देखभाल काफी नहीं, स्वावलंबी और समर्थ बनाना ज़रूरी

“न जाने कितनी मानवीय प्रतिभाएँ यूँ ही ज़ाया हो रही हैं क्योंकि इन बच्चों को विकसित होने और विकसित होकर समाज के उपयोगी सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाने का अवसर ही नहीं मिल पाता,” वैशाली पई

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“इन बच्चों की सामान्य सेवाओं और देखभाल पर तो बहुत पैसा खर्च किया जा रहा है जब कि ज़रूरत है, उन्हें अधिक से अधिक स्वावलंबी और समर्थ बनाने की, जिससे उनमें आत्मविश्वास पैदा हो और वे एक सामान्य व्यक्ति की तरह आज़ाद महसूस कर सकें और इस काम में ज़्यादा से ज़्यादा निवेश करने की,” तमाहार की संस्थापक और संचालक, वैशाली पई का कहना है। 

यहाँ ‘इन बच्चों’ से उनका तात्पर्य उन बच्चों से है, जिन्हें विशिष्ट प्रकार की देखरेख और सेवा की ज़रूरत है।

अपनी संस्था के ज़रिए उन्होंने अब तक बैंगलोर और पाली में, दो केंद्र खोले हैं, जहाँ शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है और उनके परिवारों की मदद की जाती है।

“हमारा मानना है कि बच्चों को सोचने, आत्मसात करने, फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने और अंत में, स्मरण रखने की शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है। यह उन बच्चों के लिए भी सही है, जो शारीरिक या मानसिक रूप से अशक्त हैं, जिनकी आवश्यकताएँ सामान्य बच्चों से भिन्न हैं और जिन्हें विशिष्ट सेवाओं और देखरेख की ज़रूरत है। अंतर सिर्फ इतना है कि इन बच्चों से उस तरीके से प्रश्न पूछे जाएँ कि वे उन्हें समझ सकें और फिर प्रतिक्रिया के लिए उन्हें पर्याप्त समय दिया जाए,” वह बताती हैं।

वैशाली जब 25 साल पहले मुंबई से बैंगलोर आईं तब उन्होंने अभी-अभी ‘आक्यूपेशनल थेरपी’ विषय में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी। “मैं इंदिरानगर स्थित कर्नाटक की मंदबुद्धि बच्चों की सोसाइटी (The Spastic’s Society of Karnataka) में काम करने लगी। मैं वहाँ से 19 किलोमीटर दूर रहती थी और मुझे तीन-तीन बसें बदलकर अपने काम पर पहुँचना पड़ता था। रोज़मर्रा की उन यात्राओं में मुझे बहुत से परिवारों से मिलने का मौका मिला, जो उन बच्चों के साथ, जो चल नहीं सकते थे या ठीक तरह से हिल-डुल भी नहीं सकते थे, लंबी-लंबी यात्रा करके, बड़ी मुश्किल से इलाज कराने वहाँ पहुँचते थे,” याद करते हुए उनका चेहरा करुणा से भर उठता है।

तभी उन्होंने आसपास के उपनगरीय और ग्रामीण इलाकों की सुविधा के लिए बैंगलोर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से, तमाहार में एक कार्यक्रम शुरू करने का निर्णय किया। उनके दिमाग में कार्यक्रम का एजेंडा स्पष्ट था: “मुझे लगता है, शहरी क्षेत्रों में सात किलोमीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 20 किलोमीटर के दायरे में एक सेंटर अवश्य होना चाहिए।“

कार्ययोजना

“जब हम इन बच्चों के साथ काम करते हैं तो हम उनके सम्पूर्ण मस्तिष्क से संवाद करते हैं, न कि हिस्सों-हिस्सों में कोई शब्द या शरीर की कोई गतिविधि सिखाते हैं,” वे बताती हैं।

विभिन्न उपचारों के नियमित हस्तक्षेप के अलावा हमारे शिक्षा कार्यक्रम के मूल में हमारा ज़ोर मनोरंजक गतिविधियों पर होता है। “कमरे में या उसके बाहर खेल हमारे पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि ये बच्चे खेलते हुए दूसरे बच्चों की गतिविधियों से ज़्यादा अच्छी तरह समझ-सीख पाते हैं। भले ही शारीरिक कमजोरी या विकलांगता की वजह से कुछ बच्चे स्वयं उन खेलों में भाग न ले सकें, वे दूसरों को खेलता देखकर रस प्राप्त कर सकते हैं, उल्लसित हो सकते हैं,” वे कहती हैं।

