भोजपुरी के कंठ-कंठ में गूंजते रहेंगे रामप्रकाश शुक्ल 'निर्मोही'

भोजपुरी के गौरव कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही नहीं रहे...

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भोजपुरी के गौरव कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही नहीं रहे। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के गांव कनैला में उनके साथ अंतिम काव्यपाठ किया था। तबके बाद कालांतर उनसे दूर-दूर रह कर बीता, और जब आज उनकी अंतिम विदाई की यह दुखद सूचना मिली, आंखें नम हो उठीं।

एक अत्यंत दुखद सूचना साझा करते हुए आज रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही के बहाने ये बातें हो रही हैं। भोजपुरी के गौरव कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही नहीं रहे।

जहां तक स्मृति साथ दे रही है, यह मेरे जीवन का रोचक-रोमांचक वाकया 1980 के आसपास का है। वह एक दिन मेरे अतीत में एक ऐसी घटना की तरह दर्ज हो गया था, जो आज भी भुलाए नहीं भूलता है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन के गांव कनैला (आजमगढ़) में आयोजित कविसम्मेलन में अन्य कवियों के बीच मैं भी उपस्थित था। मंच का संचालन कर रहे थे उस वक्त के ख्यात भोजपुरी कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही। मंच पर कुछ ऐसे कवि भी उपस्थित थे, जिनके शब्दों में कविता के नाम पर कुछ था ही नहीं, सिर्फ और सिर्फ तुकबंदी और अश्रुत आलापा। उस दिन उन चलताऊ तुक्कड़ों की रचनाएं मंच के ज्यादातर कवियों के गले नहीं उतरी थीं।

उस समय मैं भी युवा वय था, मन गुस्से से भर उठा। मैंने तय किया कि अब किसी कविसम्मेलन के मंच पर नहीं जाऊंगा। उसके बाद से आज तक उस संकल्प का निर्वाह करता आ रहा। यदा-कदा कभी किसी परिचित-सुपरिचित के विशेष आग्रह पर मंचों पर हो आता हूं लेकिन आज तो मंचों की हालत बद से बदतर हो चुकी है, जिस पर पूरा हिंदी जगत स्तब्ध सा है लेकिन करे क्या, बाजार के नवधनाढ्यों ने कविसम्मेलनों के मंचों को जोकरों और मदारियों के हवाले कर दिया है। ये सारी बातें प्रसंगवश हैं। एक अत्यंत दुखद सूचना साझा करते हुए आज रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही के बहाने ये बातें हो रही हैं। भोजपुरी के गौरव कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही नहीं रहे।

यह भी अजब संयोग रहा कि इस सरस्वती पुत्र ने लंबी बीमारी के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इलाज के दौरान वसंत पंचमी पर ही देह त्यागा। यद्यपि वह जिला आजमगढ़ के रहने वाले थे। छात्र जीवन में उनकी संगत में हमे बहुत कुछ सीखने को मिला था। उनके शब्द आज चार दशक बाद भी मन पर छाए रहते हैं। एक वक्त था जब भोजपुरी अंचल के कविसम्मेलनों में उनकी सरस्वती वंदना बेसुध सी कर देती थी-

'धवल तोरी सरिया,
धवल असवरिया,
ओइसन धवल हमे ज्ञान दा,
माई हमे इहे वरदान दा....'
(हे सरस्वती मां, आपकी धवल साड़ी है, धवल सवारी है, उसी तरह का हमे धवल ज्ञान दें)
और दहेज पर उनकी ये पंक्तियां आज तक मन में समाई हुई हैं -
'जब से शादी औ बियाह दुकानदारी होइ गइल,
बेटी जनक के धनुष अइसन भारी होइ गइल'
(जब से शादी-ब्याह दुकानदारी हो गया, तब से बेटी जनक के धनुष की तरह भारी हो गई है।)

भोजपुरी अंचल के कविसम्मेलनों में उन दिनो कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही की कविताओं के एक-एक शब्द लोगों को मंत्रमुग्ध सा कर देते थे। शुक्ल जी उस समय चंडेश्वर (आजमगढ़) में श्रीदुर्गाजी महाविद्यालय के बीएड विभाग के हेड हुआ करते थे। कॉलेज से समय निकालकर वह प्रायः आजमगढ़, बलिया, वाराणसी, गोरखपुर, जौनपुर, गाजीपुर आदि आसपास के जिलों में आयोजित होने वाले ज्यादातर कविसम्मेलनों में आमंत्रित हुआ करते थे। बाद में वह पूर्वांचल यूनिवर्सिटी से डीन के रूप में सेवानिवृत्त हुए। जैसी सहज-सहज मिठास लिए उनकी रचनाएं होती थीं, वैसे ही वह अपने स्वभाव से भी हर मुलाकाती को अपना अभिन्न बना लेते थे। जैसे, शुक्ल जी की यह 'जिंदगी की कहानी' कविता -

