महिला-पुरुष बराबरी की बहस को कमजोर कर रहे हैं इन कानूनों के दुरुपयोग

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तमाम कुरीतियों, रूढ़ियो से जकड़े हमारे समाज में सदियों से महिलाओं पर अत्याचार किया जाता रहा है। ऊलूल-जुलूल मान्यताओं की वजह से कई बार उनकी जानें तक ले ली गईं। पैसों के लोभ में उन्हें जिंदा जला दिया गया। पुरुषसत्ता की आड़ में उनको हर दिन बारहा हर तरह से उत्पीड़ित किया। लेकिन भारत के संविधान ने उनकी ढाल बनकर, कड़े कानून बनाकर उनकी रक्षा की। लेकिन दुर्भाग्य है कि कुछ कुत्सित मानसिकता की महिलाओं ने इन कानून का भरसक दुरुपयोग किया है और कर रही हैं। 

फोटो: Anisha Tulika
फोटो: Anisha Tulika
महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानून कई मामलों में पुरुषों के लिए प्रताड़ना की वजह बन रहे हैं। यह बात हम नहीं बल्कि फैमिली काउंसलिंग बोर्ड व अन्य परामर्श केंद्रों पर आने वाली शिकायतों का पैटर्न कहता है। यहां शिकायत करने वालों में 40 फीसदी पुरुष होते हैं। 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 में धारा 498 A के तहत दर्ज मामलों में 1 लाख 97 हजार 762 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें लगभग एक चौथाई यानी 25 फीसदी महिलाएं थीं। इन महिलाओं में शिकायत करने वाली महिला की सास और ननद भी शामिल थीं। धारा 498 A के तहत दर्ज मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर सिर्फ 15 फीसदी है। 

तमाम कुरीतियों, रूढ़ियो से जकड़े हमारे समाज में सदियों से महिलाओं पर अत्याचार किया जाता रहा है। ऊलूल-जुलूल मान्यताओं की वजह से कई बार उनकी जानें तक ले ली गईं। पैसों के लोभ में उन्हें जिंदा जला दिया गया। पुरुषसत्ता की आड़ में उनको हर दिन बारहा हर तरह से उत्पीड़ित किया। लेकिन भारत के संविधान ने उनकी ढाल बनकर, कड़े कानून बनाकर उनकी रक्षा की। लेकिन दुर्भाग्य है कि कुछ कुत्सित मानसिकता की महिलाओं ने इन कानून का भरसक दुरुपयोग किया है और कर रही हैं। उनकी इन हरकतों की वजह से महिला-पुरुष की बराबरी की कवायद को बहुत चोट पहुंच रही है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानून कई मामलों में पुरुषों के लिए प्रताड़ना की वजह बन रहे हैं। यह बात हम नहीं बल्कि फैमिली काउंसलिंग बोर्ड व अन्य परामर्श केंद्रों पर आने वाली शिकायतों का पैटर्न कहता है। यहां शिकायत करने वालों में 40 फीसदी पुरुष होते हैं। पुलिस भी मानती है कि महिला प्रताड़ना की शिकायत के कई मामलों में पुरुष दोषी नहीं होते, फिर भी कानूनी बाध्यता के कारण उन्हें शिकायतें लेनी पड़ रही हैं। कुछ महिलाएं अधिकार को बदला लेने का हथियार बना रही हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2012 में धारा 498 A के तहत दर्ज मामलों में 1 लाख 97 हजार 762 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें लगभग एक चौथाई यानी 25 फीसदी महिलाएं थीं। इन महिलाओं में शिकायत करने वाली महिला की सास और ननद भी शामिल थीं। धारा 498 A के तहत दर्ज मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसदी है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर सिर्फ 15 फीसदी है। वर्ष 2011 से 2013 के दौरान देशभर में धारा 498 A के तहत दर्ज 31 हजार 293 मामले फर्जी साबित हुए। ये आंकड़े इस तरफ इशारा करते हैं कि उपयोग के साथ साथ धारा 498 A का दुरुपयोग भी हो रहा है। इसके अलावा फैमिली काउंसलिंग सेंटर व शहर के कई काउंसलर्स के पास पिछले कुछ वर्षों में घरेलू हिंसा व प्रताड़ना के शिकार पुरुष ज्यादा पहुंच रहे हैं। इनमें 50 फीसदी पुरुष 35 साल से अधिक उम्र के हैं। पहले महिलाएं दहेज के केस की शिकायतें करती थीं। मगर रेप के जुड़े कानून में संशोधन के बाद पुलिस के पास रेप की शिकायतें ज्यादा पहुंच रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें युवक-युवती लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं। मगर उनके बीच कोई झगड़ा या मतभेद हो जाने पर युवती रेप का इल्जाम लगा देती है। ऐसे में युवक के पास बचाव के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाता। ऐसे मामलों में पुलिस युवक को ही दोषी मान लेती है।

