शहरी जीवन में बढ़ते तनाव से खूंखार हो रहे पशु-पक्षी

इंसान की गल्तियों की कीमत चुका रहे भोले पक्षी...

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शोध विज्ञानियों ने खुलासा किया है कि आधुनिक शहरीकरण, तेजी से बदलता वातावरण, आतिशबाजी, शोर-शराबे से पशु-पक्षी तनावग्रस्त हो रहे हैं। उनके स्वभाव में आश्चर्यजनक बदलाव आ रहा है। अनेक गैरसरकारी संगठन और सेंटर फॉर सांइस एंड एन्वॉयरमेंट इस पर अपनी चिंताएं जता चुका है, लेकिन लोग हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। सामाजिक दृष्टि से भी यह एक बेहद खतरनाक स्थिति है।

फोटो साभार: Shutterstock
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आतिशबाजी का पशु-पक्षियों पर घातक असर हो रहा है। वे सहम कर छिप जाते हैं। यहां तक कि खाना भी छोड़ देते हैं। पशु पक्षियों की हृदय गति और तनाव का स्तर बढ़ जाता है और कुछ पक्षी तो बहरे भी हो जाते हैं। यूरोप और अमेरिका में इस विषय पर काफी शोध हो चुका है। दिवाली की रात पशु अस्पतालों में कई ऐसे पक्षी लाए जाते हैं जो ध्वनि प्रदूषण के कारण बेसुध या सहम जाते हैं। 

आदिकाल से ही सामाजिक और नैसर्गिक जीवन में पशु-पक्षियों से भी हमारे गहरे सरोकार रहे हैं, जो आजकल काफी तनावग्रस्त रह रहे हैं। ऐसे शोध निष्कर्ष मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि वह लीक से हटकर व्यवहार करने लगे हैं। ध्यान कीजिए कि आज से ढाई-तीन दशक पहले शहर की सड़कों के आसपास के कुत्ते, बिल्ली, गाय-भैंस एक हॉर्न पर कोसों दूर तक भाग खड़े होते थे, आज ठसाठस ट्रैफिक के बीच से दुबक कर बचते-बचाते सड़क के दूसरी तरफ निकल लेते हैं। रोजाना ही प्रायः ऐसा भी देखा जाता है कि हॉर्न मारते रहिए, वह अपनी जगह से टस-से-मस नहीं होते हैं।

शहरों में अब आए दिन किसी न किसी बहाने प्रायः 120 डेसिबल से भी ज्यादा पॉवरफुल पटाखों की आतिशबाजियां होने लगी हैं। इससे पशु-पक्षी विचलित हो जाते हैं। पीपुल्स फॉर एनिमल के सौरभ बताते हैं कि अस्पताल में ऐसे कई लोग पटाखों के शोर के कारण डर से गिरे पक्षियों को लेकर पहुंचते रहते हैं। जानकारी मिलती है कि कई कुत्ते तो शोर के कारण अपना इलाका ही छोड़कर चले गए। सेंटर फॉर सांइस एंड एन्वॉयरमेंट इस पर कई बार चिंता जता चुका है। गैर सरकारी संगठन ट्री फॉर लाइफ एन्वॉयरमेंट की अध्यक्ष कविता अशोक बताती हैं कि आतिशबाजी का पशु-पक्षियों पर घातक असर हो रहा है। वे सहम कर छिप जाते हैं। यहां तक कि खाना भी छोड़ देते हैं। पशु पक्षियों की हृदय गति और तनाव का स्तर बढ़ जाता है और कुछ पक्षी तो बहरे भी हो जाते हैं। यूरोप और अमेरिका में इस विषय पर काफी शोध हो चुका है। दिवाली की रात पशु अस्पतालों में कई ऐसे पक्षी लाए जाते हैं जो ध्वनि प्रदूषण के कारण बेसुध या सहम जाते हैं। 

