कभी सात हजार की नौकरी करने वाला शख्स कैसे बना लिकर किंग

जो करता था कभी विजय माल्या के यहां नौकरी, वो आज है शराब की दुनिया का बादशाह...

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आज लिकर किंग के रूप में भारत के जिस किशोर राजाराम छाबड़िया की बादशाहत है, इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए उन्हें एक जमाने में खुद के भाई मनु छाबड़िया और विजय माल्या के यहां नौकरी करनी पड़ी थी। बारी-बारी दोनो को पीछे छोड़ते हुए आज उनकी कंपनी की कंपनी की व्हिस्की 'ऑफिसर्स च्वाइस' दुनिया की नंबर वन जिनरो ब्रांड से बस एक कदम पीछे रह गई है। भारत में तो छाबड़िया की ह्विस्की की टक्कर का कोई रहा ही नहीं।

किशोर छाबड़िया
किशोर छाबड़िया
लगभग देश के एक तिहारी व्हिस्की मार्केट पर कब्जा जमा चुकी ऑफिसर्स च्वाइस की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत हो गई है। आईडब्ल्यूएसआर के हवाले से बताया गया है कि ऑफिसर्स च्वॉइस विश्व के डेढ़ सौ से अधिक देशों में बिक रही है। 

किसी जमाने में लिकर किंग ('किंग्स ऑफ गुड टाइम्स') कहे जाने वाले विजय माल्या को भगोड़े की हालत में पीछे छोड़ आज उनकी ही कंपनी के नौकर रहे किशोर राजाराम छाबड़िया भारत के नंबर वन लिकर किंग हो गए हैं। छाबड़़िया की कंपनी की ह्विस्की 'ऑफिसर्स च्वाइस' आज पहली पसंद बन चुकी है। दुनिया के टॉप 100 ब्रांड्स में व्हिस्की सबसे ज्यादा पसंद की जाती हैं, जिनमें से जो 28 ब्रांड व्हिस्की के हैं, उनमें 13 ब्रांड भारतीय हैं। इंटरनेशनल वाइन एंड स्प्रिट रिसर्च (आईडब्ल्यूएसआर) की रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त दुनिया भर में नंबर वन जिनरो ब्रांड, दूसरे पर ऑफिसर्स चॉइस, तीसरे पर रॉन्ग काओ, चौथे पर एम्पैराडोर, पांचवें पर चुम चुरूम, छठें पर मैकडॉल्स, सातवें पर स्मिरनऑफ, आठवें पर हॉन्ग टॉन्ग लिकर, नौंवे पर गुड डे और दसवें नंबर पर इंपेरियल ब्लू है।

भारत में नोटबंदी और बिहार समेत कई जगह शराब पर प्रतिबंध के बावजूद ऑफिसर्स चॉइस दुनिया में दूसरे नंबर पर बनी हुई है। रेग्युलर व्हिस्की सेगमेंट के 40 फीसदी मार्केट पर इसका कब्जा है। अगर पूरे भारत की बात करें तो एक साल में 40 करोड़ से ज्यादा शराब की बोतलें बिक जाती हैं। इस बीच फर्श से उछलकर अर्श पर पहुंच चुके किशोर राजाराम छाबड़िया के इतने बड़े व्यावसायिक उछाल की दास्तान भी बड़ी रोचक-रोमांचक है। सन् 1980-90 के दशक में वह अपने उद्योगपति भाई मनु छाबड़िया की कंपनी में साढ़े सात हजार रुपए मासिक वेतन पर नौकरी किया करते थे। भाई होने के बावजूद मनु ने उन्हें अपनी कंपनी में एक कर्मचारी से ज्यादा कभी अहमियत नहीं दी। जब भी उन्होंने इस संबंध में मनु से बातचीत छेड़ी, पहले तो वह पूरी तरह अनसुनी करते रहे।

