तालीम के सहारे दूसरों के घरों को रौशन करने में जुटी हैं वाराणसी की 'नौशाबा'

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मुस्लिम महिलाओं के लिये वो किसी उदाहरण से कम नहीं हैं, उन्होंने ना सिर्फ अपनी जिंदगी संवारी बल्कि समाज की दूसरी महिलाओं को भी सशक्त बनाने का काम किया। मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा से जोड़ने और उनको अपने पैरों पर खड़े करने का जिम्मा भी वो बखूबी निभा रही हैं। नौशाबा समाज के उस तबके से हैं जहां पर लड़कियों को ना केवल शिक्षा देने बल्कि उन्हे घर से बाहर निकलने में भी टोका-टाकी होती है। ऐसे माहौल में रहकर भी नौशाबा ने खुद पढ़ाई लिखाई तो की ही बल्कि अपने साथ दूसरों को भी जोड़ने का काम किया।


वाराणसी की रहने वाली नौशाबा ने लाइब्रेरी साइंस में मास्टर्स किया है। पढ़ाई के दौरान इन्होंने महसूस किया कि जहां एक ओर इनके परिवार में शिक्षा पर काफी जोर दिया जाता था वहीं दूसरी ओर कई ऐसे मुस्लिम परिवार थे जो अपने बच्चों की शिक्षा पर ज्यादा महत्व नहीं देते थे। इसलिए वो समाज में दूसरों के मुकाबले पिछड़ रहे थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौशाबा एक स्कूल में पढ़ाने लगीं। इसी दौरान नौशाबा एक स्वयं सेवी संगठन के सम्पर्क में आई जो वाराणसी के मुस्लिम बहुल इलाकों में शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहा था। जब नौशाबा ने इस संगठन के साथ काम करने की इच्छा जताई तो संगठन के एक सदस्य ने उनसे कहा कि वो पढ़ी लिखी हैं और एक बड़े स्कूल में पढ़ाने का काम कर रही हैं, ऐसे में अगर वो उनके साथ जुड़ेंगी तो उनको ना सिर्फ पिछड़े इलाकों में जाना पड़ेगा बल्कि धूप में रहकर काम करना होगा और जरूरत पड़ने पर बच्चों को खुले आसमान के नीचे पढ़ाना होगा। लेकिन नौशाबा का इन बातों पर कोई असर नहीं हुआ। वो उन बच्चों को पढ़ाने के लिये तैयार हो गई जो कभी स्कूल नहीं गये थे।


नौशाबा ने योरस्टोरी को बताया,  

"मैं वाराणसी के पुराना पुल इलाके में गई। ये एक मुस्लिम बहुल बस्ती थी और यहां के हर घर में हथकरघे का काम होता था। छोटे छोटे लड़के लड़कियां साड़ियों और कपडों पर डिजाइन का काम कर रहे थे। यहां आकर मुझे पता चला कि इलाके के 95 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे स्कूल जाना तो दूर, स्कूल की दहलीज तक नहीं गये थे। मैंने वहां के लोगों को समझाया कि उनके बच्चों का पढ़ना कितना जरूरी है। इसके बाद वहां के लोगों से जो प्रतिक्रियाएं मिलीं उससे मैं दंग रह गई। वहां के लोगों ने ना सिर्फ बच्चों को पढ़ाने के लिए एक जगह दी बल्कि पहले ही दिन 160 बच्चों ने उनके पास अपना पंजीकरण कराया। इसके बाद बच्चों को पढ़ाने का दायरा धीरे धीरे बढ़ता गया।"


तब नौशाबा ने सोचा कि पढ़ाई के अलावा बड़ी लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े करने की जरूरत है। इसलिए उन्होंने पढ़ाई के साथ साथ सिलाई, कढ़ाई और ऑर्ट एंड क्रॉफ्ट की ट्रेनिंग देने का काम करना शुरू किया। इस तरह नौशाबा ने लगातार पांच साल तक बच्चों को पढ़ाने का काम किया। तब तक यहां के लोग भी समझ चुके थे कि बच्चों के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी है। नौशाबा बताती हैं कि इसके बाद यहां के लोगों ने उनकी देखरेख में इंटर तक का मदरसा तैयार किया और अपने बच्चों को वहां पर पढ़ाने के लिए भेजना शुरू किया। आज भी यहां के बच्चे कई बार अपनी परेशानियों को लेकर नौशाबा से मिलते हैं। नौशाबा अब तक 12सौ से ज्यादा लड़के लड़कियों को पढ़ा चुकी हैं।


