एसिड अटैक सर्वाइवर सोनम

थर्रा रहीं एसिड अटैक की वारदातें, पुस्तक मेले में रो पड़ी पीड़ित सोनम

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चंचल एकतरफा प्यार की शिकार हुई थी। एक मजदूर परिवार में जन्मी चंचल गरीबी के बीच भी अपने जीवन के हर रंग को खुल कर जी रही थी। वो पढ़ लिख कर एक अच्छी नौकरी करना चाहती थी। इन्हीं सपनों के साथ वो 10वीं की परीक्षा के बाद 11वीं में नामांकन की तैयारी में थी। मगर तभी उसके जीवन में एक दरिंदे ने दस्तक दी।

चंचल की पहले की तस्वीर और हमले के बाद
चंचल की पहले की तस्वीर और हमले के बाद
वह कहती है कि हम दोनों बहनों के साथ आरोपियों ने जो किया है, उसे भगवान भी माफ नहीं करेंगे। दीदी तो मुझे अकेली छोड़ कर चली गयी, लेकिन दीदी और अपना बदला कोर्ट के माध्यम से लूंगी। हार नहीं मानूंगी, इंसाफ की लड़ाई लड़ती रहूंगी।

कुछ समय पहले तक कोई नियम कानून नहीं था, अभी 2013 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एसिड की बिक्री पर रोक लगाने और सख्त नियम बनाने के लिए आदेश दिए थे और अधिकतम तीन महीने का समय दिया था।

स्त्री के जीवन में कदम-कदम पर कितने तरह के दोराहे, चौराहे होते हैं, यह तो वही जानती है, जिसका चेहरा समय की तेजाबी बारिश में पिघल गया हो। कविताओं की भाषा में बात करते समय स्त्री-जीवन की जटिलताएं शब्दों में कितनी आत्मसात हो पाती हैं, हो भी पाती हैं या नहीं, यह तो स्री-विमर्श की बात हो गई, एसिड अटैक की बढ़ती घटनाएं जिस तरह पूरे स्त्री-समुदाय को डरा रही हैं, उस पर पिछले दिनो पटना के पुस्तक मेले में कस्तूरबा मंच से आपबीती सुनातीं दो ऐसी बेटियों की पीड़ा से नम हो उठीं दर्शक दीर्घा की आंखें हजार तरह के नुकीले सवालों से रू-ब-रू हो गईं। बेटी के लिए जब पद्मा सचदेव ऐसी पंक्तियां लिखती हैं, तब भी ये सवाल बासी नहीं पड़ते, बल्कि तब और ज्यादा ताजा, और अधिक भयानक होकर दिल-दिमाह पर तैर जाते हैं, जब किसी बेटी का चेहरा तेजाब से नहला दिया जाता है-

सो जा बिटिया, सो जा रानी, निंदिया तेरे द्वार खड़ी।

निंदिया का गोरा है मुखड़ा चांद से टूटा है इक टुकड़ा,

नींद की बांहों में झूलोगी गोद में हो जाओगी बड़ी।

पटना के पुस्तक मेले में इन दिनो किताबों की बातें हो रही हैं, उसी में टहलती हुई एक कविता जब इस तरह का सवाल करने लगे कि, देह नहीं होती है एक दिन स्त्री, और उलट-पुलट जाती है सारी दुनिया अचानक!' तो ऐसे ढलानों से फिसलतीं चंचल पासवान और सोनम जैसी लड़कियों की जिंदगी इस पूरे कथित सभ्य समाज का सिर शर्म से झुका देती है। उनके खुरदरे चेहरों पर लिख दी गई हैवानियत की इबारत पढ़ते-पढ़ते दिल दहल जाता है। चंचल और सोनम पर गुजरे दहशत के दिनों से वाकिफ होने से पहले आइए, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर एक नजर डाल लेते हैं।

ब्यूरो के अनुसार तेजाब फेंकने की सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हो रही हैं। देश में एसिड अटैक के मामले 9.4 फीसदी बढ़ गए हैं। वर्ष 2015 में 222 घटनाएं दर्ज की गईं जबकि 2014 में 203 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2015 में यूपी में 55, पश्‍चिम बंगाल में 39, दिल्‍ली में 21, बिहार में 15 और मध्‍य प्रदेश में 14 मामले दर्ज किए गए। हरियाणा जैसे छोटे राज्‍य में भी दस मामले सामने आए। आंध्र प्रदेश में 14 केस हुए। इस तरह की घटनाएं जाने कितनी बेटियों की जिंदगी तबाह कर रही हैं। बिहार के छितनावां गांव में एसिड अटैक की शिकार चंचल की तो इसी साल जून में अकाल मौत हो चुकी है लेकिन तेजाब पीड़ित उसकी छोटी बहन ने हिम्मत नहीं हारी है।

