भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक ज़कारिया को किसी एक विचारधारा में विश्वास नहीं

इंटरनेशनल रिलेशनशिप, बिजनेस और अमेरिकी विदेश नीति से संबंधित मामलों के मजबूत आलोचक और लेखक 'पद्म भूषण' फरीद ज़कारिया...

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भारतीय मूल के अमेरिकी पत्रकार और लेखक फरीद रफीक जकारिया दुनिया के उन गिने-चुने पत्रकार-लेखकों में एक हैं, जिनकी लगातार विश्व-महाशक्तियों की शासकीय गतिविधियों, नीतियों, स्थितियों पर बारीकी से कलम चलती रही है। आज (20 जनवरी) उनका 54वां जन्मदिन है। ज़कारिया 'भय-आधारित' उन नीतियों के ख्यात आलोचक रहे हैं, जिसे न केवल आतंकवाद के विरुद्ध मोर्चेबंदी में प्रयोग किया जाता रहा है, बल्कि आव्रजन कानूनों और व्यापारिक हितों को साधने में भी इस्तेमाल किया गया है।

फरीद ज़कारिया, फोटो साभार: charlierose.com
फरीद ज़कारिया, फोटो साभार: charlierose.com

फरीद ज़कारिया इंटरनेशनल रिलेशनशिप, बिजनेस और अमेरिकी विदेश नीति से संबंधित मामलों के मजबूत आलोचक और लेखक माने जाते हैं। पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार ने फरीद जकारिया को 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था। 

यद्यपि फरीद ज़कारिया को उदार राजनीतिक, रूढ़िवादी, उदारवादी के रूप में जाना जाता है लेकिन वह स्वयं को मध्यमार्गी बताते हैं। वह बराक ओबामा और उनकी नीतियों के प्रबल समर्थक रहे हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के दौरान भी वह उनके पक्ष में सक्रिय रहे। उनके बारे में एक बार जॉर्ज स्टेफनोपोलस ने कहा था कि जकारिया राजनीति में निपुण हैं और उन्हें किसी विशेष श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। जब भी मैं उनकी तरफ मुड़ता हूं, मुझे यह समझ में नहीं आता कि वे किस तरफ जाएंगे या क्या कहने जा रहे हैं। फरीद ज़कारिया का जन्म महाराष्ट्र के एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष कोंकणी मुस्लिम परिवार में हुआ था, जो ईसाई, हिन्दू, मुस्लिम उत्सवों, सभी में शामिल होता रहा है।

उनके राजनेता एवं इस्लामिक विद्वान पिता रफीक ज़कारिया कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। उनकी मां फातिमा ज़कारिया संडे टाइम्स ऑफ इंडिया की संपादक रही हैं। शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मुंबई के कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल में होने के बाद फरीद ज़कारिया ने येल विश्वविद्यालय से बीए किया। उसी विश्वविद्यालय में वह येल पोलिटिकल यूनियन के अध्यक्ष और येल पोलिटिकल मंथली के मुख्य संपादक भी रहे। बाद में उन्होंने 1993 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में पीएचडी की।

वह इंटरनेशनल रिलेशनशिप, बिजनेस और अमेरिकी विदेश नीति से संबंधित मामलों के मजबूत आलोचक और लेखक माने जाते हैं। पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार ने फरीद जकारिया को 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था। जकारिया का जन्म 20 जनवरी 1964 को मुंबई में हुआ था। येल यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल करने बाद सन 1993 में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में पीएचडी की। कई बड़े मीडिया ग्रुप के साथ काम करने के साथ-साथ उन्होंने कई अवॉर्ड भी हासिल किए। वर्ष 2009 में फोर्ब्स की लिस्ट में अमेरिकी मीडिया में 25 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ उनका नाम भी शुमार रहा।

ज़कारिया का मानना है कि विश्व में वर्ष 1970-80 के दशकों में रूढ़िवाद काफी शक्तिशाली रूप से उभरा लेकिन आज नई दुनिया को नई सोच की आवश्यकता है। वह कभी भी एक ही प्रकार की विचारधारा के प्रति स्वयं को समर्पित करने की कोशिश नहीं करते हैं। वह कहते हैं कि अपने कार्य के उस भाग को वह महसूस करते हैं, जिसमें किसी का पक्ष नहीं लिया जाए लेकिन उसमें क्या चल रहा है, उस पर वह अपने विचारों को समझाने की कोशिश करते हैं। वह ये नहीं कह सकते कि यह मेरी टीम है और मैं उसके लिए जड़ बनने जा रहा हूं, वे क्या करते हैं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। 9/11 हमले पर उनका कहना रहा है कि अरब देशों में गतिहीनता और दुष्क्रिया में इस्लामी अतिवाद की जड़ है।

