एक अरब डॉलर की ओर ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार 

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लोगों की निजी आवश्यकताओं में अब तेजी से ऑर्गेनिक खर्च जुड़ते जा रहे हैं। नए ऑर्गेनिक उत्पाद तेजी से बढ़ रहे हैं। नई समझ है कि बेहतर सेहत के लिए प्राकृतिक खानपान जरूरी है। विषाक्त परिवेश में ऑर्गेनिक उत्पाद हाथों-हाथ बिक रहे हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
एसोचैम की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय डिब्बाबंद ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार एक अरब डॉलर का भी आंकड़ा पार कर सकता है। इसके सालाना 17 फीसदी की दर से बढ़ने की संभावना है।

सरकारी, सियासी भाषा में एक प्रचलित कहावत है कि 'गांव बढ़े तो देश बढ़े'। गांव के लोग कहते हैं कि 'बढ़े पूत पिता के धर्मे, खेती बढ़े अपने कर्मे'। सवाल उठता है कि देश की कृषि को उन्नति की दिशा में ले जाने के लिए कृषि-कर्म में कितनी सार्थक पहल हो रही है, कितनी निरर्थक। आज कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों का बढ़ रहा अंधाधुंध प्रयोग तथा मृदा के ह्रास की स्थिति और उत्पादकता हमारे देश में चिंता का विषय बन चुकी है लेकिन सुरक्षित और स्वस्थ भोजन के लिए बढ़ती जागरूकता ने जैविक खेती के महत्व को रेखांकित किया है, जो बाहरी निविष्टियों के उपयोग को न्यूनतम करने और कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग को टालने के बुनियादी सिद्धांत पर आधारित एक समग्र प्रणाली है। इन्ही चुनौतियों को देखते हुए देश में गुणवत्तायुक्त ऑर्गेनिक-बायोलोजिकल निविष्टियों के उत्पादन के लिए बुनियादी ढांचे को बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

इसके तहत ही जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के तहत ऑर्गेनिक-बायोलोजिकल निविष्टियों के लिए वाणिज्यिक उत्पादन इकाइयों के लिए पूंजी निवेश सब्सिडी योजना शुरू की गई है। यह योजना नाबार्ड या राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के सहयोग से कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र (एनसीओएफ़) के माध्यम से कार्यान्वित की जा रही है। जैव उर्वरकों, जैव कीटनाशकों और फल एवं सब्जी बाजार अपशिष्ट खाद जैसे ऑर्गेनिक निविष्टियों को उपलब्ध कराकर देश में जैविक खेती को बढ़ावा देना और इस तरह के उत्पाद के लिए बेहतर प्रतिफल सृजित करना इसका उद्देश्य है। इसके कई और मकसद हैं, मसलन, मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा को बनाए रखते हुए कृषि उत्पादकता बढ़ाना, देश में जैव उर्वरकों, जैव कीटनाशकों और कम्पोस्ट की उपलब्धता बढ़ाकर और गुणवत्ता में सुधार के द्वारा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर कुल निर्भरता कम करना, जैविक कचरे को पौधा पोषक तत्व संसाधनों में परिवर्तित करना, जैविक कचरे के उचित रूपांतरण और उपयोग से प्रदूषण और पर्यावरण के क्षरण को रोकना।

