पीएम मोदी के भाषण से प्रभावित हो भारत लौटा ये शख़्स भारतीय उद्योगों को दे रहा ‘डिजिटल भविष्य’

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तकनीक को अगर सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो आपकी बहुत सी मुश्किलें आसान हो सकती हैं। इस बात का उपयुक्त उदाहरण है, चेन्नई आधारित स्टार्टअप ‘जपर’। यह एक एंटरप्राइज मोबिलिटी प्लेटफॉर्म है, जिसकी मदद से बिजनस इकाईयां अपने कर्मचारियों के डेटा और कॉन्टैक्ट्स को बड़ी आसानी से मैनेज कर सकती हैं। साथ ही, फील्ड रिलेटेड बिजनस में आप कर्मचारियों और उनके काम की निगरानी भी कर सकते हैं। भारत में शुरू हुआ यह स्टार्टअप जल्द ही मलेशिया, इंडोनेशिया और मध्य-पूर्व के देशों तक अपना विस्तार करने की प्लानिंग कर रहा है।

जपर के कर्ताधर्ता
जपर के कर्ताधर्ता
सितंबर, 2014 में न्यूयॉर्क में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का आनंद पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस भाषण के बाद ही आनंद को देश वापस लौटने और उसके लिए कुछ सार्थक करने की प्रेरणा मिली।

तकनीक को अगर सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो आपकी बहुत सी मुश्किलें आसान हो सकती हैं। इस बात का उपयुक्त उदाहरण है, चेन्नई आधारित स्टार्टअप ‘जपर’। यह एक एंटरप्राइज मोबिलिटी प्लेटफॉर्म है, जिसकी मदद से बिजनस इकाईयां अपने कर्मचारियों के डेटा और कॉन्टैक्ट्स को बड़ी आसानी से मैनेज कर सकती हैं। साथ ही, फील्ड रिलेटेड बिजनस में आप कर्मचारियों और उनके काम की निगरानी भी कर सकते हैं। भारत में शुरू हुआ यह स्टार्टअप जल्द ही मलेशिया, इंडोनेशिया और मध्य-पूर्व के देशों तक अपना विस्तार करने की प्लानिंग कर रहा है।

इस प्लेटफॉर्म की अवधारणा को साकार करने वाले 39 वर्षीय आनंद बालाजी के पास विदेश में काम करने का 14 साल लंबा अनुभव है। इस प्लेटफॉर्म का आइडिया उन्होंने सबसे पहले अपने रिश्तेदार कार्तिक राव (39) से साझा किया। कार्तिक आईआईएम-सी के पूर्व छात्र हैं और सेल्स ऐंड मार्केटिंक का उनके पास अच्छा अनुभव है। दोनों ने साथ मिलकर बिजनस इकाईयों को डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन की सुविधा देने का जिम्मा उठाया।

दोनों ने मदुरै से चंडीगढ़ तक की यात्रा की और छोटे स्तर से लेकर व्यापक स्तर तक बिजनस कर रहे संगठनों से बात की और अपना आइडिया साझा किया। साथ ही, दोनों ने अपने कॉन्सेप्ट की सार्थकता पर काफी रिसर्च भी की। इसके बाद दोनों ने राघव गुरुमणी और विजय नरसिम्हन नाम के इंजीनियर्स के साथ मिलकर अगस्त, 2016 में ‘जपर’ को लॉन्च किया। राघव और विजय, दोनों ही सिर्फ 24 साल के हैं।

ऐसे मिली प्रेरणा

सितंबर, 2014 में न्यूयॉर्क में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का आनंद पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस भाषण के बाद ही आनंद को देश वापस लौटने और उसके लिए कुछ सार्थक करने की प्रेरणा मिली। इसके अलावा दिसंबर, 2015 में जब तमिलनाडु में भीषण बाढ़ आई, तब आनंद देश में ही थे। आपदा के बाद आनंद ने सर्विस सेक्टर में बिजनस करने वालों को अपने पूर्व ग्राहकों के कॉन्टैक्ट आदि जुटाने के लिए जद्दोजहद करते हुए देखा और यहीं से उनके जहन में ‘जपर’ की अवधारणा ने जन्म लिया।