पाठ्यक्रम

विशिष्ट आवश्यकताओं वाले इन बच्चों के साथ एक बड़ी दिक्कत परिवार में उनकी भूमिका को लेकर होती है। तमाहार में बच्चों की माँओं, सहोदरों और दूसरे रिश्तेदारों के लिए विशेष कार्यक्रम उपलब्ध हैं: “हम विस्तारित परिवार के सभी सदस्यों के साथ समग्र रूप से चर्चा करते हैं और उन्हें भी भरसक शिक्षित करने का प्रयास करते हैं, जिससे मौका आने पर उन्हें भी बच्चे की स्थिति और उसकी समस्या के बारे में अच्छी तरह पता हो,” वैशाली कहती हैं। उनकी पक्की धारणा है कि इन विकलांग लोगों को समाज सहजता से अंगीकार कर सकता है और यह समझना गलत है कि वे सामान्य सामाजिक व्यवहार में फिट नहीं हो सकते।

बच्चों के जीवन में जो लोग भी शरीक हैं और लगातार संपर्क में रहते हैं, उन पर फोकस करना अत्यंत आवश्यक है। वैशाली ने हमें बताया कि “बहुत से अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा ‘सामान्य’ हो जाए लेकिन यह कोई विकल्प नहीं है।” फिर भी, वे आगे कहती हैं, “अभिभावक अगर अच्छी तरह समझ जाएँ कि उनके बच्चे की ज़रूरतें ठीक-ठीक क्या हैं तो वे बच्चे के सबसे अच्छे उपचारक बन सकते हैं।”

टीम

बच्चों के प्रति लगाव और सीखने की ललक, टीम के सदस्यों में ये दो योग्यताएँ होना आवश्यक है। 

वैशाली कहती हैं, "शैक्षणिक योग्यता हो तो बहुत अच्छा, मगर वह अनिवार्य नहीं है! शैक्षिक ज्ञान के मुकाबले काम के प्रति लगन, काम करने की क्षमता और काम की गुणवत्ता ज़्यादा मानी रखता है। कुछ ख़ास कामों, जैसे योग थैरपी, क्लीनिकल सायकॉलॉजी, संगीत थैरपी, फिजिओथैरपि या आर्गेनिक खेती आदि कामों में ही विशिष्ट शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता होती है। "

साध्यता और व्यवहार्यता

“हमें अपनी उपचार सेवाओं के सामर्थ्य और उनकी गुणवत्ता पर पूरा विश्वास है और इसलिए हर परिवार से हम एक निश्चित न्यूनतम फीस लेते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि मुफ्त सेवाओं को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाता,” वैशाली ने हमें बताया। 

यह फीस परिवार की आमदनी और उनके घरों से यहाँ तक की दूरी पर निर्भर करती है।

सभी चिकित्सा केंद्र पूरी तरह लोगों के चंदों और आर्थिक सहयोग पर निर्भर है और स्कूल-केंद्रों में इस्तेमाल की जाने वाली सभी वस्तुएँ वैशाली के परिवार की ओर से दान के रूप में प्राप्त होती हैं। वे कहती हैं, यह बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है मगर असंभव कुछ भी नहीं। आर्थिक रूप से भले ही ये केंद्र अभी पूरी तरह अपने पैरों पर खड़े नहीं हैं लेकिन प्रबंधन और व्यवस्थापन की दृष्टि से वे पूरी तरह स्वतंत्र हैं। "पहले ही मैं केंद्रों के दैनिक और कुछ प्रबंधकीय कार्यों से मुक्त हो चुकी हूँ," यह बताते हुए वैशाली इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि तमाहार संगठनात्मक रूप से इतना मजबूत हो चुका है कि मुखिया कोई भी हो, उसका काम सुचारू रूप से चलता रहेगा।

“हमारा काम अभी शुरू ही हुआ है और अभी गाँवों, कस्बों या द्वितीय, तृतीय श्रेणी के या और बड़े शहरों की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली बहुसंख्यक आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने का चुनौतीपूर्ण काम हमारे सामने पड़ा है। न जाने कितनी मानवीय प्रतिभाएँ यूँ ही ज़ाया हो रही हैं क्योंकि इन बच्चों को विकसित होने और विकसित होकर समाज के उपयोगी सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाने का अवसर ही नहीं मिल पाता,” वे कहती हैं।

विभिन्न तत्वों से बनी संवेदनशील संरचना

वैशाली विनम्रतापूर्वक बतलाती हैं कि उनके काम में असाधारण कुछ नहीं है। 

"यह कहना गलत होगा कि सारे बच्चे एक जैसे हैं या सबके साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए लेकिन बच्चे सदा बच्चे ही रहेंगे, चाहे वे अविकसित तंत्रिका से पीड़ित (neuro-typical) बच्चे हों, चाहे वे बच्चे हों, जिन्हें सिर्फ विशिष्ट उपचार की ज़रुरत है।"

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