बड़े-बड़ों को आईना दिखा रही है एक किताब

साहित्यिक हल्कों में खलबली पैदा कर रही है देश के वरिष्ठ गीतकार एवं आलोचक नचिकेता की नई किताब...

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देश के वरिष्ठ गीतकार एवं आलोचक नचिकेता की एक नई किताब ने साहित्यिक हल्कों में खलबली पैदा कर दी है। अपनी 704 पृष्ठीय 'समकालीन गीतकोश' के इकतालीस पन्नों पर दर्ज नचिकेता अपने संपादकीय में साफ शब्दों में चेतावनी दे रहे हैं कि तुम कवि हो या आलोचक, गीत-नवगीत-जनगीत को लेकर हिंदी साहित्य के इतिहास के साथ कत्तई किसी किसम की ठकुरसुहाती मत करो, न आपसी भाईबंदी, निजी नफा-नुकसान अथवा सहलाऊ दोस्ताने में उसके सच से आंखें चुराओ!

नचिकेता (फाइल फोटो)
नचिकेता (फाइल फोटो)
प्रयोगधर्मी गीतों के सिलसिले में शंभुनाथ सिंह के इस मनोगतवादी अभिकथन को कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता कि उन्होंने वाराणसी की गंगा में बजरे पर हुई कवि-गोष्ठी में अपने गीत-पाठ के क्रम में ‘नवगीत’ शब्द का प्रयोग पहली बार किया था। 

देश के प्रतिष्ठित कवि नचिकेता लिखते हैं कि मंचों, अकादमियों, गिरोहों की मिठाई खाकर तालियां बजाने अथवा 'अपनों' के लिए कुछ भी लिख मारने से जन-विश्वास की खूंटी पर टिका इतिहास का आईना अंधा नहीं हो जाता है। किंचित भिन्न शब्दावलियों में नचिकेता की चेतावनी 'साहित्यिक तानाशाह' अज्ञेय ही नहीं, आज के शीर्षतम आलोचक नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय सहित ठाकुर प्रसाद सिंह, 'नवगीत का प्रथम पुरस्कर्त्ता होने का दावा करने वाले' शंभुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, 'दिग्भ्रमित' कमला प्रसाद, 'वैचारिक मोतियाबिंद से ग्रस्त, आत्म-विमुग्ध' कवि-संपादक ओम प्रकाश सिंह, राजेंद्र प्रसाद सिंह, राधेश्याम ‘बंधु’, 'इष्ट-मित्रों, चेले-चपाटियों को प्रसाद बाँटते' देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ और उनके कथित 'एकलव्यों', 'जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि के गद्य-कवि' राजेश जोशी, विश्वनाथ त्रिपाठी, रमेश रंजक, अरुण कमल, शिवशंकर मिश्र आदि के लिए भी है।

प्रतिष्ठित कवि-लेखक-कथाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय पर बरसते हुए नचिकेता लिखते हैं- ‘कविता-64’ की अपनी पत्रात्मक प्रतिक्रिया में 'नई कविता और नवगीत, इस प्रकार के नामों से तो एक कृत्रिम विभाजन ही आगे बढ़ेगा और नई कविता की विभिन्न प्रवृत्तियों को समझने में बाधा ही अधिक होगी', जैसा सकारात्मक सोच रखनेवाले अज्ञेय ने ही घोषित कर दिया कि 'यों तो हिंदी में गीत अब भी लिखे जाते हैं और नई कविता के साथ नवगीत की भी एक धारा चलाई जा रही है- लेकिन गीत की धारा कभी हिंदी काव्य की मुख्य धारा नहीं हो सकती और न कभी हुई है, उस युग में भी नहीं, जब काव्य को गाकर प्रस्तुत करने का चलन था।'