जरूरतों को समझा

आनंद ने इस बात पर गौर किया कि भारत में बिजनस इकाईयों के पास अपने कर्मचारियों को ट्रैक करने और उनके काम की निगरानी करने के लिए कोई भी प्रभावी सिस्टम नहीं है। इस वजह से सर्विस इंडस्ट्री में काम करने वालों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उनके यूजर बेस पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। फील्ड रिलेटेड बिजनस में कर्मचारियों और काम की निगरानी के लिए नियमित दौरों की जरूरत पड़ती है।

बिजनेस मॉडल बनाने में आई दिक्कत

जपर, एक मोबाइल आधारित बी-टू-बी सॉफ्टवेयर सर्विस है। छोटा बिजनस हो या बड़ा, यह सर्विस सभी के लिए है। अपनी सर्विस के लिए कितना पैसा चार्ज किया जाए, इसके लिए कंपनी को काफी प्रयोग करने पड़े। हर बिजनस की अपनी जरूरतें होती हैं और ऐसे में जपर की हर सर्विस हर किसी के काम की नहीं थी। इसका उपाय निकाला गया और फिलहाल जपर, मंथली सब्सक्रिप्शन देता है। इसके अलावा, कस्टमाइजेशन और इन्टीग्रेशन के लिए एक तय फीस चार्ज करता है।

यह सुविधा देने वाला एशिया का पहला प्लेटफॉर्म

आनंद का दावा है कि जपर, एशिया का पहला प्लेटफॉर्म है, जो कर्मचारियों के रियल-टाइम आईडेन्टिटी वेरिफिकेशन की सुविधा देता है। इसकी मदद से कंपनी अपने कर्मचारी और उसकी लोकेशन वेरिफाई कर सकती है। जपर, कई जरूरी सुविधाएं ऑफलाइन भी मुहैया कराता है, जिससे खराब नेटवर्क की चुनौती से निपटने में मदद मिलती है। यूजर्स ज्यादातर सुविधाओं का इस्तेमाल ऑफलाइन भी कर सकते हैं। फिलहाल, भारत और सिंगापुर के 10 शहरों को मिलाकर 40 कंपनियां जपर की सुविधाओं का इस्तेमाल कर रही हैं। 500 से ज्यादा कस्टमर साइट्स को मिलाकर जपर के पास 6 हजार से ज्यादा एन्ड यूजर्स हैं। आनंद ने जानकारी दी कि उनकी कंपनी, गार्टनर, फोर्ब्स, सीएसजी इंटरनैशनल और स्ट्रैटजी ऐनालिटिक्स से मार्केट डेटा लेती है।

चुनौतियां

आनंद कहते हैं कि भारत में अभी भी लोगों को फ्री सॉफ्टवेयर्स (फेसबुक और वॉट्सऐप आदि) की आदत है। सॉफ्टवेयर सर्विस के लिए नियमित तौर पर पैसे देने को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यह कहानी है, छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों की। वहीं दूसरी तरफ, बड़े कॉर्पोरेट क्लाइंट्स में कर्मचारियों की संख्या बहुत अधिक होती है, जिसे मैनेज करना मुश्किल होता है। साथ ही, उनकी सेल्स साइकल भी 3-4 महीने लंबी होती है।

देना चाहते हैं ‘जपर सर्विस’

आनंद कहते हैं कि जपर का मतलब होता है, ‘एक्सट्रीमली सुपर’ और वह अपने क्लाइंट्स को ऐसा ही अनुभव देना चाहते हैं। आनंद ने बताया कि जपर की सर्विस का इस्तेमाल करके उनके क्लाइंट्स ने वर्कफोर्स यूटिलाइजेशन को 50% तक बढ़ाया है और बेहतर सुविधाओं के दम पर उनका कस्टमर बेस भी बढ़ा है। 2017-18 में कंपनी का रेवेन्यू रन रेट 1 करोड़ रुपए तक था। जपर की 15 लोगों की मुख्य टीम का उद्देश्य है कि आगामी 24 महीनों में यह आंकड़ा 10 करोड़ रुपए तक पहुंचाया जाए।

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