वह कहती है कि हम दोनों बहनों के साथ आरोपियों ने जो किया है, उसे भगवान भी माफ नहीं करेंगे। दीदी तो मुझे अकेली छोड़ कर चली गयी, लेकिन दीदी और अपना बदला कोर्ट के माध्यम से लूंगी। हार नहीं मानूंगी, इंसाफ की लड़ाई लड़ती रहूंगी। अदालत से सभी आरोपियों को सजा दिलाऊंगी। इतना कह कर वह फूट-फूटकर रोने लगी। उसने बताया कि हमलावरों घर वालों ने आरोपियों के जेल से छूटने से कुछ दिन पहले उसके घर आकर गाली-गलौज किया, केस उठाने की धमकी दी, घर पर पत्थर फेंके। मामला दानापुर सिविल कोर्ट में चलने के बाद पटना सिविल कोर्ट में है। दो साल से डॉक्टर गवाही टाल रहा है।

गौरतलब है कि अक्तूबर 2012 की एक रात जब चंचल अपनी छोटी बहन सोनम के साथ छत पर सो रही थी, उसके गांव के ही बादल, राज कुमार, घनश्याम और अनिल ने तेजाब से नहला दिया था। सोनम बताती है कि ये चारो कोचिंग जाने के दौरान हमेशा रास्ता रोक कर छेड़खानी, अश्लील हरकतें करते थे। चंचल ने इसका विरोध किया तो शोहदों ने गंभीर अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। हमले में चंचल 28 फीसदी जल गयी थी। गिरफ्तारी के बाद चारों आरोपी जमानत पर छूट गए।

पुस्तक मेले के मंच से सोनम ने बताया कि मुख्यमंत्री के आश्वासन के बावजूद आज तक उन चारो अपराधियों को सजा नहीं हो पाई है। वे आज भी मोटरसाइकिल से उसके सामने से आए दिन जब गुजरते हैं, हम लोग सिहर उठते हैं। अब तो यही जी करता है कि मैं अपने माता-पिता के साथ जहर खाकर मर जाऊं, लेकिन नहीं, चंचल की कसम, मैं हार नहीं मानूंगी। उन्हें सजा दिलवाकर ही रहूंगी, देखती हूं, डॉक्टर आखिर कब तक गवाही से बचता है।

सोनम की ही तरह 'स्टॉप एसिड अटैक' अभियान की प्रचारक लक्ष्‍मी कहती हैं कि जिंदगी ने जो दिया, उसके आगे उन्होंने घुटने नहीं टेके। अपने अंदर जीने का जज्बा पैदा किया। चेहरे की सुंदरता दिखावटी है, इंसान दिल से सुंदर होना चाहिए। उन्‍होंने आगरा में ताजमहल से थोड़ी ही दूरी पर 'शीरोज हैंगआउट कैफे' शुरू किया है। इसे 10 दिसंबर, 2014 से एसिड अटैक पीड़ित महिलाएं और लड़कियां ही चलाती हैं। जेंडर के सवाल पर देशव्यापी अभियान पर निकले राकेश सिंह कहते हैं- 'इन घटनाओं के सामान्य कारण देखो तो घोर आश्चर्य होता है कि एक दिन पहले तक प्रेमिका के कदमों में चांद-तारे तोड़ कर डाल देने की बात करने वाला युवक, अगले दिन उसी के चेहरे को तेजाब से नहला देता है। कैसे वह इतना क्रूर हो जाता है? आखिर उसके भीतर क्या धंसा होता है जो कि वह इतना अमानवीय, असंवेदनात्मक काम को कर सकता है?'

लगभग अभी तक ग्यारह राज्यों (तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पांडिचेरी और अभी वे महाराष्ट्र यात्रा पर हैं) की साइकिल यात्रा कर, देश को अलग-अलग कोणों से देख-पहचान कर, वे इनसे पीछे छिपे कारण की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि- ‘पितृसत्ता जिस तरह बेटा-बेटी की अलग-अलग तरह से परवरिश करती है, उनका बुनियादी विरोध उससे है।'

