बॉलवुड ऐक्ट्रेस जूही चावला भी कर रहीं जैविक खेती, महिला किसानों के लिए बनीं प्रेरणा

इन दिनों देश की आधी आबादी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं मशहूर अभिनेत्री जूही चावला। वह पिछले सात साल से आर्गेनिक खेती के साथ ही इससे सम्बंधित प्रोडक्ट्स को भी बढ़ावा दे रही हैं...

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पूर्णिया की तीन लाख महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। बेंगलुरु की पद्मावती जैविक सब्जियों से हर महीने तीन लाख रुपए कमा रही हैं। महाराष्ट्र की मंजुला खुद हल-बैल चलाकर जैविक खेती कर रही हैं। अभिनेत्री जूही चावला भी ऑर्गेनिक सब्जियों और फलों की खेती कर रही हैं। जौनपुर की लालमनी, पुणे की सुजाता मिसाल बन गई हैं।

देश की पूरी आधी आबादी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं मशहूर अभिनेत्री जूही चावला। वह पिछले सात साल से आर्गेनिक खेती के साथ ही इससे सम्बंधित प्रोडक्ट्स को भी बढ़ावा दे रही हैं। वह वाडा (महाराष्ट्र) स्थित अपने फार्म हाउस में आर्गेनिक फूड्स की खेती भी करती हैं।

यह तो सचमुच आश्चर्यजनक है कि जीवन के हर क्षेत्र में अब महिलाएं इतनी तेजी से आत्मनिर्भर हो रही हैं। पूर्णिया (बिहार) में तो संगठित तरीके से लगभग तीन लाख महिलाएं आत्मनिर्भर हो चुकी हैं। उनमें कोई जागरूक किसान है, तो कोई कुशल व्यवसायी। उनकी कामयाबी देखिए कि पहले ही सीजन में उन्होंने मक्के का व्यापार एक करोड़ बीस लाख रुपए तक पहुंचा दिया, जिसमें शुद्ध मुनाफा हुआ साढ़े ग्यारह लाख। हर तरह की खेती, खुद का किचन गार्डन के अलावा वर्मी कंपोस्ट, मुर्गी पालन, पशुपालन क्षेत्र में जुटीं ये जागरूक किसान-कारोबारी महिलाएं करीब 22 हजार स्वयं सहायता समूहों में कार्यरत हैं। इसी तरह बेंगलुरु (कर्नाटक) की पदमावती ऑर्गेनिक सब्जियां बेचकर हर महीने तीन लाख रुपए कमा रही हैं।

नंदुरबार (महाराष्ट्र) के गांव वागशेपा की मंजुला संदेश पाडवी अपनी चार एकड़ जमीन में खुद हल-बैल चलाकर जैविक खेती कर रही हैं। सिरसा (हरियाणा) के गांव शहीदांवाली में आधा दर्जन से अधिक महिलाएं अपने घरों में वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाकर परिजनों को ऑर्गेनिक सब्जियां खिला रही हैं। जफराबाद (जौनपुर) के गांव कादीपुर की लालमनी किसानों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई हैं। इसी तरह पुणे की सुजाता नफड़े पॉश कॉलोनी में अपने घर के पिछवाड़े जैविक सब्जियों और फलों की खेती कर रही हैं। देश की पूरी आधी आबादी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं मशहूर अभिनेत्री जूही चावला। वह पिछले सात साल से आर्गेनिक खेती के साथ ही इससे सम्बंधित प्रोडक्ट्स को भी बढ़ावा दे रही हैं। वह वाडा (महाराष्ट्र) स्थित अपने फार्म हाउस में आर्गेनिक फूड्स की खेती भी करती हैं।

वह कहती हैं- 'मैं एक किसान हूं। मेरे किसान पिता ने 20 एकड़ ज़मीन वाडा में खरीदी थी। मुझे खेती के बारे में कुछ नहीं पता था। जब उन्होंने खेती योग्य जमीन में इन्वेस्ट किया, तब मैं एक अभिनेत्री के रूप में काफी व्यस्त थी और मेरे पास इस पर ध्यान देने के लिए समय भी नहीं था। उनकी मृत्यु के बाद मुझे इस सब पर कंट्रोल रखना पड़ा। एक बार आपको आर्गेनिक फल और सब्जियों का मीठा स्वाद मिल जाए तो आप कभी भी बाजार में मौजूद केमिकल्स युक्त प्रोडक्ट्स नहीं खरीदेंगे।' जूही के पास इस वक्त दो सौ से अधिक वृक्षों का एक बगीचा भी है, जिसमें चीकू, पपीता, अनार के पेड़ हैं। मांडवा में वह अपने दस एकड़ के एक और फार्म ऑर्गेनिक सब्जियां उगाती हैं। वही की आर्गेनिक सब्जियां उनके पति के रेस्‍टोरेंट में इस्‍तेमाल की जाती हैं।