मनोवैज्ञानिक नीता वाडिया बताती हैं, हमारे पास आए घरेलू हिंसा के 10 में से 4 केस ऐसे होते हैं, जिसमें महिलाएं उन्हें मिले कानूनी अधिकार का दुरुपयोग करती हैं। ज्यादातर महिलाएं प्रॉपर्टी अपने नाम करवाने, सैलरी आधी लेने की बात पर झूठी शिकायतें करती हैं। कई महिलाओं द्वारा पुरुषों को मारने-पीटने की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे मामलों में पुरुषों को काउंसलिंग सेंटर, पारिवारिक परामर्श केंद्र में जाकर मदद लेनी चाहिए। कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, किसी एक को विशेष कानूनी अधिकार प्रदान कर देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। स्त्री और पुरुष दोनों ही कानून की दृष्टि से बराबर हैं। दोनों में किसी एक को प्रमुखता मिलना कहीं हमारे सामाजिक व पारिवारिक विघटन का कारण नहीं बन जाए। फैमिली कोर्ट में ऐसे कई केस देखने को मिल जाएंगे जिसमें पतियों की पत्नियों द्वारा लगाए गए झूठे आरोपों के कारण आत्महत्या करनी पड़ी तो कई पतियों को अत्यधिक मानसिक तनाव झेलने के उपरांत पागलखाने में ताउम्र मानसिक रोगी बनकर रहने की सजा भुगतनी पड़ी।

वो कानून जिनका होता है सबसे ज्यादा दुरुपयोग

डॉमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 और भरण-पोषण का अधिकार सीआरपीसी 125-

शादीशुदा या अविवाहित स्त्रियां अपने साथ हो रहे अन्याय व प्रताड़ना के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के अतंर्गत केस दर्ज कराकर उसी घर में रहने का अधिकार पा सकती हैं जिसमें वे रह रही हैं। यदि किसी महिला की इच्छा के विरूद्ध उसके पैसे , शेयर्स या बैंक अकाउंट का इस्तेमाल किया जा रहा है तो इस कानून का इस्तेमाल करके वह इसे रोक सकती हैं। इस कानून के अंतर्गत घर का बंटवारा कर महिला को उसी घर में रहने का अधिकार मिल जाता है और उसे प्रताडत करनेवालों को उससे बात तक करने की इजाजत नहीं दी जाती। विवाहित होने की दशा में अपने बच्चो की कस्टडी और मानसिक/शारीरिक प्रत़ाडना का मुआवजा मांगने का अधिकार भी है। सीआरपीसी की धारा 125 यानि भरण पोषण का अधिकार देने वाली धारा का भी काफी दुरुपयोग हो रहा है। इस धारा के अनुसार तलाक हो जाने पर या पत्नी को परेशान करने पर पति को हर महीने उसका भरण पोषण देना पड़ेगा। 

