छत्तीसगढ़ में कुपोषित बच्चों की सेहत सुधरने के साथ-साथ हुआ 13 हज़ार लड़कियों का विवाह

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यह लेख छत्तीसगढ़ स्टोरी सीरीज़ का हिस्सा है...

छत्तीसगढ़ में कुपोषित बच्चों और गर्भवती माताओं को पौष्टिक आहार देकर बीमारी से लड़ने के काबिल बनाने का काम महिला एवं बाल विकास विभाग कर रहा है। यही नहीं गरीब परिवार के लड़कियों के विवाह की चिंता भी यही करता है। महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देना और ऋण देकर उन्हें स्वावलंबी बनाने का काम भी बखूबी किया जा रहा है। 

राज्य को कुपोषण से मुक्त करने के लिए 2012 से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए वजन त्योहार का आयोजन किया जाता है ताकि कुपोषित बच्चों की पहचान की जा सके।

मुखिया जब खुद ही डॉक्टर हो तो राज्य कैसे बीमार रह सकता है। सेहत बिगड़ने पर संभालने की जिम्मेदारी तो स्वास्थ्य विभाग ने संभाल रखी है, लेकिन कुपोषित बच्चों और गर्भवती माताओं को पौष्टिक आहार देकर बीमारी से लड़ने के काबिल बनाने का काम महिला एवं बाल विकास विभाग कर रहा है। यही नहीं गरीब परिवार के लड़कियों के विवाह की चिंता भी यही करता है। महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देना और ऋण देकर उन्हें स्वावलंबी बनाने का काम भी बखूबी किया जा रहा है। बाल विकास के कामों पर नजर डालें तो सबसे बड़ा हुआ है आंगनबाड़ी केंद्रों को लेकर। आपको बता दें कि वर्ष 2003-04 के दौरान प्रदेश में समेकित बाल परियोजनाएं संचालित थीं।

तब 20 हजार 289 आंगनबाड़ी केंद्र और 836 मिनी आंगनबाड़ी केंद्र थे। इन 14 सालों में 46 हजार 660 बड़े और पांच हजार 814 छोटे आंगनबाड़ी केंद्रों को स्वीकृति दी गई। पहले साढ़े 17 लाख गर्भवती, शिशुवती माताओं और बच्चों को लाभ मिल रहा था। अब यह संख्या बढ़कर 27 लाख तक पहुंच गई है। इसी तरह गंभीर कुपोषित बच्चों को कुपोषण के चक्र से बाहर निकालने के लिए मुख्यमंत्री संदर्भ योजना शुरू की गई। इससे 6 लाख 33 हजार 139 बच्चों को फायदा हुआ। राज्य को कुपोषण से मुक्त करने के लिए 2012 से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए वजन त्योहार का आयोजन किया जाता है ताकि कुपोषित बच्चों की पहचान की जा सके। इस दौरान किसी गांव में संख्या ज्यादा हुई तो वहां नवाजतन कार्यक्रम चलाकर उन बच्चों को पौष्टिक आहार और परिजनों को समझाइश देकर सामान्य स्तर पर लाने के प्रयास किए जाते हैं। ऐसे करीब एक लाख 37 हजार बच्चों की सेहत सुधारी गई है।

इन्हीं कार्यक्रमों और योजनाओं के चलते कुपोषण में कमी आई है 47.1 से घटकर 37.7 प्रतिशत हो गया है। बौनेपन के आधार पर कुपोषण में आई कमी 15.3 प्रतिशत है और इसे लाने के लिए राज्य को देश में सर्वोत्कृष्ठ सम्मान मिल चुका है। राज्य के 17 जिलों में विश्व बैंक की सहायता से इस्निप परियोजना 2014 से संचालित की जा रही है। इसमें महासमुंद, कोरबा, दुर्ग, कवर्धा, जशपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा, जशपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर, नारायणपुर, रायपुर, बेमेतरा, बालोद, सुकमा, कांडागांव, बेमेतरा और बलौदाबाजार शामिल है। इनमें से सात जिलों दुर्ग, रायपुर, महासमुंद, रायपुर, बेमेतरा, बालोद और कवर्धा के कुल 8500 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मोबाइल फोन और 330 पर्यवेक्षकों को टैबलेट वितरित किए गए हैं। गर्भवती माताओं को टेलीफोनिक परामर्श देने के लिए न्यूट्रि क्लिनिक केंद्र की स्थापना भी की गई है।

ये तो हुई सेहत और पोषण की बात। विभाग की दूसरी योजनाओं पर नजर डालें तो सरकार महिलाओं को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाने भरसक प्रयास कर रही है और इसमें मिल रही सफलता भी उल्लेखनीय है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के तहत पूरे देश में चयनित 100 जिलों में रायगढ़ भी शामिल है। यहां बाल लिंगानुपात 918 से बढ़कर 934 हो गया है। इसी तरह नोनी सुरक्षा योजना, महिला पुलिस वालिंटियर, महिला जागृति शिविर जैसे कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। वहीं छत्तीसगढ़ महिला कोष की ऋण योजना से महिलाएं खुद का व्यवसाय कर आत्मनिर्भर हो रही हैं। इसी तरह महिलाओं पर हो रहे अत्याचार सखी वन स्टॉप सेंटर संचालित किए जा रहे हैं ताकि पीड़ित व संकट ग्रस्त महिला को एक ही छत के नीचे सविधा व सहायता तत्काल मिल सके। यह योजना रायपुर जिले से शुरू की गई थी अब प्रदेश के 26 जिलों में इसका संचालन हो रहा है। प्रदेश में अब तक दर्ज 3569 प्रकरणों में से 2405 का निराकरण हो चुका है। बाकि 966 में पीड़िता को आश्रय प्रदान किया गया है।

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