पंचायतें कैसे लायेंगी स्वशासन

पंचायतें केंद्र और राज्य की सरकारों के लिए नाकामी छिपाने का साधन साबित हो रही हैं। सरकारें नोडल एजेंसी के रूप में पंचायतों के कामकाज का विस्तार तो कर रही हैं, लेकिन उसकी प्रणालीगत खामियों को दूर करने के लिए कहीं से भी संजीदा नहीं है। पंचायतों के पास थोक भाव में पैसा पहुंचाया जा रहा है, लेकिन उसके सही इस्तेमाल की गारंटी हकीकत से कोसों दूर है।

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कभी लोकहित का प्रतिष्ठान रहीं ग्राम पंचायतें अब राजनीति के प्राथमिक अखाड़े में तब्दील हो चुकी हैं। वर्चस्व की जंग, लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों में घपला और कमीशनखोरी के घोड़े पर सवार पंचायतें गांधी के लोक स्वराज के सपनों को किश्तों में कत्ल करने का कार्यक्रम बन गयी हैं। दरअसल हाल के वर्षों में ग्राम और जिला पंचायतों में विकास के नाम पर जो अथाह धन आया है उसे निपटाने और हड़प जाने की कोशिशों ने पंचायती चुनावों को एकदम विषाक्त बना डाला है। इस अथाह धन पर कब्जे की होड़ में बाहुबली और सामंती किस्म के लोगों के नेतृत्व में एक ही क्षेत्र में कई गैंग बन गए हैं। जो गैंग चुनाव जीत जाता है वो पंचायत से मिलने वाले लाभों को पांच साल खाता है। इस धन को हड़पने की ये राजनीति इस हद तक हिंसक हो गई है, कि चुनाव के बाद छह माह तक चुनावी दुश्मनी निकाली जाती है, हत्याएं होती हैं। आम ग्रामीण परिवार जो इस गैंग में सेट नहीं हो सकता उसके हिस्से में कुछ आता भी नहीं है। जबकि पंचायती राज का ढांचा सही मायने में ग्रामीण जीवन में स्तरीय बदलाव ला सकता है।

सत्ता के विकेंद्रीकरण स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था भारत जैसे कृषि देश के लिए बहुत उपयोगी है। क्योंकि आज भी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा गांवों में ही बसता है। 73वें संशोधन अधिनियम में पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में काम करने के लिए आवश्यक शक्तियां और अधिकार दिए गए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसामान्य के सबलीकरण पंचायतें स्थानीय स्तर पर कारगर उठा सकती हैं। वर्तमान में तकरीबन 28.18 लाख निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से 36.87 प्रतिशत महिलाएं हैं। आज स्थानीय चुनावों में भाग लेने वाली महिलाओं की संख्या तकरीबन 30 लाख है। जिनमें करीब 10 लाख महिला जनप्रतिनिधि हैं।

रसूखदार लोग एक डमी के तौर पर घर की महिला को चुनाव लड़वाते हैं और खुद शासन की कमान संभालते हैं। परिणाम हम सबके सामने है। जिस उद्देश्य को लेकर महिलाओं को ये अधिकार दिया गया था वो ही बेमानी हो गया। निर्वाचित महिलाएं केवल मुहर लगाने का काम करती हैं। पंचायतें केंद्र और राज्य की सरकारों के लिए नाकामी छिपाने का साधन भी साबित हो रही हैं। सरकारें नोडल एजेंसी के रूप में पंचायतों के कामकाज का विस्तार तो कर रही हैं, लेकिन उसकी प्रणालीगत खामियों को दूर करने के लिए कहीं से भी संजीदा नहीं है। पंचायतों के पास थोक भाव में पैसा पहुंचाया जा रहा है, लेकिन उसके सही इस्तेमाल की गारंटी हकीकत से कोसों दूर है। क्योंकि इसकी गारंटी देने वाली राजनीति ही नदारद रखा गया है। आलम ये है कि दलीय राजनीति के अभाव में पंचायतों के प्रतिनिधि चयनित नौकरशाही के साथ काम करने वाले निर्वाचित नौकरशाह बनकर रह गये हैं। कई मामलों में चयनित नौकरशाही के अधिकार ज्यादा सक्षम है।