किसी तरह लगातार मान-मनव्वल आखिर एक दिन रंग लाई, मनु खुद तो शॉ वैलेस के मालिक बने रहे, लेकिन उन्होंने सन 1990 में अपने व्यवसाय से जुड़ी मामूली सी कंपनी बीडीए की जिम्मेदारी किशोर को थमा दी। उस वक्त बीडीए की बाजार में कोई औकात नहीं थी। किसी को भनक तक नहीं थी कि बीडीए की पंचर गाड़ी पर सवार किशोर भविष्य के सबसे बड़े ह्विस्की व्यवसायी हो जाएंगे, लेकिन उन्होंने अपनी लाजवाब बिजनेस स्ट्रेटजी इस्तेमाल करते हुए रफ्ता-रफ्ता इसे बाजार की तेज दौड़ में शामिल कर दिया। इस कामयाबी से मनु छाबड़िया का कान उस समय खड़े हो गए, जब ह्लिस्की मार्केट के बड़े ताजदार किशोर की रफ्तार को गंभीरता से लेने लगे।

मनु ने सोचा कि ये तो लॉलीपॉप को रसगुल्ले की तरह पूरे मुल्क में बेचने लगा है, दोबारा उसे अपने आधिपत्य में लेने की कोशिश करने लगे। उन्होंने किशोर को प्रस्ताव दिया कि वह बीडीए छोड़ दें और उनकी एक दूसरी कंपनी वुडरुफ का काम-काज संभाल लें। किशोर को भाई की यह चालाकी आसानी से समझ में आ गई और उन्होंने उनका प्रस्तवा सिरे से ठुकराते हुए मनु के विरोधी बिजनेसमैन विजय माल्या से दोस्ती गांठ ली। वह माल्या की कंपनी हर्बर्ट संस के 26 फीसदी के पार्टनर तो हो गए लेकिन माल्या ने भी उन्हें उनकी औकात में रखने के लिए एक कर्मचारी की तरह सुलूक किया। वेतन और एक महंगी गाड़ी थमाकर वाइस चेयरमैन का तमगा भी दे दिया।

वैसे माल्या भीतर ही भीतर मनु की तरह सोचते रहे कि एक दिन वह किशोर से हाथ झाड़ लेंगे। वह चुपचाप कंपनी के शेयर खरीदने लगे। उनकी चाल किशोर भांप चुके थे। दोनो के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। इस बात को लेकर दोनों में रस्साकशी शुरू हो गई कि कंपनी का असली मालिक अब कौन? तेजी से कदम बढ़ाते हुए किशोर ने कंपनी के 51 प्रतिशत शेयर खुद हथिया लिए। माल्या नंबर दो हो गए। मामला अदालत तक पहुंच गया। वक्त का तकाजा भांपकर एक बार फिर किशोर ने यू टर्न लेते हुए अपने भाई मनु छाबड़िया का हाथ थाम लिया। इस वक्त मनु लिकर किंग बनने के सपने देख रहे थे। भाई से हाथ मिलाने से पहले किशोर को उनके सपनों की उड़ान का भी अंदेशा था।

कुछ वक्त तक माल्या को अपनी तेज चाल दिखाने के बाद किशोर ने एक बार फिर भाई को किनारे कर दिया और खुद अपने उज्ज्वल भविष्य के रास्ते पर निकल लिए। उसी दौरान मनु छाबड़िया का निधन हो गया। किशोर माल्या से कानूनी लड़ाई भी जीत गए। अब किशोर स्वयं बीडीए के मालिक हो गए। उधर, सन् 2005 में माल्या ने किशोर को 130 करोड़ रुपए देकर हर्बर्ट सन्स समेत कुल आठ कंपनियों को यूएसएल में मिला लिया। किशोर ने दो साल बाद अपनी कंपनी का नाम बीडीए बदलकर एबीडी यानी अलायड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स कर दिया।

