'गेंद की तरह गिरो खेलते बच्चों के बीच'

हिंदी के जाने-माने कवि नरेश सक्सेना...

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हिंदी के जाने-माने कवि हैं नरेश सक्सेना। उनकी कविताओं में बोध और संरचना के स्तरों पर अलग ताजगी मिलती है। बोध के स्तर पर वे समाज के अंतिम आदमी की संवेदना से जुड़ते हैं, प्रकृति से जुड़ते हैं और समय की चेतना से जुड़ते हैं तो संरचना के स्तर पर अपनी कविताएं छंद और लय के मेल से बुनते हैं। 

वह कहते हैं कि कविता की हालत इस वक्त ये है, जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ रही है, हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री घट रही है। जैसे-जैसे क्रय-शक्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे साहित्य की पुस्तकों की बिक्री घट रही है। उसके मूल में ये बात है कि देश के अधिकतर गरीब और ग्रामीण बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं। 

देश के सारे विश्वविद्यालयों में हर विषय की उच्च शिक्षा इंग्लिश में दी जाती है। तो, हिंदी अब न ज्ञान की भाषा रही, न कविता जुबान की। जो भाषा ज्ञान की भाषा नहीं है, तो क्या उसे अज्ञान की भाषा कहा जाए? इसके दुष्परिणाम ये हुए कि चार-पांच साल के हमारे छोटे-छोटे बच्चे अब अंग्रेजी रटते हैं, पढ़ते नहीं हैं। 

हिंदी के जाने-माने कवि हैं नरेश सक्सेना। उनकी कविताओं में बोध और संरचना के स्तरों पर अलग ताजगी मिलती है। बोध के स्तर पर वे समाज के अंतिम आदमी की संवेदना से जुड़ते हैं, प्रकृति से जुड़ते हैं और समय की चेतना से जुड़ते हैं तो संरचना के स्तर पर अपनी कविताएं छंद और लय के मेल से बुनते हैं। इस समय लखनऊ में रह रहे देश के शीर्ष कवि नरेश सक्सेना बताते हैं कि मेरे साथ बचपन में एक विचित्र परिस्थिति थी। उस वक्त चंबल की सहायक नदी आसन की तटवर्ती पहाड़ी पर सिंचाई विभाग में कार्यरत मेरे पिता का आवास था। आसपास और कोई बसावट नहीं। चारो ओर दूर-दूर तक कोई घर-गांव नहीं। प्राणी के नाम पर, जंगली जीव-जंतु। कई किलो मीटर तक सन्नाटा, सिवाय दो चौकीदारों के और कोई नहीं होता था, जो दिखे। घर पर साथ में सिर्फ मां होती थीं। ऐसे हालात में पांच वर्षों तक तो मैं स्कूल का मुंह नहीं देख सका। सन् 1946 से 48 के बीच, जब दस साल का हो गया था, मुरैना के एक हाई स्कूल में पांचवे दर्जे में दाखिला मिला। तो बचपन बिना स्कूल के बीता। थोड़ा-सा गणित पिता पढ़ा देते थे। हिंदी घर पर ही बिना स्कूल गए सीख लिया था। कहीं फटे-पुराने कागज हों, पुरानी किताबें, पढ़ने लायक जो कुछ भी मिल जाता, उन्हें गट्ठर बनाकर घर उठा ले आता। मेरी बहन कुसुम की पढ़ाई भी बचपन में छूट गई थी। उन दिनो वह 'विद्या विनोदिनी' का इम्तिहान दे रही थीं। मुरैना में उनके घर जब भी मैं जाता, वहीं से उनके पुराने कॉपी-किताब उठा ले आता। उन्हें बार-बार पढ़ता रहता। उनमें मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, भगवतीचरण वर्मा आदि की कविताएं छंद में होती थीं। वे बार-बार पढ़ने से वे कंठस्थ हो जाया करती थीं। उन्हें गाता-गुनगुनाता रहता। तो बचपन की, ऐसी कविताएं, वे ज्यादातर मुझे आज भी याद हैं। ऐसी कविताएं जोर-जोर से पढ़ने में बड़ा आनंद आता था। इतनी सरल-सहज, सुंदर पंक्तियां कि दिन भर गाता फिरता,

हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहां कल वहां चले।
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले।
आए बनकर उल्लास अभी, आंसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे ! तुम कैसे आए, कहां चले?

