बुजुर्गों की बेहतर ज़िंदगी के लिए ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’

चेन्नई में दो स्टोर के अलावा एक ई-स्टोर के द्वारा कर रहे हैं लाचार बुजुर्गों की सेवा के प्रयासआॅनलाइन बिक्री के द्वारा देश के लगभग हर हिस्से तक पहुंचाते हैं जरूरत का सामनबीते 3 वर्षों में 20 हजार के लगभग उपभोक्ताओं की कर चुके है सफलतापूर्वक सेवाकरीब दस वर्ष पूर्व अपनी बिस्तर पर पड़ी अपनी माँ के लिये आवश्यक चीजों की तलाश ने दी स्टोर खोलने की प्रेरणा

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दस साल पहले, सोमदेव पृथ्वीराज ने बिस्तर पर लाचारी का जीवन जी रही अपनी माँ के जीवन को और अधिक सम्मानजनक और स्वतंत्र बनाने में मदद करने वाले कुद विशेष उत्पादों की खोज शुरू की थी। उस वक्त उनके हाथ खाली रहे और अपनी इस खोज में उनके हाथ सिर्फ मायूसी लगी। ठीक उसी समय ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ का विचार उनके मन-मस्तिष्क में कौंधा ओर जैसा कि अब दूसरे कहते हैं, बाकी सब इतिहास है।

ओल्ड इज़ गोल्ड के संस्थापक सोमदेव पृथवीराज (दायें), उनकी पत्नी केपी जयश्री और संजय दत्तात्रेय (बायें)
ओल्ड इज़ गोल्ड के संस्थापक सोमदेव पृथवीराज (दायें), उनकी पत्नी केपी जयश्री और संजय दत्तात्रेय (बायें)

पृथ्वीराज भारत के वरिष्ठ नागरिकों के लिये विशेष रूप से खोले गए स्टोर ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के संस्थापक हैं और इनके यहां इन वृद्धजनों के लिये चलने में सहायता करने वाले, शौचालय में सहायता करने वाले और विभिन्न सुरक्षा उपकरणों के उत्पादों की एक पूरी श्रृंखला मौजूद है। इसके अलावा इस ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ स्टोर में वरिष्ठ नागरिकों की सहायता के लिये सुविधा उत्पाद, कपड़े, मधुमेह, गठिया और हड्डियों से संबंधित सहायता, उनको सुहाने वाले कपड़ों, बाथरूम उत्पादों के अलावा फर्नीचर जैसे उत्पाद भी मिलते हैं।

‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ के ई-काॅमर्स हेड संजय दत्तात्रेय बताते हैं, ‘‘जब भी कभी बुजुर्ग माता-या दादा-दादी की सेवा और देखभाल की बात होती है तो उनमें प्र्रेम की कोई कमी नहीं होती है। कइ्र बार ऐसा होता है कि बुजुर्ग माता-पिता तो भारत में रह रहे होते हैं और उनकी देखभाल के जिम्मेदार बच्चे विदेशों में अपने-अपने कामों में फंसे हुए होते हैं। अधिकतर ऐसे ही अनिवासी भारतीय हमारे उत्पादों की विशेषता और अनिवार्यता को समझते हैं और यही हमारे सबसे बड़े उपभोक्ता भी हैं।’’

वर्तमान में एक ई-स्टोर के अलावा इनके चेन्नई में दो आॅनलाइन स्टोर भी सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। रोजाना के अनुभवों और उदाहरणों से सीखकर पृथ्वीराज और उनकी धर्मपत्नी केपी जयश्री अब बुजुर्गों के जीवन की दशा को सुधारने की दिशा में काम करने में जी-जान से जुटे हुए हैं। कंप्यूटर और पत्रकारिता में मास्टर्स करने और कुछ समय तक सेल्स की नौकरी करने के बाद बुजुर्गों की सेवा करने और फिर इस सेवाभाव को एक व्यापार का रूप देने का विचार उनके मन में एक दिन ऐसे ही आया। अब जब वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं तो उन्हें लगता है वे अपने प्रयासों में सफल हो रहे हैं।

एक गौरवान्वित उद्यमी का कहना है, ‘‘इसके अलावा खुदरा क्षेत्र का व्यापार होने के बावजूद अबतक हमारे स्टोर से किसी भी तरह की छोटी-मोटी चोरी तक का मामला सामने नहीं आया है और भारत जैसे देश के लिये यह एक बहुत असामान्य बात है क्योंकि यहां कार्यस्थलों पर चारियां होना एक आम बात है। आज तक हमारे स्टोर में आने वाले गलती से या जानते-बूझते कुछ भी उठाकर नहीं चलते बने हैं। हम चेक से भुगतान लेते हैं और कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी ने हमें चेक दिया हो और हमें बैंक से मायूस होकर लौटना पड़ा हो।’’

इन्होंने अपने व्यापार की शुरुआत आॅफलाइन स्टोर से की थी लेकिन जल्द ही इन्हें आॅनलाइन बिक्री की दुनिया में अपने पांव रखने पड़े। वास्तव में चेन्नई के अडयार और अन्नानगर इलाकों में अपने दो भौतिक स्टोर खोलने के अगले ही दिन इन्हें अपने उत्पादों की आॅनलाइन बिक्री शुरू करनी पड़ी। इनके एक पुराने पारिवारिक मित्र संजय इनकी ई-काॅमर्स पहल के मुखिया के रूप में इनके साथ जुड़ गए। हालांकि वे दत्तात्रेय ही थे जिन्होंने इन्हें आॅनलाइन जाने का सुझाव दिया था।

बुजुर्गों की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार की गई संशोधित व्हीलचेयर
बुजुर्गों की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार की गई संशोधित व्हीलचेयर

