सलमान खान को सजा दिलाने में एक वन अधिकारी और डीएनए एक्सपर्ट ने निभाई अहम भूमिका

इन दो लोगों की वजह से हुई बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को सजा...

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20 साल तक चले चिंकारा हिरन केस में आखिरकार जोधपुर हाईकोर्ट ने बॉलिवुड ऐक्टर को पांच साल की कारावास की सजा सुना दी। लेकिन यह सजा उन अधिकारियों के बगैर संभव नहीं हो पाती जिन्होंने ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दिया। इन दो महत्वपूर्ण शख्सियतों में एक भारतीय वन सेवा अधिकारी हैं और दूसरे हैदराबाद की डीएनए लैब के वैज्ञानिक।

डॉ. जीवी राव (दाहिने)
डॉ. जीवी राव (दाहिने)
सलमान खान के मामले को देखने वाले वैज्ञानिक जीवी राव हैदराबाद के सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD) के पूर्व चीफ स्टाफ रह चुके हैं। अक्टूबर 1998 में राजस्थान के कांकाणी गांव में सलमान खान पर काले हिरण का शिकार करने का केस दर्ज हुआ था।

20 साल तक चले चिंकारा हिरन केस में आखिरकार जोधपुर हाईकोर्ट ने बॉलिवुड ऐक्टर को पांच साल की कारावास की सजा सुना दी। लेकिन यह सजा उन अधिकारियों के बगैर संभव नहीं हो पाती जिन्होंने ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दिया। इन दो महत्वपूर्ण शख्सियतों में एक भारतीय वन सेवा अधिकारी हैं और दूसरे हैदराबाद की डीएनए लैब के वैज्ञानिक। सलमान खान के मामले को देखने वाले वैज्ञानिक जीवी राव हैदराबाद के सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD) के पूर्व चीफ स्टाफ रह चुके हैं। अक्टूबर 1998 में राजस्थान के कांकाणी गांव में सलमान खान पर काले हिरण का शिकार करने का केस दर्ज हुआ था।

जीवी राव ने बताया कि सलमान खान के इस मामले से पहले भारत में जानवरों के शिकार की पहचान मानव विज्ञान की पुरानी विधियों द्वारा ही की जा सकती थी। लेकिन यह काम एक युवा वन अधिकारी ललित बोड़ा के बगैर असंभव था। जिसने उस हिरण के शव को खोदकर निकाला और परीक्षण के लिए CDFD की मदद ली। डॉ. राव ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा, 'वन अधिकारी ने मुझसे कहा था कि कोर्ट में रिपोर्ट तभी स्वीकार होगी जब वैज्ञानिक तरीके से यह साबित हो जाएगा कि वह हिरण सामान्य नहीं चिंकारा हिरण था।' उसके पहले यह बात चल रही थी कि वह चिंकारा हिरण नहीं था।

इस बात की पहचान करने के लिए डॉ. राव ने हिरण के शव से खाल और हड्डियों से डीएनए के सैंपल लिए। उन्होंने इस काम को चैलेंज की तरह लिया और हैदराबाद के चिड़ियाघर में रहने वाले चिंकारा हिरण के खून का सैंपल एकत्र किया। इसके बाद पॉलीमर्स चेन रिऐक्शन (PCR) विधि से यह पता लगाने की कोशिश की कि हिरण का शव चिंकारा का ही है या नहीं। उन्होंने एंप्लीफाइड पॉलिमोर्फिक डीएनए तकनीक का भी सहारा लिया। आखिरकार उन्होंने अपने शोध से यह साबित कर दिया कि जिस हिरण का शिकार किया गया था वह चिंकारा ही था।

सन् 2000 में कोर्ट में डीएनए रिपोर्ट को पेश किया गया। लेकिन कहानी यहीं नहीं खत्म हुई। बाद में डॉ. राव के साथ काम करने वाले डॉ. सुनील कुमार वर्मा ने डॉ. लाल जी सिंह के साथ मिलकर हैदराबाद के ही सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी में इस डीएनए से यूनिवर्सिल प्राइमर टेक्नॉलोजी (UPT) विकसित की। UPT एक ऐसी विधि होती है जिसकी मदद से चिड़िया, मछली, सरीसृप या किसी भी स्तनधारी जीव की पहचान एक छोटे से बायोलॉजिकल सैंपल से की जा सकती है। इन्हीं प्रयासों की बदौलत अब वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में फरेंसिक तकनीकों का दायरा बढ़ चुका है। दुर्लभ जंतुओं के शिकार के मामले में जब पहचान की बात आती है तो ये लैब अहम भूमिका निभाती हैं।

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