सरकारी स्कूल में आदिवासी बच्चों के ड्रॉपआउट की समस्या को दूर कर रहा है ये कलेक्टर

2012 बैच के IAS अॉफिसर सुहास ने आर्थिक तौर पर कमजोर बच्चों की बेहतरी के लिए उठाया नेक कदम...

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2012 बैच के आईएएस अफसर सुहास को पता चला कि ऐसा नहीं है कि बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता, बल्कि ऐसा उनके घर की आर्थिक परिस्थितियों की वजह से होता है। काफी गरीब परिवार से आने की वजह से बच्चों के ऊपर घर की जिम्मेदारियों को संभालने का दबाव आ जाता है। अधिकतर बच्चे खेती के काम में लग जाते हैं। आसपास के लोगों को भी कम दाम पर लेबर मिल जाते हैं इसलिए वे बच्चों को काम में लगा देते हैं। डीएम ने इस स्थिति को बदलने की शुरुआत की है...

बच्चों के साथ भोजन करते आईएएस सुहास
बच्चों के साथ भोजन करते आईएएस सुहास
 सुहास ने जिले के शिक्षा विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग के अधिकारियों को बुलाकर एक जांच टीम गठित की। अधिकारियों को इन स्कूलों का दौरा करने और समय पर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए। 

केरल में कन्नूर और कोझिकोड के बीच में एक जिला है वायनाड। यह इतना खूबसूरत और प्राकृतिक दृश्यों से भरा जिला है कि इसे धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है। पश्चिमी घाट के हरे भरे पहाड़ों के बीच बसा यह जिला जितना खूबसूरत है यहां पर समस्याएं भी उतनी ही हैं। सबसे बड़ी समस्या है पहाड़ों और जंगलों के बीच रहने वाले आदिवासी समुदाय के बच्चों की पढ़ाई। कहने को तो सरकार बच्चों की शिक्षा के प्रति काफी सजग है, लेकिन यहां के बच्चे पढ़ाई के बीच में ही स्कूल छोड़ देते थे। हाल ही में यहां नए युवा कलेक्टर सुहास शिवन्ना की नियुक्ति हुई। जिसके बाद से शिक्षा की तस्वीर कुछ बदली सी नजर आ रही है।

डीएम सुहास ने खुद ही आदिवासी समुदाय के बच्चों की स्कूल छोड़ने समस्या को समझने की कोशिश की। जिले में पनिया, अडिया, कट्टिनुयिक्का, चोलनक्किया जैसे कुछ आदिवासी समुदाय के बच्चों के बीच यह समस्या सबसे ज्यादा देखने को मिली। सुहास ने जिले के शिक्षा विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग के अधिकारियों को बुलाकर एक जांच टीम गठित की। अधिकारियों को इन स्कूलों का दौरा करने और समय पर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए। रिपोर्ट में पता चला कि बच्चे स्कूल में एडमिशन तो लेते हैं, लेकिन 7वीं से 10वीं के बीच में ही उनकी पढ़ाई छूट जाती है।

मेट्रो में बच्चों के साथ सुहास
मेट्रो में बच्चों के साथ सुहास

2012 बैच के आईएएस अफसर सुहास को पता चला कि ऐसा नहीं है कि बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता, बल्कि ऐसा उनके घर की आर्थिक परिस्थितियों की वजह से होता है। काफी गरीब परिवार से आने की वजह से बच्चों के ऊपर घर की जिम्मेदारियों को संभालने का दबाव आ जाता है। अधिकतर बच्चे खेती के काम में लग जाते हैं। आसपास के लोगों को भी कम दाम पर लेबर मिल जाते हैं इसलिए वे बच्चों को काम में लगा देते हैं। डीएम ने इस स्थिति को बदलने की शुरुआत की है। उन्होंने बच्चों के अभिभावकों से मिलकर उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में समझाया और पिछले साल जनवरी में 31 बच्चों को कोच्चि मेट्रो में ले जाकर एक छोटी सी ट्रिप भी करवाई।

कलेक्टर सुहास समय-समय पर बच्चों को ऐसी ट्रिप करवाते रहते हैं। इसके साथ ही वे कई सारी प्रतियोगिताएं भी करवाते हैं जिनमें बच्चों को कलेक्टर के साथ एक दिन बिताने काम मौका भी मिलता है। सुहस सीधे इन सरकारी स्कूलों में जाते हैं और उनके साथ बैठकर खाना भी खाते हैं। वे स्कूलों में बच्चों और शिक्षकों से उनकी समस्याएं सुनते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास भी करते हैं। स्कूल में संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जाए इसके लिए भी सुहास ने कई कदम उठाए हैं। उनके इन कदमों से इलाके में शिक्षा की स्थिति में काफी सुधार आया है और बच्चों के ड्रॉपआउट रेट में भी काफी गिरावट आई है।

यह भी पढ़ें: केरल का यह आदिवासी स्कूल, जंगल में रहने वाले बच्चों को मुफ्त में कर रहा शिक्षित

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