एक आदर्श माँ से लेकर आदर्श व्यवसाई तक का सफर तय करने वाली तारा शर्मा सलूजा

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‘‘पीछे मुड़कर देखने पर मुझे यह आभास होता है कि संभवतः मातृत्व ने मुझे एक ही समय में कई कामों को करने में सक्षम बनाते हुए मल्टी-टास्किंग में पारंगत होने में मदद की है। मुझे कल सुबह तक कुछ सामग्री तैयार करके भेजनी है और मुझे यह बात भलीभांति मालूम है कि मैं निर्धारित समय के भीतर इसके निबटा सकती हूँ। लेकिन अगर मैं खुद को कुछ समय वर्ष पूर्व की स्थितियों में रखते हुए गौर करूं तो ऐसी परिस्थिति में मैं परेशान हो गई होती।’’ हैदराबाद में एक टेरेस रेस्त्रां में बैठकर यह कहना है तारा शर्मा सलूजा का। वे अपना एक टीवी शो संचालित करने वाली उद्यमी होने के अलावा एक माॅडल, अभिनेत्री भी हैं।

‘जीवन में हर किसी की अपनी प्राथमिकताओं’ के दर्शन को मानने वाली तारा को विश्वास है कि हर व्यक्ति के लिये नियम अलग होते हैं।

तारा कहती हैं, ‘‘घर में रहकर बच्चों और परिवार को संभालने के साथ व्यापार का संचालन करने वाली माॅमप्रेनर्स और उद्यमियों में बहुत भिन्नता है। मेरे लिये सिर्फ विस्तार करना ही कोई जवाब नहीं है। वर्तमान की बात करें तो मैं एक माॅमप्रेनर और माता के रूप में व्यवहारिक और क्रियाशील संतुलन बनाकर बहुत प्रसन्न हूँ। हो सकता है कि आने वाले कुछ वर्षों में इसमें बदलाव हो लेकिन व्यक्तिगत रूप से मेरे लिये यह एक बेहतरीन अनुभव है।’’

वे खुद को एक पढ़ाकू कहती हैं जिसे हमेशा से ही किताबी कीड़ा बने रहना पसंद है। हाईस्कूल की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ अंक लाने के बाद तारा को छात्रवृति मिली और वे इटली के एड्रियाटिक में स्थित यूडब्लूसी चली गईं। वे बताती हैं कि उस दौर में हालांकि उन्हें कई बार घर की बहुत याद आती थी लेकिन वह अनुभव अपने आप में यादगार था। वे याद करते हुए कहती हैं, ‘‘वहां पर दुनियाभर के 75 देशों से आए लोग मौजूद थे और मैं बेहतरीन सांस्कृतिक आदान-प्रदान से रूबरू होने के अलावा उस पूरे अनुभव से बहुत कुछ सीखने और जानने में सफल रही।’’

एक अंग्रेज और भारतीय माता-पिता की संतान तारा को विश्वास है कि बाहर निकलने और अपने दम पर कुछ करने की बदौलत ही वे यह समझने में कामयाब रहीं कि वास्तव में एक अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत होने का क्या मतलब है। इसके बाद उन्होंने लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स से मैनेजमेंट में बीएससी की डिग्री हासिल की।

अपनी शिक्षा प्राप्त करने के बाद तारा ने सिटीबैंक और एक्सेंचर के साथ प्रशिक्षण प्राप्त किया। वे कहती हैं, ‘‘मैंने हमेशा से ही खुद को एक सूट पहनकर एक काॅर्पोरेट नौकरी करने वाली महिला के रूप में देखा है। मुझे लगता है कि उस समय तक मैंने ऐसा करने के बारे में सोचा तक नहीं था।’’ सिटीबैंक के साथ अपना प्रशिक्षण समाप्त करने के बाद उन्होंने अपने पंखों को फैलाते हुए दुनिया की सैर करने का फैसला किया।

जहां एक तरफ तारा विशुद्ध रूप से किताबों में घुसे रहने वाली रहीं वहीं दूसरी तरफ उनके पिता प्रताप शर्मा एक जाने माने लेखक और नाटककार हैं। ऐसे में उनका सामना माॅडलिंग और अभिनय की दुनिया से होने के अलावा चीजों के रचनात्मक पक्ष से भी होता रहा। तारा कहती हैं, ‘‘पीछे मुड़कर देखने पर मैं यह कह सकती हूँ कि मैंने स्वयं को सुरक्षित करने के लिये ही एक शैक्षिक और काॅर्पोरेट करियर का चुनाव किया। चूंकि मेरे पिता प्रारंभ से ही एक फ्रीलांसर के रूप में काम कर रहे थे ऐसे में उस समय मेरे मन में यह विचार आया कि एक काॅर्पोरेट करियर ही मुझे सुरक्षा प्रदान कर सकता है।’’

लेकिन उन्हें इस बात का विश्वास है कि उनका दिल हमेशा से ही अभिनय और चीजों के रचनात्मक पक्ष की तरफ था। हालांकि उनकी यह चार्टर्ड योजना भविष्य में उस समय काफी काम आई जब उन्हें अपने शो के लिये विज्ञापनदाताओं तक पहुंचना पड़ा। दो वर्षों तक एक्सेंचर के साथ काम करने के बाद उन्होंने माॅडलिंग और अभिनय के क्षेत्र में अपना हाथ आजमाने का फैसला किया।