समय के साथ धीरे-धीरे इनकी आॅनलाइन बिक्री भी बढ़ गई। असल में इनके उत्पाद ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें खरीदने से पहले कोई भी उपभोक्ता पहले उन्हें छूकर महसूस करना चाहता है और ऐसे मामलों में इन उत्पादों की आॅनलाइन उपस्थिति से अधि भौतिक उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। औसतन प्रतिदिन 20 से 30 उपभोक्ता इनके स्टोर पर आते हैं और लगभग इतने ही आॅर्डर इन्हें टेलफोन के द्वारा प्राप्त हो जाते हैं। इसके अलावा आॅनलाइन माध्यम से भी रोजाना 10 से 15 आॅर्डर इन्हें मिलते हैं। अबतक अपने तीन सालों के छोटे से जीवनकाल में ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ 15 हजार से 20 हजार के लगभग उपभोक्ताओं की सेवा कर चुका है।

दत्तात्रेय कहते हैं, ‘‘हमारी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हम लोगों को स्वच्छता के बुनियादी नियमों से अवगत करवाने के साथ-साथ बुजुर्गों को सुरक्षित और आरामदायक रखने की प्रेरणा देते हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर शल्य-चिकित्सा के बाद की स्थितियों से जूझ रहे होते हैं।’’

बुजुर्गों के लिए एक सुविधा उत्पाद
बुजुर्गों के लिए एक सुविधा उत्पाद

ऐसा नहीं है कि मार्गदर्शन पाने के लिये इनके स्टोर में कदम रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इनके यहां से कुछ न कुछ खरीदकर ही बाहर निकले लेकिन अपनेइन उत्पादों के प्रति लोगों के बीच बढ़ती जागरुकता इसके संस्थापकों को खुश करने के लिये काफी है।

आज ये लोग उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी भारत, गुजरात सहित देश के विभिन्न हिस्सों में अपने उत्पाद भेज चुके हैं और अंडमान निकोबार द्वीप समूह तक के लोग इनके उपभोक्ता हैं। अक्सर ऐसा होता है कि विदेशों में बैठे कई उपभोक्ता आॅनलाइन माध्यमों से इन्हें भुगतान कर देते हैं और फिर यह लोग भारत में रह रहे उनके बुजुर्ग परिजनों तक सामान को पहुंचा देते हैं।

दत्तात्रेय कहते हैं, ‘‘इस प्रकार के उत्पादों के प्रति लोगों के बीच जागरुकता की कमी निश्चित ही हमारे सामने आने वाली सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा हम भारतीय की एक पुरानी सोच और मानसिकता ‘बुढ़ापे के साथ पीड़ा और कष्ट तो आएंगे ही’ एक बहुत बड़ी चुनोती है जिससे पार पाये जाने की आवश्यकता है। यहां तक कि अधिकतर लोग तो बुजुर्गों के लिये डायपर के बारे में बात तक करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं। और ऐसे में बुजुर्गों को इन उत्पादों के प्रयोग के लिये राजी करना और उन्हें इस सच्चाई से अवगत करवाना कि उनके लिये ये सब चीजें बाजार में मौजूद हैं हमेशा से ही हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती रहा है।’’

इसके अलावा एक सबसे पड़ी पररेशानी है इन बुजुर्गों का खुद के प्रति रवैया। ये लोग ‘चमड़ी चली जाए पर दमड़ी न जाए‘ वाली मानसिकता के हो जाते हैं और खुद पर पैसा खर्च करने से बचने की कोशिश करते हैं। यहां तक कि अगर उनके बच्चे उनके लिये ये चीजें खरीदने की कोशिश करें तो आमतौर पर वे लोग उन्हें ऐसा करने से रोकने की चेष्टा करते हैं। भारत में शायद ही कोई कंपनी ऐसे उत्पादों के निर्माण में शामिल हो इसलिये इन्हें अपना लगभग हर उत्पाद चीन से आयात करना पड़ता है।

दत्तात्रेय कहते हैं, ‘‘यह हमारे लिये भी एक सीखने वाला अनुभव रहा है। हम भी लगातार ऐसे उतपादों की तलाश में रहते हैं तो बुजुर्गों के लिये मददगार साबित हो सकेें।’’ इसके अलावा यह कंपनी अब अनुकूल कपड़ों के निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख चुकी है जिसमें ये लोग अब बुजुर्गों और विकलांगों के लिये सम्मानजनक कपड़े तैयार करेंगे। सामने आने वाली चुनौतियों और समस्याओं पर पैनी नजर रखते हुए अब इनका प्रयास अपने उत्पादों को परिष्कृत करने का है।

बुजुर्गों के लिये अनुकूलित एक बैकरेस्ट
बुजुर्गों के लिये अनुकूलित एक बैकरेस्ट

भारत में बुजुर्गों की आबादी में तेजी से हो रही बढ़ोतरी को देखते हुए इस कंपनी के संस्थापकों को लगता है कि आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ा बाजार उनका इंतजार कर रहा है।

उत्पादों का मूल्य और इनके द्वारा कमाए जाने वाले फायदा ही उन्हें अलग बनाता है। दत्तात्रेय कहते हैं, ‘‘चूंकि हमारे अधिकतर उपभोक्ता सेवानिवृत्त हैं जो पेंशन के सहारे अपना जीवन-यापन कर रहे हैं इसलिये हमने अपने उत्पादों की कीमतों को तय करते समय बेहद सचेक रहकर इन्हें सस्ते से सस्ता रखने की कोशिश की है। यह हमारे लिये अनिवार्य रूप से एक खुदरा व्यापार है।’’ यह उद्यम इन तीनों के बीच स्ववित्तपोषित है और इन्होंने कहीं बाहर से पैसा लेकर इस व्यापार में नहीं लगाया है।

Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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