कविता के विस्तृत फलक से गीत/ नवगीत को जबरन धकियाकर काव्य-विमर्श के क्षेत्र से देशनिकाल दे देने का ही परिणाम है नवगीत का कविता से अलग स्वतंत्र अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा का संघर्ष। यहीं पर ध्यान देनेवाली बात यह है कि अज्ञेय जिस चिंता से दुबले हो रहे थे, वैसी आकांक्षा नवगीकारों की कभी नहीं रही है। व्यापक जन-जीवन में गीत की गहरी पैठ और उसकी समयसापेक्ष, समाजसापेक्ष और युगसापेक्ष विकासशीलता से भयभीत अज्ञेय ने हड़बड़ी में यह फासीवादी फरमान जारी कर दिया कि 'गीतकारों के गीतों को कविता की धारा में रखने के लिए मुझे इसलिए कठिनाई होती है।

यों तो कोई कवि गीत लिख सकता है- लेकिन काव्य में गीत का स्थान गौण ही है। यह भी हो सकता है कि कोई गीत-ही-गीत लिखे पर उस दशा में मैं उसे कवियों की पंक्ति में न रखकर संगीतकारों के वर्ग या अधिक-से-अधिक संधि-रेखा पर रखूंगा।' गोयाकि साहित्यिक तानाशाह अज्ञेय की इच्छा पर ही साहित्य का भाग्य निर्धारण होना है, अज्ञेय गीत को काव्य न मानेंगे तो वह काव्य नहीं रहेगा। अपने तानाशाह रवैये के जोश में वे यह भी भूल गए कि साहित्य का भाग्य नियंता कोई व्यक्ति नहीं हो सकता, उसका भाग्यनियंता व्यापक जनता और इतिहास होता है।

अज्ञेय का यह व्यक्तिवादी प्रलाप सुनकर ही मुक्तिबोध को कहना पड़ा कि 'मनुष्य-जीवन का कोई अंग ऐसा नहीं, जो साहित्याभिव्यक्ति के लिए अनुपयुक्त हो। जड़ीभूत सौंदर्यानुभूति एक शैली को दूसरी विशेष शैली के विरुद्ध स्थापित करती है। गीत का नई कविता से विरोध नहीं है और न नई कविता को उसके विरुद्ध अपने को स्थापित करना चाहिए।' मुक्तिबोध की इस सकारात्मक चेतावनी से कोई सबक नहीं लेने की वजह से जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि की गिरफ्त में आकर आज भी गाहे-बेगाहे समकालीन कवि गीत की अस्मिता पर प्रश्नचिह्न लगाने का नामाकूल प्रयत्न करते रहते हैं। अज्ञेय का प्रेत जब-जब इन कवियों को अपने आगोश में ले लेता है, तब-तब वे कुछ नया शगूफा छोड़ देते हैं।

जाने-माने नवगीतकार शंभुनाथ सिंह के बारे में नचिकेता का कहना है कि उनके मन में आसन जमाकर बैठा चोर उनके कृतित्व को काफी कुरेदने के बाद सामने आता है। प्रयोगधर्मी गीतों के सिलसिले में शंभुनाथ सिंह के इस मनोगतवादी अभिकथन को कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता कि उन्होंने वाराणसी की गंगा में बजरे पर हुई कवि-गोष्ठी में अपने गीत-पाठ के क्रम में ‘नवगीत’ शब्द का प्रयोग पहली बार किया था। इसका उनके अभिकथन के अलावा कोई दूसरा साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। किसी साहित्यिक विधा का उदय किसी व्यक्ति-विशेष के, वह व्यक्ति चाहे कितना ही प्रतिभासंपन्न और परिश्रमी क्यों न हो, एकल प्रयास का प्रतिफल नहीं होता, अपितु एक निश्चत काल-खंड में सामाजिक और ऐतिहासिक आवश्यकता का अनिवार्य परिणाम होता है।