बेंगलुरु में में पद्मावती सप्ताह के तीन दिन शुक्रवार से रविवार तक अपनी ऑर्गेनिक सब्जियों को इकट्ठा कर बाजार ले जाती हैं, या फिर उन्हें खरीदने के लिए ग्राहक उनके घर पर आते हैं। बेचने से पहले उनकी सब्जियों की क्वालिटी चेक होती है। वह पचास-साठ हजार की लागत से सब्जियां और ऑर्गेनिक दालें उगाकर बाजार में हर महीने दो-तीन लाख रुपये में बेच देती हैं। उनके पास होटल्स, अपार्टमेंट्स के अलावा कई जगहों से सब्जियों के सीधे ऑर्डर मिलते रहते हैं। इन माध्यमों की मांग के अनुरूप वह उत्पादन करती हैं। मंजुला सन्देश पाडवी अपनी किसानी की मेहनत से न केवल अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं, बल्कि एक दशक पहले पति के न होने के बाद से अकेले खुद की कमाई से अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर नौकरी के लायक बना दिया।

उनके पास चार एकड़ जमीन है। बचत समूह से कर्ज लेकर उन्होंने अपने खेत में मोटर पम्प भी लगा लिया है। सरकारी योजना में मिले पैसों से एक जोड़ी बैल भी खरीद लिया। वह मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिये केवल गोबर खाद का इस्तेमाल करती हैं। पुणे की सुजाता तो इस महानगर की एक नई मिसाल बन गई हैं। उनके पास न खेत है, न बगीचा, लेकिन वह खुद की उगाई जैविक फल-सब्जियों का अपने परिवार में इस्तेमाल करती हैं। जो बच जाता है, उसे बेच देती हैं। वह अपने घर के पिछवाड़े लगभग साढ़े तीन हजार स्क्वायर फीट की एक छोटी सी जगह में सिर्फ सूखे पत्तों की खाद, गोमूत्र, गुड़, छाछ, आटा का छिड़काव कर इस समय पचास तरह की सब्जियां और फल घोसावली, भोपला, करली, करंद, कंघारा, आलू, अरबी, अदरक, हलद, कापूस, पपई, द्राक्ष आदि पैदा कर रही हैं।

सिरसा (हरियाणा) के गांव शहीदांवाली में सुमन, कृष्णादेवी, माया देवी, सिमरण, सीमा, रेशमा और अनीता अपने घरों में वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाकर परिवार को ऑर्गेनिक सब्जियां खिला रही हैं। उसके साथ ही वे किसानों को मामूली दाम पर केंचुआ खाद भी बेचती हैं। उन्होंने ये काम शुरू करने से पहले कुरुक्षेत्र के सिकरी फार्म से केंचुआ खाद तैयार करने का प्रशिक्षण लिया था। पिछले साल से वह केंचुआ खाद से अतिरिक्त कमाई कर रही हैं। वे सुबह-शाम इस खाद के प्लांट में काम करती हैं। शुरुआत में उनको एचडीएफसी बैंक के सीएसआर कार्यक्रम के तहत सहयोग मिला था। जफराबाद (जौनपुर) में धर्मापुर विकासखंड के कादीपुर गांव की लालमनी मौर्या अपनी चार बीघे जमीन में वे शाक, भाजी, फल और औषधीय खेती कर रही हैं।

वर्ष 2005 में लखनऊ की कृषि प्रदर्शनी में उनकी फसल को प्रदेश का प्रथम सम्मान मिला था। लालमनी बक्सों और अटैचियों में केंचुआ पालकर उसकी खाद तैयार करती हैं। वह रासायनिक उर्वरक से कत्तई परहेज करती हैं। इससे उनके उत्पादन की पूरे जिले में हमेशा मांग रहती है। इन सभी आत्मनिर्भर एवं मेहनतकश महिलाओं का मानना है कि ज्यादा से ज्यादा फसल उगाने की होड़ में तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान के चक्र को प्रभावित कर रहा है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो रही है, वातावरण प्रदूषित हो रहा है, इसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के स्वास्थ्य में गिरावट आ रही है। इसलिए आज जैविक खेती को एक व्यापक कृषि आंदोलन के रूप में लिए जाने की जरूरत है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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