एक हजार गानों की मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां

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फिल्म 'दुपट्टा' में नूरजहां की आवाज में सजे गीत श्रोताओं के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि न सिर्फ इसने पाकिस्तान में बल्कि पूरे भारत वर्ष में भी इसने धूम मचा दी। आल इंडिया रेडियो से लेकर रेडियो सिलोन पर नूरजहां की आवाज का जादू श्रोताओं पर छाया रहा। वर्ष 1963 में नूरजहां ने अभिनय की दुनिया से विदाई ले ली और वर्ष 1996 में वह आवाज की दुनिया से भी जुदा हो गईं। एक हजार फिल्मी गीतों को सुर देने वाली नूरजहां ने उस वर्ष पंजाबी फिल्म 'सखी बादशाह' में अपना आखिरी गाना- 'दम दा भरोसा' गाया था।

नूर जहां
नूर जहां

नूरजहां के बारे में कई एक किंवदंतियां हैं। मसलन, एक यह भी कि 21 सितंबर 1926 को पंजाब के एक छोटे से कस्बे कसुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जब उनका जन्म हुआ था।

घर मे फिल्मी माहौल के कारण बचपन से ही नूरजहां का रुझान संगीत की ओर हो गया था। सयानी होने पर उन्होंने तय किया कि वह पार्श्वगायिका के रूप में ही अपनी पहचान बनाएंगी।

फिल्म 'दुपट्टा' में नूरजहां की आवाज में सजे गीत श्रोताओं के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि न सिर्फ इसने पाकिस्तान में बल्कि पूरे भारत वर्ष में भी इसने धूम मचा दी। आल इंडिया रेडियो से लेकर रेडियो सिलोन पर नूरजहां की आवाज का जादू श्रोताओं पर छाया रहा। वर्ष 1963 में नूरजहां ने अभिनय की दुनिया से विदाई ले ली और वर्ष 1996 में वह आवाज की दुनिया से भी जुदा हो गईं। एक हजार फिल्मी गीतों को सुर देने वाली नूरजहां ने उस वर्ष पंजाबी फिल्म 'सखी बादशाह' में अपना आखिरी गाना- 'दम दा भरोसा' गाया था।

मल्लिका-ए-तरन्नुम के नाम से मशहूर दिलकश आवाज और अदाओं की मलिका नूरजहां आज (23 दिसंबर 2000) ही के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गई थीं। इंतकाल से पहले जब नूरजहां को दिल का दौरा पड़ा था तो उनके एक मुरीद ने लिखा था कि उन्हें तो दिल का दौरा पड़ना ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उनके दिल के, पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी। उनके बारे में कई एक किंवदंतियां हैं। मसलन, एक यह भी कि 21 सितंबर 1926 को पंजाब के एक छोटे से कस्बे कसुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में जब उनका जन्म हुआ था।

एक बुज़ुर्ग चाची ने कहा था कि जब नूर पैदा हुई थी तो उसके रोने की आवाज़ सुनकर बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है। पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक बा ख़ास शाम का आयोजन किया तो नूर ने नात सुनाए। पीर ने कहा- बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ। नूर ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे। जब नूर यह गीत गा रही थी, पीर अचेत हो गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और नूर के सिर पर हाथ रख कर बोले- लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी।

नूरजहां के माता-पिता थियेटर में काम किया करते थे। नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फ़रमाइश पर गाना सख़्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र कुमार ने नूरजहां से कहा- मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताज़िंदगी याद रखे। वर्षों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था। वहाँ उपस्थित लोगों की सांसें रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं।

नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र कुमार को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद उर्फ़ ग़म्मे ख़ाँ को। 'ज़रा बाजा तो मँगवाना', उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बग़ल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र कुमार से पूछा क्या गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा 'बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए'। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर कहा- नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ़ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।

घर मे फिल्मी माहौल के कारण बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर हो गया था। सयानी होने पर उन्होंने तय किया कि वह पार्श्वगायिका के रूप में ही अपनी पहचान बनाएंगी। नूरजहां ने अपनी संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कजानबाई से और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद गुलाम मोहम्मद तथा उस्ताद बड़े गुलाम अली खान से ली थी। वर्ष 1930 में नूरजहां को इंडियन पिक्चर के बैनर तले बनी एक मूक फिल्म 'हिन्द के तारे' में काम करने का मौका मिला। कुछ समय बाद उनका परिवार पंजाब से कोलकाता चला आया। इस दौरान उन्हें करीब 11 मूक फिल्मों मे अभिनय करने का मौका मिला। वर्ष 1931 तक वह बाल कलाकार की भूमिका निभाती रहीं।