मतलब साफ है कि गीत-रचना के क्षेत्र में आ रहे गुणात्मक बदलाव को राजेंद्र प्रसाद सिंह या शंभुनाथ सिंह ‘नवगीत’ नाम से नहीं पहचानते तो दूसरा पहचानता क्योंकि गीत के रचना-परिदृश्य पर एक नई गीत-दृष्टि, रचना-दृष्टि और कला-दृष्टि के अवतरण के स्पष्ट प्रमाण मिलने लगे थे और इससे आँखें चुराई नहीं जा सकती थीं। नवगीत का प्रथम पुरस्कर्त्ता होने का दावा करने वाले शंभुनाथ सिंह का ‘नवगीत-दशक-एक’ की भूमिका में मानना है कि नवगीत 'प्रयोगवाद, प्रगतिवाद और नई कविता जैसा काव्य-आंदोलन न तो कभी था और न आज है। यह अवश्य है कि वह नई कविता के आंदोलन में भ्रमवश सम्मिलित था।

किंतु यह भ्रम छठे दशक के अंत तक हट गया क्योंकि नई कविता का नेतृत्व करनेवाले कवि-आलोचक गीत-विधा को आधुनिकता की अभिव्यक्ति के लिए असमर्थ मानने लगे। नवगीत की रचना करने वाले कवि नई कविता के विरोधी नहीं थे और उनमें से तो कई नई कविता के भी सफल कवि थे- किंतु नई कविता के कवियों ने, जो स्वयं सफल गीतकार रह चुके थे, गीत-रचना को पिछड़ेपन की निशानी मानकर उससे अपने को पूर्णतः विच्छिन्न कर लिया। इस तरह नई कविता का आंदोलनात्मक रूप जितना उग्र होता गया, नवगीतकारों को साहित्य के क्षेत्र से उतना ही उपेक्षित किया जाने लगा।' यहाँ शंभुनाथ सिंह के मन में आसन जमाकर बैठा हुआ चोर उन्हें सच बोलने से रोक रहा है।

वे यह मानने से साफ कतरा गए कि जो सफल गीतकार नई कविता के भी सफल कवि थे, उनमें शंभुनाथ सिंह का नाम भी शुमार किया जाता था और जब उन्हें नई कविता के सफल कवि-आलोचकों ने नई कविता का भी सफल कवि मानने से लगभग इंकार कर दिया, तब जाकर उनका मोहभंग हुआ और उन्होंने वर्ष 1980 के बाद नवगीत का प्रवक्ता गीतकार बनने की सोची तथा नवगीत दशकों के प्रकाशन की योजना बना ली। इसके पहले ‘प्रयोगवाद और नई कविता’ नामक अपनी आलोचना-पुस्तक में उन्होंने नवगीत के बारे में जो महान विचार प्रस्तुत किए हैं, उन पर जरा यहाँ गौर कर लिया जाए।

उनके अनुसार ‘नवगीत’ एक सापेक्षिक शब्द है। नवगीत की नवीनता युग-सापेक्ष होती है। किसी भी युग में नवगीत की रचना हो सकती है। गीत रचना की परंपरागत पद्धति और विचारों के नवीन आयामों तथा नवीन भावसरिणियों की अभिव्यक्ति करनेवाले गीत जब भी और जिस युग में लिखे जाएंगे, नवगीत कहलाएंगे।' शंभुनाथ सिंह और उनके हिमायती नवगीत के केंद्र में अवस्थित आधुनिकतावाद पर लाख पर्दा डालने अथवा उसके भारतीय होने का दावा करें, मगर यह पाश्चात्य आधुनिकता का ही भारतीय संस्करण होगा। जिस समय गीत के केंद्र में शंभुनाथ सिंह आधुनिकतावाद को नवगीत का प्रमुख प्रतिमान घोषित कर रहे थे, उसके दशकों पहले आधुनिकतावाद के प्रबल समर्थक स्टीफन स्पेंडर की दृष्टि में आधुनिकतावाद मर चुका होता है।

