देश के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को बनाने वाले शख्स को जानते हैं आप?

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 देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, 'व्यक्ति मर सकता है लेकिन विचार नहीं।' पिंगलि वेंकैया गुमनामी में जिंदगी जीते हुए इस दुनिया को विदा कह गए, लेकिन उनका दिया हुआ राष्ट्रीय ध्वज आज हर भारतीय की शान है।

पिंगलि का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में 2 अगस्त 1878 को हुआ था। उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था और वे भूगर्भशास्त्री भी थे। उन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा जापानी, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाएं भी आती थीं।

क्या आप जानते हैं कि हमारे देश की पहचान तिरंगा झंडा किसकी देन है? आप शायद न जानते हों कि पिंगलि वेंकैया नाम के शख्स ने भारत की आजादी के प्रतीक तिरंगे को डिजाइन किया था जो बाद में राष्ट्रीय ध्वज बना। देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था, 'व्यक्ति मर सकता है लेकिन विचार नहीं।' पिंगलि वेंकैया गुमनामी में जिंदगी जीते हुए इस दुनिया को विदा कह गए, लेकिन उनका दिया हुआ राष्ट्रीय ध्वज आज हर भारतीय की शान है।

पिंगलि का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में 2 अगस्त 1878 को हुआ था। उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था और वे भूगर्भशास्त्री भी थे। उन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा जापानी, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाएं भी आती थीं। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा एक प्राइमरी स्कूल से की थी, जिसके बाद आगे की पढ़ा के लिए वे मछिलिपत्नम गए। पढ़ाई खत्म करने के बाद वे आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। वे नेतादी सुभाषचंद्र बोस से काफी प्रभावित थे, जिसकी वजह से उन्होंने इंडियन आर्मी जॉइन की और अफ्रीका में बोर युद्ध में हिस्सा लिया।

भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट
भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

अफ्रीका में ही उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। महात्मा गांधी से उनका साथ हमेशा बना रहा। वेंकैया ने सिर्फ भारत की आजादी में ही सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि उपनिवेशी शासन के भीतर यातना झेल रहे लोगों की मदद भी की। 1906 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 22वां अधिवेशन कोलकाता में संपन्न हुआ तो वेंकैया को एग्जिक्यूटिव मेंबर बनाा गया। उस वक्त देश में ब्रिटश झंडा फहराया जाता था। इससे वेंकैया काफी विचलित हुए और उन्होंने अपने देश का ध्वज तैयार करने का फैसला कर लिया।

ध्वज बनाने की तैयारी में उन्होंने काफी शोध किया। यह शोध 5 सालों तक चलता रहा। शोध के बाद उन्होंने एक किताब भी लिखी जिसमें भारत के राष्ट्रीय ध्वज की परिकल्पना से जुड़े 30 डिजाइन थे। कांग्रेस के 22वें अधिवेशन के बाद जब भी नया अधिवेशन हुआ वेंकैया ने ध्वज की महत्ता पर प्रकाश डाला। लेकिन उनकी मांग पर 15 साल बाद ध्यान दिया गया। 1921 में गांधी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने की जिम्मेदारी दी। इस पर गांधी ने कहा था, 'हमें अपने राष्ट्रीय ध्वज के लिए अपनी जान की आहुति देने के लिए तत्पर रहना होगा। वेंकैया ने कई सारे ध्वज के प्रतिदर्श तैयार किए हैं। राष्ट्रीय ध्वज के लिए उनके संघर्ष की मैं सराहना करता हूं।'

वेंकैया ने जो ध्वज तैयार किया था उसमें केसरिया और हरा रंग ही था लेकिन बाद में गांधी ने उसमें सफेद रंग भी जुड़वाया। इसके बाद आर्य समाज के नेता लाला हंसराज में ध्वज में धम्म चक्र जोड़ने की सलाह दी। संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को इसे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता दे दी। हालांकि आजादी के बाद वेंकैया नेल्लौर में रहने लगे। उनका जीवन मुफलिसी और तंगहाली में गुजरा। देश के लिए अपनी जिंदगी संघर्ष में बिता देने वाला यह शख्स 4 जुलाई 1963 को हमें छोड़कर चला गया।

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