खेती के लिए इस गंभीर पहल से जैव उर्वरक और जैव कीटनाशक उत्पादन इकाइयों, फल एवं सब्जी अपशिष्ट खाद इकाइयों, किसानों, उत्पादक समूहों, स्वामित्व और साझेदारी फर्मों, सहकारिता, उर्वरक उद्योगों, कंपनियों, निगमों, गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ), कृषि उत्पादन बाजार समितियों, निजी उद्यमियों आदि को प्रत्यक्ष लाभ देखा जा रहा है। ऑर्गेनिक उत्पाद बेचने वाली कंपनियां और सजग उपभोक्ता मिलकर एक नए तरह के उद्योग को ठोस शक्ल तो दे रहे हैं लेकिन नीतिगत खामियों को दुरूस्त किए बगैर आगे की राह आसान नहीं दिखती है। गौरतलब है कि हमारे देश में अब तेजी से ऑर्गेनिक एक जरूरी खर्च होता जा रहा है। नए ऑर्गेनिक उत्पाद तेजी से बढ़ रहे हैं। इन ब्रांड की कामयाबी अतीत की उस समझ को नए कलेवर में पेश करने का नतीजा है जिसके मुताबिक बढिय़ा सेहत के लिए प्राकृतिक खानपान जरूरी होता है। जहरीले माहौल में ऑर्गेनिक जैसा कोई भी उत्पाद किसी नए विज्ञान की तरह हाथों-हाथ बिकता है।

एसोचैम की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय डिब्बाबंद ऑर्गेनिक उत्पादों का बाजार एक अरब डॉलर का भी आंकड़ा पार कर सकता है। इसके सालाना 17 फीसदी की दर से बढ़ने की संभावना है। उपभोक्ता भी, जहां मार्केटिंग के दौरान 'ताजा' एवं 'प्राकृतिक' शब्दों के अतिशय इस्तेमाल को लेकर अब नाखुशी जताते हैं, 'ऑर्गेनिक' उन्हें आकर्षित कर रहा है।

एक सर्वे में 68.4 फीसदी नमूनों में मिलावटी दूध पाया गया था। दूध की इसी मिलावट से परेशान होकर कुछ लोग ऑर्गेनिक दूध खरीदने लगे। हालांकि इसके लिए उन्हें सामान्य दूध की तुलना में करीब दोगुनी कीमत चुकानी पड़ती है। यह दूध ऑर्गेनिक खेतों में घूमते हुए चारा खाने वाली देसी गायों से निकलता है और स्वाद एवं रंगत के मामले में यह आम दूध से काफी अलग है। ये गायें रासायनिक उर्वरक और स्टेरॉयड वाले चारे से दूर रखी जाती हैं। किसी भी तरह के रसायन से मुक्त चारे की ही वजह से उन गायों का दूध ऑर्गेनिक होता है। किसान अपने खेतों में ऑर्गेनिक चारा उपजाते हैं और अपने मवेशियों को वहां चरने के लिए खुला छोड़ देते हैं। कई किसान अपने दुधारू पशुओं को ऑक्सीटोसीन या एंटीबॉयोटिक्स जैसे हॉर्मोन के इंजेक्शन भी नहीं देते हैं। इस दिशा में आज सरकारी स्तर पर व्यापक पहल की गंभीरता से जरूरत महसूस की जा रही है।

ऐसे उपभोक्ताओं का एक बड़ा वर्ग नई जानकारियों से लैस है, स्वास्थ्य को लेकर सजग है और पर्यावरण को सहेजने में मदद करने वाले उत्पादों को खरीदने में खुशी महसूस करता है लेकिन ऑर्गेनिक खरीदारों में अधिकांशत: वे लोग हैं, जो हरेक 'केमिकल' उत्पाद को बिना जांचे-परखे खारिज करने के आदती हैं। जहां दोनों तरह के लोग रसायन-मुक्त उत्पादों के नाम पर अधिक राशि खर्च करने के लिए तैयार हैं, वहीं वे उन उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर सशंकित भी रहते हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों के मूल्यों में ब्रांडों के आधार पर काफी फर्क है और असली ऑर्गेनिक उत्पादों की पहचान के लिए जारी अलग-अलग 'लोगो' असमंजस बढ़ाने का काम करते हैं। सरकार ने हाल में इस संदेह को दूर करने की कोशिश की है। खाद्य क्षेत्र के नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने प्राकृतिक एवं ऑर्गेनिक उत्पादों के लिए साझा लोगो 'जैविक भारत' जारी किया है। ऑर्गेनिक खेती के लिए दिशानिर्देश तय करने वाली नोडल एजेंसी राष्ट्रीय ऑर्गेनिक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) ने भी पिछले साल दिसंबर में एक अधिसूचना जारी की थी जिसमें सभी ऑर्गेनिक उत्पादकों और विक्रेताओं को 1 जुलाई 2018 तक ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करना अनिवार्य कर दिया गया था। हालांकि सीधे बाजार में अपने उत्पाद बेचने वाले छोटे किसानों को इस शर्त से छूट दी गई थी। किसानों और समर्थक संगठनों ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया था।