आज नौशाबा मुख्य तौर से उन लड़कियों और महिलाओं के साथ जुड़ी हैं जो घर पर खाली रहती हैं। ये उनको कई तरह की ट्रेनिंग देती हैं ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसके अलावा जो अनपढ़ महिलाएं या लड़कियां होती हैं उनको नौशाबा शिक्षित करने का काम भी करती हैं। नौशाबा के मुताबिक 

“हमारी कोशिश होती है कि जो अनपढ़ महिलाएं हैं, वो किसी के सामने अंगूठा ना लगायें। वो बैंक और दूसरी जगहों पर अंगूठे की जगह अपना नाम लिखें।” 

इसके लिए नौशाबा अलग अलग बस्तियों में जाती हैं और ऐसी लड़कियों और महिलाओं को एकजुट कर उनको पढ़ने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करती हैं और उनको आत्मनिर्भर बनाने का काम करती हैं। ये नौशाबा की कोशिश का असर है कि पिछले दस सालों के दौरान वाराणसी में रहने वाली करीब 6 हजार लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। इनमें निचले और गरीब तबके की लड़कियां सबसे ज्यादा हैं। आज इनकी सिखाई कई लड़कियां और महिलाएं अपना ब्यूटी पॉर्लर चला रही हैं, सिलाई का काम कर रही हैं तो कुछ फैशन डिजाइनिंग कर अपनी रोजी रोटी चला रही हैं।


इतना ही नहीं महिलाओं के लिए सशक्तिकरण के लिए नौशाबा ने करीब 40 सेल्फ हेल्प ग्रुप तैयार किये हैं। हर ग्रुप में 10 से लेकर 20 महिलाएं होती हैं। इनकी हर महीने एक बैठक होती है। नौशाबा के मुताबिक 

“महिलाओं के लिए बने सेल्फ हेल्प ग्रुप में हम हर महीने अलग अलग मुद्दों पर चर्चा करते हैं। जैसे बाल विवाह, बाल मजदूरी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण से मुद्दे प्रमुखता से उठाये जाते हैं।” 

शिक्षा और रोजगार के अलावा नौशाबा पर्यावरण पर भी काम कर रही हैं। इसके लिए इन्होंने एक यूथ फोरम बनाया है। जहां पर युवाओं को पेड़ पौधों को बचाने के बारे में बताया जाता है। ये बताती हैं कि वातावरण के परिवर्तन में इनकी क्या भूमिका है। इसके अलावा पानी को कैसे सुरक्षित रखना चाहिए। पुरानी प्राकृतिक चीजें जो विलुप्त हो रही हैं उनको कैसे बचाया जा सकता है उनको संरक्षित किया जा सकता है। इसको लेकर वो इन युवाओं को जागरूक करती हैं। नौशाबा वाराणसी के पिछड़े इलाकों के करीब 60 घरों में बॉयोगैस प्लांट लगाने में मदद कर चुकी हैं।

नौशाबा अब वाराणसी के कारीगरों के लिए एक खास तरह की वेबसाइट बनाने जा रही हैं। उनका कहना है कि 

“मैं जब मुस्लिम हथकरघा कारीगरों के बीच शिक्षा और महिलाओं के उत्थान के लिए काम कर रही थीं तो देखा कि बांस की टोकरी, मिट्टी के बर्तन, चांदी की मीनाकारी, लकड़ी के खिलौने बनाने वाले कारीगरों को अपने बनाये माल की सही कीमत नहीं मिल पाती है। इनकी हालात कई बार इतनी खराब होती है कि बिचौलियों के कारण कारीगरों को अपना माल लागत से भी कम दाम पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है। तब इन कारीगरों की दुख भरी दास्तां सुनकर मेरे मन में ख्याल आया कि क्यों ना ऐसे कारीगरों के लिए एक वेबसाइट बनाया जाए, उनको प्रमोट किया जाये ताकि कारीगर सीधे ग्राहक से जुड़ सके। इस तरह कारीगर को उसके काम का उचित दाम मिल सकेगा।” 

नौशाबा के मुताबिक फिलहाल www.muknaus.com नाम की इस वेबसाइट पर काम चल रहा है और उनको उम्मीद है कि अगले दो महीनों के अंदर ये काम करना शुरू कर देगी। इस बेबसाइट में हाथ से बने समान को बेचने के लिए रखा जाएगा। यहां पर मिट्टी से जुड़े समान से लेकर हाथ से चलने वाला पंखा तक शामिल होगा। नौशाबा का कहना है कि “मेरा उद्देश्य इस वेबसाइट को राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शुरू करने की है ताकि दुनियाभर के लोग बनारस को जानें और बनारस के कारीगर के काम को अपने यहां लेकर जायें।”


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I would like to quote myself as ‘a writer by chance’, as fate wants me to write. Now, writing has become my passion, my child, my engagement, and my contentment. Worked as a freelance writer in gathering social and youth oriented real stories.

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