हाल ही में दिल्ली की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के एक मामले में महिला को मिलने वाले 5,500 रुपए के मासिक अंतरिम भत्ते में इजाफा कर उसे 25,000 रुपए करने की मांग की याचिका को खारिज कर दिया और अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि महिला पढ़ी-लिखी है। महिला के पास एमए, बीएड और एलएलबी जैसी डिग्रियां हैं और वह खुद कमा सकती है, इसलिए उस से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह घर पर आलसी की तरह बैठे और पति की कमाई पर मुफ्तखोरी करे। महिला ने हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ता दिए जाने की गुहार लगाई थी। एडवोकेट अनुपमा गुप्ता बताती हैं, 'वैवाहिक विवादों से संबंधित मामलों में कई कानूनी प्रावधान हैं, जिन के जरिए पत्नी गुजारा भत्ता मांग सकती है। सीआरपीसी, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू अडौप्शन ऐंड मेंटिनैंस ऐक्ट और घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ते की मांग की जा सकती है। अगर पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर अनबन हो जाए और पत्नी अपने पति से अपने और अपने बच्चों के लिए गुजारा भत्ता चाहे तो वह सीआरपीसी की धारा-125 के तहत गुजारे भत्ते की अर्जी दाखिल कर सकती है। लेकिन कई महिलाएं कानून का दुरुपयोग करते हुए अपने पति से भारी रकम वसूलती हैं।'

दहेज उन्मूलन कानून, आईपीसी सेक्शन 498A-

दहेज कानून का आज सबसे ज्यादा दुरूपयोग हो रहा है। महिलाओं को दहेज उत्पीड़न के सामाजिक अभिशाप से बचाने के लिए संसद ने वर्ष 1983 में भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी में धारा 498 A को जोड़ा था। हमारे देश में दहेज हत्याओं के कड़वे सच को नकारा नहीं जा सकता लेकिन इस सच का एक पहलू ये भी है कि धारा 498 A का गलत इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के लिए ये एक हथियार की तरह है जिसके जरिये वो अपने गलत इरादों को पूरा करती हैं। राहत की बात ये है कि अब दहेज उत्पीड़न मामले में केस दर्ज होते ही गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2017 को दहेज कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने नाराज पत्नियों द्वारा अपने पति के खिलाफ दहेज-रोकथाम कानून का दुरुपयोग किए जाने पर चिंता जाहिर करते हुए निर्देश दिए कि इस मामले में आरोप की पुष्टि हो जाने तक कोई गिरफ्तारी ना की जाए। कोर्ट ने माना कि कई पत्नियां आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग करते हुए पति के माता-पिता, नाबालिग बच्चों, भाई-बहन और दादा-दादी समेत रिश्तेदारों पर भी आपराधिक केस कर देती हैं।

जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने कहा कि अब समय आ गया है जब बेगुनाहों के मनवाधिकार का हनन करने वाले इस तरह के मामलों की जांच की जाए। कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइडलाइंस के मुताबिक, हर जिले में एक परिवार कल्याण समिति गठित की जाएगी और सेक्शन 498A के तहत की गई शिकायत को पहले समिति के समक्ष भेजा जाएगा। यह समिति आरोपों की पुष्टि के संबंध में एक रिपोर्ट भेजेगी, जिसके बाद ही गिरफ्तारी की जा सकेगी। बेंच ने यह भी कहा कि आरोपों की पुष्टि से पहले एनआरआई आरोपियों का पासपोर्ट भी जब्त नहीं किया जाए और ना ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी हो।

कोई व्यापक और समर्थ कानून अपने साथ उसके दुरुपयोग की संभावनाएं भी लाता है। हमारे नीति नियंताओं को बड़ी ही दूरदर्शिता और समझदारी से इन कानूनों का निर्माण करने की आवश्यकता है। हजारों दोषी छूट जाएं लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए। यही हमारी न्याय प्रणाली भी कहती है।

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