कुछ समय तक माॅडलिंग करने के बाद उनके पास फिल्मों में काम करने के प्रस्ताव आने लगे। लेकिन फिल्मों की दुनिया एक बिल्कुल ही जुदा माहौल है और एक बेहद व्यवस्थित दुनिया से ताल्लुक रखने वाली तारा ने खुद को एक ऐसे स्थान पर खड़ा पाया जहां काम करने का कोई निश्चित समय नहीं था। हालांकि यह बिल्कुल अलग था लेकिन उन्होंने इसका मजा लिया। वे कहती हैं, ‘‘मेरी की हुई कुछ फिल्में बहुत अच्छी रहीं, कुछ ठीक-ठाक ही रहीं और कुछ तो बहुत ही बुरी साबित हुईं। लेकिन इन सब बातों से मुझपर कोई फर्क नहीं पड़ता।’’

लेकिन यह भी एक कटु सत्य है कि अपने पहले बच्चे के जन्म के बाद तारा के पास फिल्मों का कोई प्रस्ताव नहीं आया।

तारा कहती हैं, ‘‘मेरे पिता हमेशा मुझे समझाते थे के अगर तुम कुछ ऐसा पाना चाहते हो जो मौजूद ही नहीं है तो उसकी रचना करो। अपने आप को दोबारा तैयार करना बहुत आवश्यक है।’’ उसी समय इस बात का अहसास हुआ के उन्हें माँ होने के अलावा बातें करना भी बेहद पसंद है। तारा कहती हैं, ‘‘जबतक आप माँ नहीं बनतीं आप यह नहीं जानतीं कि आप वास्तव में कैसी माता साबित होंगी। मैं एक व्यवहारिक और क्रियशील माँ बनना चाहती थी। इसके बाद मैंने अपने स्वयं के शो प्रारंभ करने का विचार किया।’’

हालांकि वे अपने जीवन में विभिन्न टाॅक शो, कुकरी शो और ऐसे ही कई शो देख चुकी थीं अबतक अनका सामना किसी भी एक ऐसे शो से नहीं हुआ था जो मामृत्व और बच्चों की परवरिश से संबंधित हो। उनका कहना है कि लोग अक्सर आपको माँ बनने पर डराते हैं लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। इस उद्योग के अपने मित्रों से सलाह-मशवरा करने के बाद तारा ने विज्ञापनदाताओं द्वारा प्रायोजित एक शो का निर्माण करने का फैसला किया।

उन्होंने फिशरप्राइस के लिये एक प्रेज़ेंटेशन तैयार की और उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफल रहीं। उनके पति रूपक सलूजा ने उन्हें अपने इस शो को सिर्फ टीवी तक ही सीमित न रखने क अलावा बहु-मंचीय शो बनाने की सलाह दी। ऐसे में शो की स्क्रिप्ट वभिन्न मंचों से जुड़े उनके ब्लाॅग से आती है।

तारा कहती हैं, ‘‘यह बहुत ही फलदायक रहा है। दूसरे सीजन में हमें जानसंस का साथ मिला और हमारा शो कलर्स पर आने में सफल रहा। तीसरे सीजन में हम इसे अंग्रेजी में लाने में सफल रहे और इसके अलावा सामयिक परवरिश के बारे मे भी बात की।’’ इनका प्रारूप अब सेलेब्रिटी और गैर-सेलेब्रिटी और फीचर सेगमेंट पर आधारित है। इस शो के माध्यम से बच्चों की देखभाल और उनके लिये विशेष आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों को विशेष रूप से उठाया जाता है।

तारा कहती हैं, ‘‘जब मैंने पहली बार विभिन्न मशहूर हस्तियों से इस शो पर आने के लिये बात की तो अधिकतर ने एकदम मना कर दिया क्योंकि वे अपने बच्चों के बारे में बात ही नहीं करना चाहते थे। लेकिन अब काजोल, मैरी काॅम और शिल्पा शेट्टी के अलावा कई मशहूर हस्तियां यहां आ चुकी हैं और मुझे इसकी बहुत खुशी है। मुझे लगता है कि एक माँ के तौर पर इतनी बदल चुकी हूं जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। मैं इसका जश्न मनाती हूं और प्रचलित धारणाओं के विपरीत मातृत्व ने मेरे करियर को एक नई दिशा देने में मदद की है।’’

अपने शो में आई अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा के एक जवाब का उदाहरण देते हुए तारा कहती हैं कि मातृत्व ने उन्हें बदला नहीं है बल्कि उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को एक अधिक मजबूत और गूढ़ अर्थ के रूप में सामने लाई है। तारा कहती हैं, ‘‘इसने मेरे सामने मेरी प्राथमिकताओं को अधिक स्पष्ट कर दिया है और इसके अलावा अब मैं एक उद्देश्य और सुरक्षा की भावना से ओतप्रोत होने में सफल रही हूँ।’’


लेखिकाः सिंधु कश्यप

अनुवादकः निशांत गोयल