खेती से 2.5 से 50 लाख पुष्प डंठल तक प्रति हेक्टर ऊपज प्राप्त हो जाती है। उत्तराखंड के इन फूलों की खेती और उनके उत्पाद की धमक आसपास के राज्यों तक होने लगी है। पड़ोसी हिमाचल से सटे होशियारपुर (पंजाब) के कांगर गांव में मनिंदर पाल सिंह रियार और मनजीत सिंह तूर पारंपरिक खेती छोड़कर गुलाब की खेती करने लगे हैं। वह भी गुलाब का रस बाजार में बेच रहे हैं। उन्होंने गुलाब जल और तेल निकालने का खुद का प्लांट लगा लिया है। इससे पहले दोनों ने अचार और सॉस बनाने के लिए आंवले के उत्पादन किया, जो कारगर नहीं रहा। 

हिमाचल के पालमपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोटेक्टनोलॉजी से तीन महीने का प्रशिक्षण लेने के बाद 25 एकड़ में गुलाब की खेती करने लगे। उनके खेतों में मुख्यतः आईएचबीटी की संकर किस्म बुल्गारिया रोज मिट्टी और जलवायु की दृष्टि से अनुकूल बैठे हैं। रोजाना इनके फूल एक कुंतल तक बिक जाते हैं। वह अपने गुलाब के रस या सत की जांच बेंगलुरु स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के फ्रेगरेंस एंड फ्लेवर डेवलपमेंट सेंटर की प्रयोगशाला में कराते हैं। रोजा डेमासेना की प्रति एकड़ करीब 800 से 1000 किलो पैदावार हो जाती है। पांच हजार किलो गुलाब से एक किलो गुलाब तेल निकल आता है। इस तरह एक लाख तक की उनकी कमाई हो जा रही है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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