साहित्यिक पत्रिका 'समय के साखी' की संपादक डॉ. आरती लिखती हैं- 'समाज में गहरे धंसी वर्जीनिटी (शुचिता) एक ऐसी अवधारणा है, जिसके मानसिक प्रभाव से प्रताड़िता तेजाब हमले में बच भी जाती है तो जिंदगी भर न जाने वाले दाग और हर सुबह आईना देखते ही 'डरावने' शब्द से सामना करती है। अंतहीन दर्द, बार-बार होने वाली सर्जरी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। सबसे अहम तो, आत्मविश्वास ही डगमगा जाता है। हर सुबह वह घटना दोहराई जाती है, खुद की परछाई से ही डर! उत्तर आधुनिकता के दौर में जब पूरी दुनिया 'एक गांव-मुहल्ले' में तब्दील हो गई है, संचार क्रांति ने दूरियों के पैमानों को समाप्त कर दिया, तब भी स्त्री और पुरुष जेंडर के बीच वही दूरी कायम है, वे अभी भी अलग-अलग प्रांत हैं।

दिन-रात साथ रहते काम करते हुए भी मकान के दो तल्ले हैं। पुरुष शासक और स्त्री मजदूर। इस उत्तर को पाने के कारणों की तह में जाकर उन्हें पाटना होगा, तभी तेजाब हिंसा जैसे क्रूरतम अपराधों पर अंकुश लगाना संभव हो सकेगा। तेजाब हथियार की मानिंद प्रयोग किया जा रहा है। अन्य हथियारों को रखने के लिए लाइसेंस की जरूरत होती है, लेकिन तेजाब बेचने वालों के लिए या खदीदने पर कोई नियम आड़े नहीं आता। कुछ समय पहले तक कोई नियम कानून नहीं था, अभी 2013 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एसिड की बिक्री पर रोक लगाने और सख्त नियम बनाने के लिए आदेश दिए थे और अधिकतम तीन महीने का समय दिया था। उसके बावजूद हो रही घटनाएं साफ इशारा करती हैं कि तेजाब की बिक्री खुलेआम चल रही है।'

भारतीय कानून ने तेजाब हमले को विशिष्ट दण्डनीय अपराध की कोटि में रेखांकित करते हुए अपराधी के लिए दस साल की सजा मुकर्रर की है लेकिन कोर्ट में लटके हुए सैकड़ों से अधिक मामले कोई दूसरी ही कहानी बयां करते हैं। नियमानुसार तेजाब पीड़िता को इलाज के लिए पांच लाख रुपए की सहायता दी जानी चाहिए किंतु ऐसा न होने से एक तेजाब पीड़िता के परिजनों ने तो कलेक्टर ऑफिस के सामने सामूहिक आत्मदाह का प्रयास किया। 9 सितंबर 2016 को तेजाब हिंसा से ही संबंधित एक केस को अदालत ने जघन्य अपराध मानते हुए अभियुक्त को मृत्युदण्ड की सजा सुनाई थी। देश में इस वक्त स्टॉप एसिड अटैक, एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन आदि कई संगठन इस हालात से निपटने की कोशिश में जुटे हैं।

इति शरण बताती हैं कि चंचल एकतरफा प्यार की शिकार हुई थी। एक मजदूर परिवार में जन्मी चंचल गरीबी के बीच भी अपने जीवन के हर रंग को खुल कर जी रही थी। वो पढ़ लिख कर एक अच्छी नौकरी करना चाहती थी। इन्हीं सपनों के साथ वो 10वीं की परीक्षा के बाद 11वीं में नामांकन की तैयारी में थी। मगर तभी उसके जीवन में एक दरिंदे ने दस्तक दी। चंचल ने हमले के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी, हालांकि हमले के बाद उसकी सभी सहेलियों ने उससे नाता तोड़ लिया लेकिन, चंचल और सोनम को परिवार से पूरा प्यार और सहयोग मिलता रहा। घटना के दिन दोनों बहनों को रात के करीब एक बजे भर्ती कराया गया था, मगर जिस डॉक्टर को उनका इलाज करना था वह सुबह साढ़े दस बजे के करीब पहुंचा था।

उतनी देर तक दोनों को ठीक से प्राथमिक उपचार भी नहीं मिला था। बिहार में आए दिन एसिड अटैक की घटनाएं सामने आती हैं। अकसर मामलों में पीड़िता को सही इलाज उपलब्ध नहीं हो पाता है। कई पीड़िताओं की आत्महत्या की घटनाएं भी सामने आ रही हैं। वैशाली के एक गांव में भी एक तेजाब पीड़िता ने बिजली का तार पकड़ कर जान दे दी थी। यह सब तब हो रहा जब नीतिश कुमार ने खुद यह वादा किया था कि एसिड अटैक विक्टिम्स को इलाज की पूरी सुविधाएं मिलेंगी।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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