लेग्वेस्की कहता है कि पशु-पक्षी पालना अच्छी बात है, इससे सकारात्मक ऊर्जा मिलती है, मन खुश होता है लेकिन ध्यान रखिए, पशु-पक्षी पालना केमिस्ट की दुकान से दवा लेने के बराबर नहीं है। पशु-पक्षी की सही देखभाल की भी आवश्यकता होती है। इनकी सही देखभाल नहीं होने पर तनाव बढ़ता है। यदि आपके पास पशु-पक्षी की देखभाल करने का समय हो, तभी आप इन्हें पालें, वरना तनाव दूर होने के बजाय बढ़ जाएगा। आज की भागदौड़ भरी सबकी जिंदगी तनाव भरी है लेकिन पशु-पक्षियों के विचलित होने का मतलब है, हमारी हरकतों से पूरी प्रकृति तनाव में है। शोध कर्ताओं बता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण ने सबसे ज्यादा पक्षियों को तनावग्रस्त किया है। एक ऐसी ही पुष्टि जबलपुर (म.प्र.) के नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में हुए एक शोध से हुई है। 

शोधकर्ता डॉ आदित्य मिश्रा ने अपने शोध में सिद्ध किया है कि बढ़ते तापमान और ज़रूरी खान पान के अभाव में मुर्गियों में तनाव बढ़ रहा है। मुंह खोलकर ज़ोर ज़ोर से सांस ले रही मुर्गी देखें तो समझ लीजिए कि वह भारी तनाव में है। इससे उनकी अंडे देने की क्षमता और वजन में कमी आ रही है। शोध के दौरान जब ऐसे मुर्गे-मुर्गियों को अपेक्षित तापमान और विटामिन ई व सी दिया गया तो वह स्वस्थ दिखने लगे। यही वजह है कि अक्सर किसी पोल्ट्री फॉर्म में गर्मियो में मुर्गियों का मरना आम बात हो गई है। अंडों की उत्पादकता और बॉयलर में घटते वजन पर मध्यप्रदेश बायो टैक्नोलॉजी काउंन्सिल की ओर से चिंता भी व्यक्त की जा चुकी है।

उल्लेखनीय है कि मनुष्येत्तर प्राणी भी अपनी मूल प्रकृति में उदार होते हैं। कई बार तो मनुष्यों से ज्यादा उनका व्यवहार प्राकृतिक होता है। ध्यानपूर्वक देखा जाय तो मानवी भाव संवेदनाओं की पशु पक्षियों में भी कमी नहीं होती है। अपनी संतानों के लालन-पालन में उनका वात्सल्य निश्चय ही अपेक्षाधिक दिखता है। प्रकृति ने पशु-पक्षियों को अपना-पराया पहचानने तथा भेद और आचरण करने की विलक्षण योग्यता प्रदान की है। विभिन्न प्रयोग इसके साक्षी हैं। सियरा नेवादा (अमेरिका) में 14 फीट की बर्फ जम जाती है। भीषण जाड़ा पड़ता है। “वेलिंग“ नामक गिलहरी दीर्घ शीत निद्रा के बाद बर्फ कुतरकर बाहर निकल आती है। पांल शर्मान तथा सहयोगियों के एक दल ने लगातार नौ वर्षों तक इन गिलहरियों का अध्ययन किया। करर्नेल विश्व विद्यालय के जीव शास्त्र के मूर्धन्य शर्मान पता लगा रहे थे कि गिलहरियाँ कैसे अपने संबंधी लोगों को पहचान लेती हैं और वैसा ही व्यवहार करने लगती हैं। अकेले शर्मान ही नहीं विश्व के अनेकानेक विश्व विद्यालयों के पशु पक्षियों की पहचान तथा तत्संबंधी व्यवहार एवं पूरे खानदान की अन्तः भावनाओं पर शोध कर रहे हैं।