एक वक्त में जब में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था, वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफ़ी माँग रहती थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 1930 के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फ़िल्म 'शीला' उर्फ 'पिंड दी कुड़ी' में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। वर्ष 1935 में रिलीज हुई यह फ़िल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने 'पंजाबी फ़िल्म उद्योग' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फ़िल्म के गीत बहुत हिट रहे।

लगभग तीन वर्ष तक कोलकाता रहने के बाद नूरजहां वापस लाहौर चली गयीं। वहां उनकी मुलाकात मशहूर संगीतकार जी.ए.चिश्ती से हुई, जो स्टेज प्रोग्राम में संगीत दिया करते थे। उन्होंने नूरजहां से स्टेज पर गाने की पेशकश की जिसके एवज में नूरजहां को प्रति गाना साढ़े सात आने दिये गये। वर्ष 1939 में निर्मित पंचोली की संगीतमय फिल्म 'गुल ए बकावली' की सफलता के बाद नूरजहां फिल्म इंडस्ट्री की चर्चित शख्सियत बन गयीं। इसके बाद वर्ष 1942 में पंचोली की हीं फिल्म 'खानदान' की सफलता के बाद नूरजहां बतौर अभिनेत्री फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गयीं। एक वक्त में इस फिल्म का गाना 'कौन सी बदली में मेरा चांद है आजा' उनके करोड़ों चाहने वालो के दिलों पर छा गया था। नूरजहां अपनी आवाज में नए-नए प्रयोग करती रहती थीं।

अपनी इन खूबियों की वजह से बाद में वह ठुमरी की महारानी नाम से मशहूर हो गईं। बाद में तो मल्लिका-ए-तरन्नुम ही हो गईं। वर्ष 1947 में भारत विभाजन के दिनों में नूरजहां ने जब पाकिस्तान जाने का पक्का इरादा कर लिया, फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार ने उनसे भारत में ही रहने की पेशकश की तो उन्होंने कहा- मैं जहां पैदा हुई हूँ, वहीं जाऊंगी। तौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फ़िल्म 'बाजी' थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फ़िल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फ़िल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पार्श्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 'जान-ए-बहार' (1958) थी।

इस फ़िल्म का 'कैसा नसीब लाई' गाना काफ़ी लोकप्रिय हुआ। भारत छोड़ पाक़िस्तान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने 'विविध भारती' में बताया था कि- 'ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी है। उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?'

पाकिस्तान चले जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय और गायन से सजी दो फ़िल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- 'जुगनू' और 'मिर्ज़ा साहिबाँ'। 'जुगनू' शौक़त हुसैन रिज़वी की फ़िल्म थी 'शौक़त आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी ने मोहम्मद रफ़ी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फ़िल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज़्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था 'यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है।' इस गीत की अवधि क़रीब पांच मिनट और पैंतालीस सेकण्ड्स की थी, जो उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौक़त हुसैन रिज़वी ने ख़ुद ही लिखा था, पर 'हमराज़ गीत कोश' के अनुसार फ़िल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।

फिल्म 'दुपट्टा' में नूरजहां की आवाज में सजे गीत श्रोताओं के बीच इस कदर लोकप्रिय हुए कि न सिर्फ इसने पाकिस्तान में बल्कि पूरे भारत वर्ष में भी इसने धूम मचा दी। आल इंडिया रेडियो से लेकर रेडियो सिलोन पर नूरजहां की आवाज का जादू श्रोताओं पर छाया रहा। वर्ष 1963 में नूरजहां ने अभिनय की दुनिया से विदाई ले ली। वर्ष 1966 में वह पाकिस्तान सरकार द्वारा तमगा-ए-इम्तियाज सम्मान से नवाजी गयीं और 1982 में इंडिया टाकी के गोल्डेन जुबली समारोह में उनको भारत आने को न्योता मिला, तब श्रोताओं की मांग पर नूरजहां ने गाया था- आवाज दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है। वर्ष 1996 में वह आवाज की दुनिया से भी जुदा हो गईं। उन्होंने वर्ष 1996 में पंजाबी फिल्म 'सखी बादशाह' में अपना आखिरी गाना- 'दम दा भरोसा' गाया। उन्होंने अपने पूरे फिल्मी करियर में लगभग एक हजार गाने गाए। हिन्दी फिल्मों के अलावा उन्होंने पंजाबी, उर्दू और सिंधी फिल्मों में भी अपनी आवाज दी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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