अत्याचारी शासनों के अधीन दशकों की विफलता, जिसने पश्चिमी शैली के धर्मनिरपेक्ष आधुनिकतावादी होने का दावा किया था, एक ऐसा विपक्ष पैदा किया, जो धार्मिक, हिंसक और तेजी से भूमंडलीकृत था। मस्जिद एक ऐसी जगह है, जहां लोग इकट्ठा हो सकते हैं और इस्लाम एक संस्था है, जो सेंसरशिप की पहुंच से बाहर है। दोनों ने राजनीतिक विपक्ष के विकास के लिए एकल लक्ष्य किया। अरब देशों में अधिक खुला हुआ और गतिशील समाज बनाने के लिए एक अंतर-पीढ़ी प्रयास करना होगा और इस तरह इस्लाम को आधुनिक दुनिया में प्रवेश करने के लिए मदद का रास्ता खुलेगा।

एक वक्त में इराक के आक्रमण का समर्थन करते हुए उनका मानना रहा है कि इराक में एक क्रियाशील लोकतंत्र अरब राजनीति के लिए एक नया मॉडल हो सकता है लेकिन आक्रमण और कब्ज़े की कीमत कार्रवाई के औचित्य के लिए बहुत अधिक है। मार्च 2007 में इराक प्रदर्शन का विरोध करते हुए उन्होंने लिखा कि यह सैन्य प्रदर्शन है, राजनीतिक नहीं। ऐसे दौर में वॉशिंगटन को सुन्नी अरबों, शिया अरबों और कुर्द के बीच राजनैतिक समाधान के प्रयास करने चाहिए और सैनिकों की संख्या कम करनी चाहिए। इस्लामिक विवाद में बड़ा मुद्दा अमेरिका में धर्म की स्वतंत्रता है। इन्हीं विचारों के साथ उन्होंने जुलाई 2010 में पुरस्कार वापस कर दिया था।

जकारिया की जिंदगी के रास्ते कभी अस्तव्यस्त नहीं रहे। वह जिस भी राह चले, मंजिल तक चलते चले गए। हार्वर्ड में अमेरिकी विदेश नीति पर एक शोध परियोजना का निर्देशन करने के बाद वर्ष 1992 में वह फॉरेन अफेयर्स पत्रिका के प्रबंध-संपादक और अक्तूबर 2000 में न्यूज़वीक इंटरनेशनल के संपादक बने। उस दौरान उन्होंने एक साप्ताहिक विदेशी मामलों का कॉलम भी लिखा। वर्ष 2010 में वह न्यूजवीक से टाइम पत्रिका में स्थानांतरित हो गए, जहां वह सहायक संपादक और स्तंभकार रहे।

वह लगातार न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जर्नल, न्यू यॉर्कर के लिए भी लिखते रहे हैं। वह लगभग छह वर्षों तक एबीसी के दिस वीक विथ जॉर्ज स्टेफनोपोलस के समाचार विश्लेषक रहे, साथ ही उन्होंने पीबीएस पर फॉरेन एक्सचेंज विथ फरीद ज़कारिया नामक एक टीवी न्यूज़ शो की मेज़बानी भी की। उनके साप्ताहिक शो 'ग्लोबल पब्लिक स्क्वैर' का प्रीमियर सीएनएन पर रिलीज हुआ था। ज़कारिया फ्रॉम वेल्थ टू पॉवर: द अनयूजवल ओरिजिंस ऑफ अमेरिकास वर्ल्ड रोल, द फ्यूचर ऑफ फ्रीडम और द पोस्ट अमेरिका वर्ल्ड के लेखक जकारिया ने द अमेरिकन एनकाउंटर; द यूनाईटेड स्टेट्स एंड द मेकिंग ऑफ द मोर्डन वर्ल्ड का सह-संपादन किया।

वर्ष 2007 में फॉरेन पॉलिसी और प्रॉस्पेक्ट पत्रिकाओं ने उन्हें दुनिया के अग्रणी सौ सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में से एक माना था। वह इस समय अपनी पत्नी पौला थ्रोकमोर्टन, पुत्र ओमर और दो बेटियों लिला और सोफिया के साथ न्यूयॉर्क शहर में रहते हैं। उन्हें न्यूयॉर्क में इंडिया अब्रॉड पर्सन ऑफ द इयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म निर्माता मीरा नायर ने जिसने वर्ष 2007 के लिए इस पुरस्कार को जीता था, उसने अपने अनुगामी को पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने मियामी विश्वविद्यालय, ओबर्लिन कॉलेज, बेट्स कॉलेज और ब्राउन विश्वविद्यालय से मानद डिग्री प्राप्त की है। उनको पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 2010 में पद्म भूषण से नवाजा गया था।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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