कहा भी गया है कि हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती। तमाम उठापटक पर पार पाते हुए किशोर राजाराम छाबड़िया मनु और माल्या को पटखनी देकर सबसे आगे निकल गए। अल्कोहलिक बेवरेज मार्केट में आज 'ऑफिसर्स च्वाइस' की सबसे ज्यादा बिक्री हो रही है। कुछ साल पहले तक जहां उसकी उन्नीस प्रतिशत ग्रोथ रिकार्ड की गई थी, अब उसकी बिक्री 36 फीसदी की दर से बढ़ती जा रही है। छाबड़िया की चेयरमैनशिप में अलॉयड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स (एबीडी) आज देश की सबसे बड़ी लिकर कंपनी बन चुकी है। कंपनी की ग्रोथ में यह उछाल पिछले तीन वर्षों से लगातार अन्य उत्पादकों को पीछे छोड़ते हुए बढ़त की ओर है।

लगभग देश के एक तिहारी व्हिस्की मार्केट पर कब्जा जमा चुकी ऑफिसर्स च्वाइस की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत हो गई है। आईडब्ल्यूएसआर के हवाले से बताया गया है कि ऑफिसर्स च्वॉइस विश्व के डेढ़ सौ से अधिक देशों में बिक रही है। अब यह भारत ही नहीं दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली ह्विस्की हो चुकी है। यह साउथ कोरिया के सोजू जिनरो के बाद दुनिया की दूसरे सबसे बड़ी स्प्रिट्स ब्रांड हो गई है। पिछले साल इस कंपनी ने 3.29 करोड़ कैसज की बिक्री की थी।

इस ह्विस्की की अन्य प्रमुख ब्रांड्स हैं - ऑफिसर्स च्वाइस ब्लू, ऑफिसर्स च्वाइस ब्लैक, वोदका गोरबात्सकॉउ, जॉली रोजर रम, ऑफिसर्स च्वाइस ब्रांडी, लॉर्ड एंड मास्टर ब्रांडी आदि। इस वक्त बाजार में ह्विस्की के अनगिनत ब्रांड हैं लेकिन ऑफिसर्स च्वॉइस की बात ही कुछ और है। मनु छाबड़िया रहे नहीं, माल्या भी फर्श पर और किशोर राजाराम छाबड़िया देश के लिकर किंग के रूप में अर्श पर हैं। उनकी व्हिस्की अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ब्रांड बन चुकी है। देश में यह किशोर राजाराम छाबड़िया की कंपनी खास तौर से दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश आदि में छाई हुई है।

एक जानकारी के मुताबिक हर सेकंड इसकी तीस-बत्तीस बोतलें बिक जा रही हैं। पिछले साल अलॉयड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स की रिटेल वैल्यू 14,950 करोड़ रुपए रही है। दिनोदिन उसमें ग्रोथ शुमार हो जाती रही है। जिस तरह बाकी ब्रांड दौड़ में पीछे रह गए हैं, इस साल इसकी ग्रोथ नए गुल खिला सकती है क्योंकि अब इसकी टक्कर दुनिया की एक अदद सबसे बड़ी कंपनी से बाकी रह गई है।

हमारे देश लिकर किंग उत्तराखंड वाले पोंटी चड्ढा रहे हों या इन दिन योगी सरकार के निशाने पर आ चुके उत्तर प्रदेश के पूर्व सांसद जवाहर जायसवाल, उन सबसे छाबड़िया की कामयाबियों की दास्तान एकदम भिन्न है। पोंटी चड्ढा ने भी कभी अपनी कामयाबी का ऐसा परचम लहराया था कि पूरी दुनिया देखती रह गई थी। चड्ढा रहे नहीं। माल्या सीबीआई के झटकों से जूझ रहे हैं और जायसवाल पडरौना के जेएचवी शुगर मिल के केस में फंस चुके हैं। प्रशासन ने उनकी चल-अचल सम्पत्तियां सीज करने का नोटिस चस्पा कर दिया है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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