ध्यान रहे कि स्थानीय निकायों के समांतर गैर सरकारी संगठनों की भी भागीदारी बढ़ाई जा रही है। मतलब साफ है एक संस्था जो सीधी भागीदारी की तर्ज पर बनी हुई है, उसके काम काज को सुधारने के बजाय, उसके समांतर दूसरी संस्थाओं को मौका दे दिया जा रहा है। राजनीति की इस तौर तरीके के आधार पर कहा जा सकता है कि सत्ताधारी अपनी राजनीतिक नाकामी छिपाने के लिए एक साथ कई चेहरों को मैदान में उतार कर रखती है। एक से अधिक संस्थाएं सीधी जवाबदेही से बचाती हैं। क्योंकि तमाम असंतोषों के लिए इन्हीं संस्थाओं को जिम्मेदार ठहराना आसान हो जाता है। पंचायतें रोटी-कपड़ा और मकान के आस-पास बुनी जा रही राजनीति को जमीनी हकीकत दे सकती हैं। क्योंकि मसला चाहे प्रत्यक्ष भागीदारी का हो या जनता से निकटता का, जवाबदेह लोकतंत्र के रूप में स्थानीय निकायों की अवधारणा पूरी तरह से सक्षम है।

शराब के सुरूर और कर्ज के नासूर में पंचायत चुनावों की तस्वीर

2015 के चुनावों में तात्कालीन प्रधानों के लिए सबसे बड़ी चिंता समाजवादी पेंशन एवं विरोधी साथियों द्वारा शिकायती पत्रों से थी। पेंशन में जिन पात्रों का नाम नहीं था, उसे मुद्दा बनाया जा रहा था, तो छोटीे-छोटी शिकायतों के अलावा जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी जाने वाली सूचनाओं में भी वृद्धि देखी जा रही थी।

लोकतंत्र के प्रथम पायदान त्रि-स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था के चुनावों की घोषाणा होते ही राजनीति की खुमारी को गांवों में धीरे-धीरे महसूस होने लगती है। जनता की सीधे भागेदारी का साक्षी ग्राम सभा समाज फिर से अपने नये नुमाइंदे की तलाश में जाग्रत हो जाता है। बाग और खेत की मेढ़ों पर बैठकर गोलबंदी शुरू हो जाती है तो बरसों पुरानी शिकायतें फिर से पिटारों से बाहर आ जाती हैं। चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों द्वारा जातीय और सामाजिक स्तर पर नए-नए समीकरणों के निर्माण करने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। गांव-गांव आधार कार्ड बनने लगते हैं, कहीं स्वयं प्रधान तो कहीं संभावित उम्मीदवार बाकायदा अपनी ओर से कैंप लगवा कर लोगों का आधार कार्ड बनवाते हैं। इसके अतिरिक्त बीमार मरीजों को बोलेरो आदि की व्यवस्था कराकर उनके साथ अस्पताल तक जाने की भी होड़ लग जाती है।

आबकारी विभाग का कहना है कि जितना राजस्व तीन महीने में आता है, पंचायत चुनावों में एक महीने में ही आ जाता है। विडंबना है कि कभी लोक मंगल का अधिष्ठान कहलाने वाली हमारी पंचायते भ्रष्टाचार का मरकज बन कर रह गई हैं। जो पंचायत चुनाव कभी गांवों की सामाजिक समरसता को मजबूत करने की एक सीढ़ी थे वही आज कानून और व्यवस्था के लिए चुनौती बन चुके हैं। पहले ग्राम पंचायतों के चुनाव इतने ङ्क्षहसक नहीं होते थे। लेकिन अब ज्यादातर जगहों पर चुनाव के काफी पहले से ही विरोधियों को निपटाने का खूनी दौर शुरू हो जाता है। हाल के कुछ सालों में ग्राम पंचायत चुनावों के दौरान हत्याओं, फर्जी मुकदमों, बलात्कार के प्रयास जैसे संगीन किन्तु फर्जी आरोपों की बाढ़ सी आई है। पुलिस के लिए कानून व्यवस्था संभालना एक चुनौती बन चुका है। इस बात की तथ्यात्मक विवेचना आवश्यक है कि आखिर आज चुनाव होने के छह माह पहले से ही धमकियों, हत्याओं और फर्जी मुकदमों की बाढ़ सी क्यों दिखने लगती है?