इसी तरह हाल ही में दुनिया से विदा हुए वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के बारे में वह लिखते हैं कि हिंदी में गीत के लि, मोटे तौर पर गीत, गीति और प्रगीत जैसे तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है तथा तीनों को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है- लेकिन ऐसा है नहीं। गीत की संरचना, अनुभूति, सामाजिक सरोकार और लोकप्रियता का परिसर गीति से अधिक चौड़ा और व्यापक होता है। दर्जन भर गीत लिखकर आधुनिक हिंदी गीत के श्रेष्ठ गीतकार मान लिए जाने वाले केदारनाथ सिंह की नजर में 'रचना-प्रक्रिया की दृष्टि से विचार किया जाय तो गीत के तंत्र में ‘टेक’ की स्थिति बहुत कुछ एक अधिनायक (तानाशाह) की-सी होती है और कविता के शुरू में अनायास आ जाने वाली वह पहली पंक्ति एक प्रकार से संपूर्ण रचना की नियति बन जाती है।

होता यह है कि फिर सारी कवि-कल्पना उस एक पंक्ति के चारों ओर चक्कर काटने लग जाती है और कविता लाचार होकर उसका अनुधावन करने लगती है।' हालाँकि टेक के सांगीतिक महत्त्व के वे भी कायल हैं। आधुनिक गीत-रचना के सर्वमान्य तंत्र में सायास गीत लिखनेवाले कवियों की सारी कवि-कल्पना टेक के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटने लग जाती है, भीतरी अर्ज के तहत और स्वतःस्फूर्त गीत रचने वाले कवियों के नहीं। गीत के गायन में हर बंद के बाद टेक की आवृत्ति अनिवार्य होती है, रचना में नहीं- लेकिन आधुनिक गीतकार अपनी अनुभूति या भाव की अभिव्यक्ति की एक ईकाई की पूर्णता को संकेतित करने के लिए टेक की आवृत्ति करते हैं।

केदार जी तो यह भी मानते हैं कि टेक के अनुधावन या उसकी अनावश्यक आवृत्ति से गीत का सामूहिक प्रभाव कम हो जाता है। सचाई इसके विपरीत है। टेक की उपस्थिति से गीत का संगीतात्मक प्रभाव कम होने के बजाय बढ़ जाता है और अर्थ-निष्पत्ति में भी कोई बाधा नहीं पहुँचती। कुछ लोगों के द्वारा कविता की लय, छंद और तुकविहीन गद्यात्मक संरचना की तरह गीत-रचना में भी लय, छंद और तुक एवं गेयता के निषेध की वकालत की जा रही है। ऐसे लोग यह मोटी बात भी भूल जाते हैं कि गीत को हर हाल में गेय और संगीतात्मक होना है। इनके बिना गीत निरस्तित्व हो जाएगा। लय, छंद, तुक और संगीतात्मकता के निषेध से गीत अनुशासनविहीन और गद्यात्मक हो जाएगा तथा अनुशासनविहीन स्वतंत्रता अराजक और विघातक होती है।

जीवन-परिस्थितियों और वस्तुगत स्थितियों के प्रत्यक्ष प्रस्तुतीकरण और भावों के विस्तारपूर्ण विश्लेषण के अभाव के कारण कभी-कभी लोग मानने की भूल कर बैठते हैं कि गीत सामाजिक जीवन की सभी जटिल अनुभूतियों को समग्रता में व्यक्त करने में नाकामयाब होता है, जो वस्तुपरक वास्तविकता नहीं है। गीत ही नहीं, साहित्य की किसी एक विधा या कला-रूप में यह क्षमता नहीं है कि वह समस्त मानव-जीवन की संपूर्ण जटिलता को संपूर्णता में अभिव्यक्ति दे सके। नवगीत में प्रयोगधर्मी नव्यता लाने के लिए कवियों ने (खासकर नवगीतकारों ने) गीत की लय और छंदों में विकृति की हद तक तोड़-फोड़ कर दी है, जिससे गीत का पूरा चेहरा ही क्षत-विक्षत और लहूलुहान दृष्टिगोचल होने लगा है। गीत का रचना-कर्म बेहद मुश्किल और पेंचीदा कला-कर्म है और जोखिमभरा भी। इन चुनौतियों की जटिलता को महसूस करके ही आज के अधिकांश गद्य-कवि गीत-रचना की ओर मुखातिब होने से परहेज करते हैं।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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