20 हज़ार शहीदों को यादों में ज़िन्दा रखने वाला देशभक्त सिक्युरिटी गार्ड

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कहा जाता है भूलना आमतौर पर एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन क्या है उन लोगों को भूल पाते हैं जो हमारे दिल के बहुत क़रीब होते हैं? क्या हम अपने परिवार के लोगों को कभी भूल पाते हैं जो हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं? शायद नहीं। पर क्या देश पर क़ुर्बान होने वाले सपूतों के बारे में सरकारें याद रखती हैं? ऐसा नहीं हो रहा कि हमारी यादाश्त लगातार कम होती जा रही है। पर एक ऐसा शख्स है जो पिछले 17 सालों से देश पर कुर्बान शहीदों के परिजनों को लिख रहा है चिट्ठियां। उनके पास लगभग 20,000 शहीदों का ब्यौरा है, जिनमें उनके नाम, यूनिट नंबर, उनका पता आदि विवरण मौजूद है। यही नहीं, उन्होंने शहीद हुए सैनिकों के परिवार को अब तक लगभग 3000 से भी ज़्यादा पत्र लिखा है ,जो शहीदों के सम्मान को संबोधित करते हैं। 

“मध्यम वर्गीय परिवार और सीमित आमदनी होने के कारण यह इतना आसान नहीं है। मेरा परिवार सोचता है कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन मैने भी यह दृढ-संकल्प कर लिया है कि जब तक सांस चलेगी, तब तक अपने शहीदों को याद करता रहूंगा। उनके परिवार को पत्र लिखता रहूंगा।"

ये अल्फ़ाज़ है 37 वर्षीय जितेंद्र सिंह के, जो सूरत के एक निजी फर्म में सुरक्षा गार्ड हैं। वह इस भावना के साथ देश भर में शहीदों के परिवारों का शुक्रिया अदा करने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं, ताकि श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। साथ ही उन्हें यह अहसास दिला सकें कि कोई है, जो उनके बारे में सोचता है। वह अपने पत्रों में स्वीकारते हैं कि अगर इस देश के नागरिक अमन चैन से हैं, तो उन शहीदों के वजह से हैं। मूलतः राजस्थान के भरतपुर जिले में कुटखेड़ा गांव के निवासी जितेंद्र ने अपने बेटे का नाम हरदीप सिंह रखा है। यह नाम जम्मू-कश्मीर में 2003 में आतंकवादियों से लड़ते शहीद हुए सैनिक हरदीप से प्रेरित है।

शहीदों के परिवार को खत लिखते हुए इस देश-भक्त को लगभग 17 साल हो चुके हैं। पोस्टकार्ड सहित अन्य खर्च भी वह अपनी जेब से ही करते हैं। उनको इन पत्रों के बदले में जवाब भी आते हैं, जो जितेंद्र के लिए किसी मुराद पूरी होने से कम नहीं है।

“मैं इन पत्रों को कारगिल युद्ध के समय से लिख रहा हूं। मुझे लगता है कि सेना में जाना कठिन काम है और यह देश का कर्तव्य है की उन शहीदों का सम्मान किया जाए, जिन्होंने हमारे लिए अपना जीवन बलिदान किया है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनों को खोने के बाद दुःख के काले बादल के साए में जी रहे हैं। हमें उन परिवारों के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए।”

एक शहीद के पिता ने मुझे एक बार कॉल किया था और उन्होंने मुझसे मिलने की इच्छा भी जताई थी। हालांकि, हम आज तक मिल नहीं सके, लेकिन मैं उन्हें आमतौर पर फोन करके यह याद दिलाता रहता हूं कि गुजरात में एक व्यक्ति है, जो आपके बेटे के बारे में सोचता रहता है।” जितेंद्र की यह पहल जरूर आंख खोलने वाली है।



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