एक सच्चाई यह भी गंभीर बहसों में है कि किसानों को परंपरागत खेती से ऑर्गेनिक खेती की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए ढांचागत एवं प्रक्रियागत उपाय नहीं किए गए हैं। सरकार ने अनिवार्य प्रमाणन के लिए जारी एक अधिसूचना में कहा था कि अगर आप आज आवेदन करते हैं तो 2-3 साल बाद ही आपको एक ऑर्गेनिक उत्पादक किसान के तौर पर प्रमाणित किया जाएगा। प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए केवल छह महीने का वक्त ही देना पूरी तरह अनुचित है। वैसे जो किसान पारंपरिक खेती से ऑर्गेनिक खेती की तरफ रुख करना चाहते हैं, उनके लिए दो रास्ते हैं। एक रास्ता सहभागी गारंटी प्रणाली है, जिसमें कम-से-कम चार किसान मिलकर ऑर्गेनिक प्रमाण हासिल करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। कई इलाकों के किसानों ने समूह के तौर पर प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए आवेदन किया लेकिन कभी भी उस पर कार्रवाई नहीं हुई। दूसरा तरीका सरकारी मान्यता वाली 28 तृतीय पक्ष एजेंसियां (टीपीए) हैं जिनमें से इकोसर्ट और कंट्रोल यूनियन जैसी कई एजेंसियां प्रमाणपत्र देने के पहले वैश्विक मानकों का पालन करती हैं। ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करने में 10,000 से लेकर 70,000 रुपये के बीच खर्च पड़ता है। इसके अलावा हरेक साल उसके नवीनीकरण पर भी अलग से खर्च करना होता है।

इस सबके साथ ही, ऑर्गेनिक खेती की बुनियादी हकीकतों पर नजर डालें तो जहां रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी मिलने का सिलसिला जारी है, वहीं सरकार किसानों को ऑर्गेनिक तरीकों से खेती के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं देती है। ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया की प्रामाणिकता को लेकर संदेह का भाव होने से मामला और गड़बड़ हो जाता है। जब प्रमाणपत्र देने का काम करने वाली एजेंसियां किसी किसान के खेती संबंधी तौर-तरीकों की पड़ताल के लिए पहुंचती हैं तो वे प्राय: साफ नजर आने वाले संकेत ही देखना चाहती हैं। ऑर्गेनिक किसान के प्रमाणन के लिए पहुंचने वाली एजेंसियों के लोग अक्सर आसपास बिखरी खाद की बोरियों पर निर्भर रहते हैं। हालत यह है कि अगर दो सौ किसानों ने प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया हुआ है तो उनमें से केवल दस-बीस लोगों के खेतों की ही मिट्टी का परीक्षण किया जाता है। मृदा परीक्षण वाले खेतों का चयन भी सुविधा के आधार पर किया जाता है। प्रमाणित ऑर्गेनिक किसानों से उनकी फसल खरीदी जा सकती है लेकिन खुदरा विक्रेताओं के लिए भी टीपीए प्रमाणन लेना जरूरी रहता है। आज भी किसानों की तुलना में खुदरा विक्रेताओं के लिए ऑर्गेनिक प्रमाणन हासिल करना अधिक आसान है। भारत के किसानों का बहुत बड़ा तबका आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है और कई बार तो उनकी आय नकारात्मक ही होती है। ऐसे में सबसे अच्छा तो यही होगा कि ऑर्गेनिक किसानों के बजाय खुदरा विक्रेता ही इस प्रमाणन की लागत भरें।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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