प्रकृति में विशेषतः पशु-पक्षी जगत में रक्त की नजदीकी के अनुसार अच्छा या बुरा व्यवहार की परम्परा का होना एक महत्वपूर्ण पैरामीटर समझा जाता है। जीवन शास्त्रविदों के सामने यह प्रश्न है कि पशु पक्षी रक्त संबंध को कैसे पहचान जाते हैं। प्रकृति ने उसके लिए कौन से संयंत्र उनके पास लगाए हैं। दूसरा सवाल यह है कि पशुओं में अपना और पराया क्यों व कैसे होता है, उसे जानकर वे अपना व्यवहार कैसे परिवर्तित कर लिया करते हैं। कौन हमारे परिवार का है और कौन बाहरी और इसके अनुसार क्यों वे अपने व्यवहार को सतत बदलते रहते हैं। प्रयोग से यह देखा गया है कि गिलहरियों की मादा अपने जान की भी बाजी लगाकर अपनी बहन तथा बेटियों को भय का संकेत देकर उन्हें बचा लेती है। मेंढकों में कुछ इतने परिवार प्रेमी होते हैं कि वे सिर्फ अपने सगे भाई-बहन के ही साथ घूमना पसंद करते हैं। मधु मक्खियाँ अपने छत्ते में उन्हीं मक्खियों को प्रवेश करने देती हैं, जो उनके छत्ते की ही होती हैं। छत्ते से बाहर वाली मधुमक्खियों को वे खदेड़ देती हैं। सोशियो बॉयलोजी विज्ञान शाखा के एक महत्वपूर्ण ब्रिटिश सिद्धान्तकार विलियम मिल्टन बताते हैं कि शिकारी जानवर जमीन पर दौड़ने वाली गिलहरियों में सबसे पहले उन गिलहरियों का शिकार करते हैं, जो ठीक समय पर अपनी जान को खतरे में डालकर शिकारी के आगमन की अपने संबंधियों को सूचना प्रसारित कर देती हैं।

आज, जबकि वातावरण स्वेच्छाचारी जीव-जंतुओं, पशु-प्राणियों को विचलित कर रहा है, उनसे हाव-भाव साफ-साफ बदले-बदले से नजर आने लगे हैं। देखने में आता है कि पालतू कुत्ता अचानक आक्रामक हो जाता है, बिल्ली पंजे मारने लगती है, आखिर वे ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं, शायद ही इस तरफ कभी ध्यान गया हो, जानवरों और पशु पक्षियों का भी इंसानों की तरह मूड बदल जा रहा है, उन्हें तनाव और परेशानी हो रही है। अकेले रहने पर उन्हें भी बुरा लगता है। 

शोध रिसर्च के भी मनोवैज्ञानिक कारण बता रहे हैं। पैट बिहेवियर विशेषज्ञ कॉलिन बताते हैं कि अकेले रहने पर कुत्ते (सेपरेशन एनजाइटी का शिकार) चिंतित हो जाते हैं। इससे उसका व्यवहार आक्रामक हो जाता है। जंगली कुत्ते जैसा व्यवहार करने लगते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए उन्हें ज्यादा लाड-प्यार की आदत डालना खतरनाक है। पैट भी बोरियत के शिकार होते हैं। इससे उनमें चीजों को तहस-नहस करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। आजकल तो पालतू कुत्ते-बिल्लियों के लिए हर्बल दवाओं की अच्छी-खासी रेंज आ गई है। ताजा अनुसंधान से पता चला है कि पशु-पक्षियों में भी परोपकार की प्रवृत्ति होती है। इसकी पुष्टि पेरिस के एक कब्रिस्तान हुई है, जहाँ लगभग सवा सौ ऐसे जीव जन्तु दफनाये गए हैं, जिन्होंने अपने तुच्छ जीवन को महानता से जोड़ लिया। प्रवेश शुल्क भुगतान कर देने के बाद ज्यों ही दर्शक एक कलात्मक द्वार से घुसता है, सबसे पहले उसे एक कुत्ते की मूर्ति बरबस आकृष्ट कर लेती है। इस कुत्ते ने अपने जीवन काल में एक-दो नहीं, बल्कि चालीस ऐसे व्यक्तियों की जान बचायी, जिन्हें समय पर उससे मदद न मिलने पर संभवतः मार दिया गया होता।

आज, जबकि तनावग्रस्त हो रहे पशु-पक्षियों को बचाने की, उनकी संरक्षा की जरूरत है, इसे लेकर आज विश्व-मंचों पर भी गहरी मंत्रणाएं चल रही हैं। वन्य-प्राणियों के जानकार एवं संरक्षण विशेषज्ञ गेरहार्ड आडाम्स का कहना है कि नगरों, महानगरों जैसे रिहायशी इलाकों के अलावा जंगलों को काटने या कानून तोड़ने वालों पर भी अब सख्ती बहुत जरूरी हो गई है। वातावरण बदलने से नभचर ही नहीं, जलचर भी बहुत विचलित और तनावग्रस्त हो रहे हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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