सन 2020 में विश्व की सबसे अधिक पंचायतों वाला उत्तर प्रदेश एक बार फिर गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को पूरा करने के लिये मतदान को तैयार होगा किंतु कुछ सवाल हैं, जब तक वो बे-जवाब रहेंगे तब तक तक चुनाव लाजवाब नहीं हो पायेंगे।

बढ़ते हैं सवालों और अंदेशों की तरफ। क्या आपको लगता नहीं है कि दारू की भट्टठी पर पक रहा कच्चा जहर हर बार फिर गांधी के सपने को अकाल मौत का कफन पहनाने में कामयाब हो जाता है! पंचायत चुनावों को रक्तरंजित करने के लिये भिंड, मुरैना और बीहड़ की तरफ से आने वाली अवैध असलहों की खेप को सूबे की पुलिस रोक क्यों नहीं पाती है? बिहार के रास्ते से आने वाली 'बुलेट' फिर ग्राम स्वराज के 'बैलेट' का मुकद्दर कब तक तय करेगी? और काले धन की कालिमा से पंचायतों के भविष्य को अंधकारमय बनाने की कूव्वत रखने वाले प्रत्याशियों के दागदार चेहरों को चिन्हित कर फैसलाकुन और संदेश मूलक कार्यवाहियों की चाह काले धन के सामने कब तक दम तोड़ती नजर आयेगी?

एक समस्या और है जिसने एकाएक सभी समीरणों को ही बदल दिया है। दरअसल शहरों से लगे गावों में पैसे की एकाएक भरमार हो गई है। इन गांवों की जमीन अनाज उगलती हो या नहीं, लेकिन बढ़ती आवास समस्या और एक्सप्रेस हाइवे के निर्माण की वजह से जमीनें सोना उगल रही हैं। पैसा आया है तो महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के सभी रास्ते सही और संभव लगने लगे हैं। दीगर है कि पंचायत चुनाव में वोटरों की संख्या कम होने के कारण प्रधान पद के प्रत्याशियों द्वारा अपने वोटरों को नकद पैसे और मुफ्त की दावतें देने का चलन बढ़ गया है। पैसे बांटने के इस खेल को अब इतना बढ़ावा मिल चुका है कि हर प्रधान पद के प्रत्याशी से उसके वोटरों को पैसे और दावत की अपेक्षा एक सामान्य बात हो गई है।

शबाब पर है प्रधान पति का चलन

पंचायत चुनावों में महिला आरक्षण के बाद महिलाओं की सहभागिता गांव की राजनीति में पुरुषों के बराबर हो गई है, लेकिन ये सिक्के का एक ही पहलू है। अगर प्रधान पद पर बैठ जाना ही सहभागिता है तो यकीनन महिलायें आगे आई हैं। पर महिलाओं के प्रधान बनने से क्या महिलाओं में जागृति आई है? ये सवाल अनसुलझा हुआ है। महिला आरक्षित सीटों पर महिला प्रधान जरूर हैं पर वो महज एक रबर स्टाम्प के रूप में कार्य करती हैं। सारे फैसले और जिम्मेदारी प्रधानपति ही निभाते हैं। ये स्थिति कभी सुधरेगी या हमेशा वे रबर स्टाम्प ही होंगी? ये सवाल अभी तक अनुत्तरित है।

उत्तर प्रदेश के 2015 में सम्पन हुये पंचायत चुनावों में सघन रिपोर्टिंग के दौरान मैंने पाया कि बहुतायत में महिलाओं को उस क्षेत्र का नाम ही नहीं पता था, जिसका प्रतिनिधित्व करने के लिए वे नामांकन दाखिल कर रही थी। सब, पति के कहने पर आई थीं। शायद पंचायती राज विभाग के पास भी इसका सवाल नहीं है।

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लेखक / पत्रकार

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