देह से अलग होकर भी मैं दो हूँ- भारत भूषण अग्रवाल

तारसप्तक के महत्वपूर्ण कवि भारतभूषण अग्रवाल की स्मृति दिवस पर विशेष...

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'जो लिख चुका, वह सब मिथ्या है, उसे मत गहो, जो लिखा नहीं गया, घुमड़कर भीतर ही रहा, वही सच है, जो मैं देना चाहता हूँ'....ये शब्द हैं 'तारसप्तक' के महत्वपूर्ण कवि भारतभूषण अग्रवाल के। आज उनका स्मृति-दिवस है। हिंदी साहित्य का यह भी एक चमत्कारिक वाकया हो सकता है, कि उनका जन्म तुलसी जयंती के दिन और निधन सूर जयंती के दिन हुआ था...

कहते हैं न, कि 'जहां नहीं पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि,' यह वैचित्र्य भारत भूषण अग्रवाल के निजी जीवन पर जितना सार्थक लगता है, उतना ही उनकी शाब्दिक प्रयोगधर्मिता में। उनके सृजन का मुख्य स्वर व्यंग्य रहा है। 

'तारसप्तक' के महत्वपूर्ण कवि भारतभूषण अग्रवाल की एक कविता की पंक्तियां हैं- ‘मैं जिसका पट्ठा हूं, उस उल्लू को खोज रहा हूं। डूब मरूंगा जिसमें, उस चुल्लू को खोज रहा हूं।’ 'भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार' से सम्मानित कवयित्री शुभम श्री की एक पुरस्कृत कविता 'पोएट्री मैनेजमेण्ट' की पंक्तियां हैं- 'कविता लिखना बोगस काम है! अरे फ़ालतू है! एकदम बेधन्धा का धन्धा! पार्ट टाइम! साला कुछ जुगाड़ लगता, एमबीए-सेमबीए टाइप मज्जा आ जाता गुरु! माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा, कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूंजीवाद विरोधी कविता, सेंसेक्स लुढ़का, चैनल पर चर्चा यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है, क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?'

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तो आजकल इस तरह भी कविताएं लिखी जा रही हैं। शुभम श्री को पुरस्कार भले 'भारतभूषण अग्रवाल' नाम से मिला हो, हिंदी कविता की ऐसी सच्चाई बिल्कुल नहीं है और प्रयोगवादी काव्यधारा के यशस्वी हस्ताक्षर भारतभूषण की काव्य-संपदा तो अपने शिल्प और भंगिमाओं में और भी विशिष्ट, सुपठनीय और अनूठी मानी जाती है। 'छवि के बंधन', 'जागते रहो', 'ओ अप्रस्तुत मन', 'अनुपस्थित लोग', 'मुक्तिमार्ग', 'एक उठा हुआ हाथ', 'अहिंसा', 'चलते-चलते', 'परिणति', 'प्रश्नचिह्न', 'फूटा प्रभात', 'भारतत्व', 'मिलन', 'विदा बेला', 'विदेह', 'समाधि' आदि उनके चर्चित शब्द-सृजन हैं। 'उतना वह सूरज है' कविता-संग्रह पर उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान मिला।

प. बंगाल से अपनी साहित्यिक यात्रा के प्रारंभिक मुखरता के साथ अग्रसर भारत भूषण अग्रवाल 1960 में साहित्य अकादमी के उपसचिव बने और अकादमी के प्रकाशनों तथा कार्यक्रमों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में अपना योगदान दिया। 1975 में वह शिमला के अध्ययन संस्थान के विजिटिंग फ़ेलो बने और मृत्युपर्यंत 'भारतीय साहित्य में देश-विभाजन' विषय पर शोध करते रहे। अपनी व्यंग्यमुखर प्रखरता के नाते उनकी रचनाएं जहां अपने समकालीनों से सर्वथा अलग प्रतीत होती हैं, वहीं आज भी वह उतनी ही प्रासंगिक हैं। वह साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखनरत रहे।

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उनके मरणोपरांत धर्मपत्नी बिंदु ने साहित्य अकादमी से प्राप्त 25 हज़ार की मामूली धनराशि से युवा कवियों के प्रोत्साहन के लिए वर्ष 1979 में 'भारतभूषण अग्रवाल' पुरस्कार शुरू किया था। अब तक यह पुरस्कार हिंदी के यशस्वी कवि-साहित्यकारों अरुण कमल, उदय प्रकाश, हेमंत कुकरेती, गगन गिल, बोधिसत्व, बद्रीनारायण, विमल कुमार, नीलेश रघुवंशी, गिरिराज किराडू, यतींद्र मिश्र, आर. चेतनक्रांति, गीत चतुर्वेदी, अनुज लुगुन आदि को प्राप्त हो चुका है। भारतभूषण अग्रवाल ने एक ओर 'फूटा प्रभात‚ फूटा विहान, बह चले रश्मि के प्राण‚ विहग के गान‚ मधुर निर्झर के स्वर झर–झर‚ झर–झर' जैसी शब्द-शब्द बोलती मधुरिम पंक्तियों का सृजन किया तो दूसरी ओर व्यंग्य-मुखर कविताओं से अपने साहित्य-समय का यथार्थ आपबीती में कुछ इस तरह रचा-

देह से अलग होकर भी मैं दो हूँ, मेरे पेट में पिट्ठू है।
जब मैं दफ्तर में साहब की घंटी पर उठता बैठता हूँ
मेरा पिट्ठू नदी किनारे वंशी बजाता रहता है!
जब मेरी नोटिंग कट–कुटकर रिटाइप होती है
तब साप्ताहिक के मुखपृष्ठ पर मेरे पिट्ठू की तस्वीर छपती है!
शाम को जब मैं बस के फुटबोर्ड पर टँगा–टँगा घर आता हूँ
तब मेरा पिट्ठू चाँदनी की बाहों में बाहें डाले
मुगल–गार्डन में टहलता रहता है!
और जब मैं बच्चे ही दवा के लिये
‘आउट डोर वार्ड’ की क्यू में खड़ा रहता हूँ
तब मेरा पिट्ठू कवि सम्मेलन में मंच पर पुष्पमालाएँ पहनता है!
इन सरगर्मियों से तंग आकर मैं अपने पिट्ठू से कहता हूँ
भाई, यह ठीक नहीं, एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं
तो मेरा पिट्ठू हँस कर कहता है- पर एक जेब में दो कलमें तो सभी रखते हैं!
तब मैं झल्लाकर आस्तीनें चढ़ाकर अपने पिट्ठू को ललकारता हूँ–
तो फिर जा, भाग जा, मेरा पिंड छोड़, मात्र कलम बनकर रहा!
और यह सुन कर वह चुपके से मेरे सामने गीता की कॉपी रख देता है!
और जब मैं हिम्मत बाँधकर, आँख मींचकर मुट्ठियाँ भींचकर
तय करता हूँ कि अपनी देह उसी को दे दूँगा
तब मेरा पिट्ठू मुझे झकझोरकर ‘एफीशिएंसी बार’ की याद दिला देता है!
एक दिखने वाली मेरी इस देह में दो 'मैं' हैं,
एक मैं, और एक मेरा पिट्ठू।
मैं तो खैर मामूली सा क्लर्क हूँ, पर मेरा पिट्ठू, वह जीनियस है!

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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