अँजुरी में भरल जइसे पानी।
जिनिगी क एतनै कहानी।
जिनिगी क चिट्ठी घूमैं शहरि-शहरिया
बचपन, जवानी, आ बुढ़ापा के मोहरिया
लगि-लगि पहुँचै ठेकानी।
सुख-दुख-हँसी-खुशी शादी-ब्याह-गवना
जिनिगी के मेला में बिकाला ई खेलवना
कीनि-कीनि खरची खटानी।
जिनिगी-पतंग के उड़ावै होनहरवा
एक दिन कटि बिखराई कागज-डोरवा
पाँचो तत्त लुटिहैं कमानी।
समय क समुंदर प्रान पानी भरल गगरी
कहियो फुटी त बिखराइ जाई सगरी
पनिया से मिलि जाई पानी।
कबहुँ घटावल करत कबो जोड़वा
बेटी के बियाहे जइसे बपई के गोड़वा
आइसे थकलि जिनगानी।

रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही भोजपुरी भाषा को एक दिशा देने के लिए लम्बे समय से कविता, नाटक, लघुकथा, गीत व निर्गुण के माध्यम से भोजपुरी भाषा वाले क्षेत्र में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान स्थापित की। तीन भाइयों में सबसे बड़े राम प्रकाश शुक्ल निर्मोही का नाम भोजपुरी काव्यधारा के प्रयोगधर्मी कवियों में शुमार है। उत्तरांचल के हैदराबाद देवारा गांव की उर्वरा भूमि में जन्म लेने के बावजूद निर्मोही ने अपनी शिक्षा व साहित्य में रुचि व कड़ी मेहनत के दम पर समाज में इतना ऊंचा मुकाम हासिल किया कि वहां तक विरले ही पहुंच पाते हैं। पिछले 10 महीनों से वह गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। 

'आजमगढ़ का इतिहास' उनका आखिरी लेख था। भोजपुरी गौरव सम्मान से सम्मानित किए जा चुके निर्मोही जी एक नहीं, साहित्य की कई विधाओं में सिद्धहस्त थे। वह कवि, पत्रकार, उपन्यासकार, कहानीकार के अलावा फिल्म इतिहास लेखन में भी ख्यात रहे। भोजपुरी सम्राट के नाम से मशहूर निर्मोही जी के निधन को जानकारों ने साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति माना है।

प्रयोगधर्मी कवि रामप्रकाश शुक्ल निर्मोही भोजपुरी अंचल के कवियों में पंडित श्यामनारायण पांडेय के सबसे प्रिय रचनाकारों में एक थे। पांडेय जी का उन्हें विशेष स्नेह प्राप्त था। अपने सधे भोजपुरी भाषा और कव्य से समूचे हिन्दी और भोजपुरी साहित्य में उन्होंने अतुलनीय सहभागिता को दर्ज कराया। वह भोजपुरी के मानो एक युग थे, जो सदा ही लोक जीवन में बने रहेंगे। उनकी कविताओं में स्त्री विमर्श की पीड़ा झलकती है। कवि हृदय के साथ साथ पत्रकारिता के क्षेत्र से भी उनका गहरा लगाव रहा। 

वह एक महान उपन्यासकार, कहानीकार एवं फिल्म इतिहास सहित अनेक क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग करते रहे। उनकी कृतियों में आजमगढ़ का इतिहास सहित कई पुस्तकों एवं शोध ग्रंथों का लेखन मशहूर है। उनके द्वारा लिखे गीत व नाटकों का मंचन जनपद के सभी कलाकारो ने किया है। एक समय था जब कला भवन के मंच पर इनकी आवाज गूंजती थी तो दर्शक तालियां बजाते थे लेकिन अब ना कलाभवन रहा, ना निर्मोही जी। यह जनपद के कला, साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल है। जब-जब इनके द्वारा लिखे गीत व नाटक मंचित किएं जाएंगे तब-तब याद आएंगे।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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