तो बचपन में स्कूल न जाने का शुभ परिणाम ये हुआ कि उतनी बालवय में ही मैंने वह सब स्वाध्याय से कंठस्थ कर लिया था, जो मेरे कोर्स में था ही नहीं। उस समय भीतर से छटपटाहट रहती थी। अकेला था। कोई साथ खेलने वाला भी नहीं था। जंगल था चारो तरफ। कविताएं लय छंद में थीं, तो याद हो जाया करती थीं। आज भी मैं हिंदी के उन वरिष्ठ कवियों, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, प्रसाद आदि की पंक्तियां सुना देता हूं। आज भी याद हैं। उसका कारण मेरा बचपन में स्कूल न जाना है। तो कविता मेरे जीवन में इस तरह आई। उसके बाद जब पिता जी का ट्रांसफर ग्वालियर हुआ, वहां से नीरज, वीरेंद्र मिश्र, मुकुट बिहारी सरोज, कैलाश वाजपेयी आदि को कवि सम्मेलन में सुनने का अवसर मिला। उन दिनो ये कवि अखिल भारतीय मंचों पर गूंज रहे थे। ग्वालियर में खूब कवि सम्मेलन सुनता था। उसमें ये सब गीतकार होते थे। कैलाश वाजपेयी सुंदर गाते थे। उस समय तो नीरज भी उनके सामने फीके पड़ जाते थे। उसी समय मंच से सुना गया मुकुट बीहारी सरोज का एक गीत याद आ रहा है-

मरहम से क्या होगा, ये फोड़ा नासूरी है,
अब तो इसकी चीर-फाड़ करना मजबूरी है,
तुम कहते हो हिंसा, होगी, लेकिन बहुत जरूरी है।

उस समय मेरी उम्र लगभग 13 साल की रही होगी। आठवां दर्जा पास कर मुरैना से ग्वालियर आ गया था। पांचवीं से आठवीं क्लास तक मुरैना में पढ़ा था। मैंने लगभग 15 की उम्र में ग्वालियर से हाईस्कूल पास कर लिया था। हाई स्कूल के बाद हिंदी मेरा विषय नहीं रही। इंटर में फिजिक्स, कैमेस्ट्री, मैथ, इंग्लिश आदि मेरे पाठ्यक्रम में रहे। ग्वालियर में जहां मेरा घर था, नई सड़क के आगे, शायर निदा फ़ाज़ली मेरे पड़ोसी दोस्त हुआ करते थे। बस दो साल बड़े थे। रोजाना मिलते थे। वहां पड़ोस में ही मेरे घर से बस दो-तीन मिनट के फासले पर यादव टाकीज के सामने एक साहित्य की पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी। मेरे घर से लगी उस सड़क पर कई एक सिनेमा हाल थे। उस समय की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएं उस दुकान पर आती थीं। शाम के वक्त प्रायः वहां कई एक कवि-साहित्यकार, जो आसपास ही रहते थे, जमा हो जाते थे, ओम प्रभाकर, शानी, मुकुट बिहारी सरोज आदि। और बाद में विनोद कुमार शुक्ल भी वहां आने लगे थे।

नरेश सक्सेना बताते हैं कि 'आंसू' में जयशंकर प्रसाद की एक कविता की पंक्ति है- 'शशि मुख पर घूंघट डाले, अंचल में दीप छिपाए...।' इसके साथ मेरे बचपन का एक अजीब वाकया जुड़ा हुआ है। हमारी दूर की एक चचेरी बहन थी शशि। नन्ही-सी। अक्सर उसे चिढ़ाने के लिए मैं यह कविता सुनाया करता। उस समय 'शशि' शब्द का अर्थ न मुझे मालूम था, न शशि को। उसके पिता की मंगौड़े की दुकान थी। एक दिन मैंने उसके पिता से जब पूछा तो, बोले - 'अर्थ तो मुझे भी नहीं मालूम। बस, लोगों ने कहा कि अच्छा है, यही नाम रख दो, तो रख दिया।' जब बड़े होने पर मैंने जयशंकर प्रसाद को पढ़ा, तब पता चला कि यह तो 'आंसू' की पंक्तियां हैं। फिर रवींद्र नाथ ठाकुर का साहित्य पढ़ने पर ज्ञात हुआ कि इस कविता का बिंब तो प्रसादजी ने रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता से लिया है।

वह कहते हैं कि कविता की हालत इस वक्त ये है, जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ रही है, हिंदी की साहित्यिक पुस्तकों की बिक्री घट रही है। जैसे-जैसे क्रय-शक्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे साहित्य की पुस्तकों की बिक्री घट रही है। उसके मूल में ये बात है कि देश के अधिकतर गरीब और ग्रामीण बच्चे पढ़ नहीं पा रहे हैं। उनके लिए स्कूल ही नहीं हैं। हैं, तो वहां शिक्षक नहीं हैं। शिक्षक हैं, तो पढ़ाई नहीं होती है। जो बच्चे पढ़ सकते हैं, इंग्लिश मीडियम में पढ़ने लगे हैं। वह शहर के हों या गांव के। ग्रामीण अपनी जायदाद बेचकर भी उन्हें अंग्रेजी मीडियम में ही पढ़ाते हैं अथवा पढ़ाना चाहते हैं। इन अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी को बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है। हीन भाव से देखा जाता है। बच्चे भी समझ जाते हैं कि हिंदी की कोई हैसियत नहीं है। 

देश के सारे विश्वविद्यालयों में हर विषय की उच्च शिक्षा इंग्लिश में दी जाती है। तो, हिंदी अब न ज्ञान की भाषा रही, न कविता जुबान की। जो भाषा ज्ञान की भाषा नहीं है, तो क्या उसे अज्ञान की भाषा कहा जाए? इसके दुष्परिणाम ये हुए कि चार-पांच साल के हमारे छोटे-छोटे बच्चे अब अंग्रेजी, रटते हैं, पढ़ते नहीं हैं। वे अब क्लास में सवाल नहीं पूछ पाते। जो नया विषय पढ़ाया जा रहा है, उसके रहस्यों पर वे न आश्चर्य कर पाते हैं, न आनंद आता है उन्हे पढ़ने में। मजा नहीं आता है। वे कुछ सोच नहीं पाते। वे रट्टू तोते बन जाते हैं। घर पर माता-पिता रटाते रहते हैं। बच्चे बिना समझे विषय को बस याद भर कर लेते हैं।

हमारी इस 'परम सयानी' शिक्षा व्यवस्था का नतीजा ये रहा है कि देश में 70 साल से कोई नोबल प्रॉइज नहीं आया। सोचिए कि इस देश में विज्ञान, टेक्नोलॉजी में पिछले सत्तर सालों में कितने नए आविष्कार हुए और कितने नोबल प्रॉइज मिले, क्योंकि सभी भारतीय भाषाएं इसी गति को प्राप्त हैं। ध्यान रहे कि हंगरी की आबादी एक करोड़ भी नहीं है लेकिन उसके पास 12 नोबेल प्रॉइज हैं। यहां आबादी सवा सौ करोड़ है, तो 1200 सौ तो नोबल प्रॉइज मिल ही सकते हैं। यहां तो 12 भी नहीं मिले। सन् 1914 में एक पीसा (PISA - प्रोग्राम आफ इंटरनेशनल स्टूडेंट अससमेंट) की अंतरराष्ट्री प्रतियोगिता हुई। उसमें 164 देशों ने भाग लिया। तो उसमें भारतीय विद्यार्थियों का नंबर क्या आया- 163वां। पता नहीं, एक नंबर से कैसे चूक गए। वह तो अंतिम नंबर तुर्कबेनिया ने मार लिया वरना हम ही असफलता के महानायक होते। तब और ज्यादा नाम रोशन (जगहंसाई) होता। अव्वल फिसड्डी होने से बस एक नंबर पीछे रह गए हम। 

नरेश सक्सेना की एक प्रसिद्ध रचना है चीजों के गिरने के नियम,

चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में मनुष्य कर सकते हैं
बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं
कि गिरना हो तो घर में गिरो, बाहर मत गिरो
यानी चिट्ठी में गिरो, लिफाफे में बचे रहो,
यानी आँखों में गिरो, चश्मे में बचे रहो,
यानी शब्दों में बचे रहो, अर्थों में गिरो
यही सोच कर गिरा भीतर कि औसत कद का मैं
साढ़े पाँच फीट से ज्यादा क्या गिरूँगा
लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह
कि गिरना मेरा खत्म ही नहीं हो रहा......
और लोग हर कद और हर वजन के लोग
खाये पिये और अघाये लोग, हम लोग और तुम लोग
एक साथ एक गति से एक ही दिशा में गिरते नजर आ रहे हैं
इसीलिए कहता हूँ कि गौर से देखो, अपने चारों तरफ
चीजों का गिरना, और गिरो
गिरो जैसे गिरती है बर्फ ऊँची चोटियों पर
जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ
गिरो प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह
रीते पात्र में पानी की तरह गिरो
उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए
गिरो आँसू की एक बूँद की तरह किसी के दुख में
गेंद की तरह गिरो खेलते बच्चों के बीच।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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