जिंदगी की हज़ार मुश्किलों को मात देने वाली लखनऊ की नसरीन

मुस्लिम परिवार में पैदा हुईं लखनऊ की नसरीन ने समाज की दकियानुसी सोच से लड़ते हुए कैसे खुद को संभाले रखा, ये काबिल-ए-तारीफ है...

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नसरीन जब बी.ए. फर्स्ट ईयर में थीं, तो उनकी शादी हो गई। शादी के एक साल तक वह अपने सास-ससुर के साथ रहीं, उसके बाद उन्हें घर से अलग कर दिया गया। पति कुछ काम नहीं करते थे, तो नसरीन ने डेयरी खोल ली और दूध बेचना शुरू किया। दूध का बिजनेस लगभग 5 सालों तक चला, लेकिन उसी बीच नसरीन के पति को पुलिस ने पकड़ लिया और फिर...?

लखनऊ की रहने वाली नसरीन वैसे तो कोई बड़ा नाम नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपनी साधारण-सी जिंदगी में असाधारण-सी मुश्किलों को झेला है उस लिहाज से वह किसी मजबूत शख्सियत से कम भी नहीं।

मुस्लिम परिवार में पैदा हुईं और पली बढ़ीं नसरीन को समाज की दकियानूसी सोच का सामना करना पड़ा। घर से बाहर निकलने को लेकर उन पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की गई, लेकिन नसरीन ने कभी हार नहीं मानी। आज वह जिंदगी अपनी शर्तों पर जी रही हैं। हालाँकि यह आसान नहीं था। नसरीन जिंदगीं में कई कंटीले रास्तों पर चलकर अपनी मंजिल तक पहुंची हैं। उनका कहना है कि 'अपने दिल में अपनी मंजिल ठान लेना जरूरी है। रास्ते खुद बखुद बनने लगते हैं।' नसरीन अभी सदभावना ट्रस्ट नाम के एक गैर-सरकारी संगठन में इन्फॉर्मेशन कोऑर्डिनेटर के तौर पर कार्यरत हैं।

नसरीन जब बीए फर्स्ट ईयर में थीं, तो उनकी शादी हो गई। यह 1999 की बात है। शादी के एक साल तक वह अपने सास-ससुर के साथ रहीं और उसके बाद ससुराल वालों ने उन्हें घर से अलग कर दिया। पति कुछ काम नहीं करते थे, तो नसरीन ने डेयरी खोल ली और दूध बेचना शुरू किया। दूध का बिजनेस लगभग 5 साल तक चला। उनके पति पर कुछ कोर्ट केस चल रहे थे, जिसकी वजह से एक दिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और इसके बाद नसरीन की ज़िंदगी में शुरु हुआ मुश्किलों का दौर। कोर्ट-कचहरी और थाने-पुलिस के चक्कर काटने में उनका दूध का बिजनेस पूरी तरह से चौपट हो गया।

दूध का बिज़नेस चौपट होने के बाद नसरीन ने स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, बच्चों के ट्यूशन लेने शुरू किये और साथ ही सिलाई भी सीखी। उनके इन प्रयासों से जैसे-तैसे घर का खर्च चल रहा था।

नसरीन बताती हैं, कि अक्सर उन्हें जल्दी घर से जाने और देर से आने पर कई तरह के सवाल पूछे जाते थे। सिर्फ घर वाले ही नहीं बल्कि आस-पड़ोस के लोग भी कई तरह की बातें बनाया करते थे। मोहल्ले के लोगों की अलग सुननी पड़ती थी। लोग कहते थे, कि इतनी जल्दी चली जाती हो और इतनी रात को आती है। पता नहीं कहां क्या करती है। जब डेयरी का बिजनेस बेकार हो गया, तो घर चलाने के लिए नसरीन ने स्कूल में टीचिंग शुरू की। उस वक्त उन्हें टीचिंग से 800 रुपये हर महीने मिलते थे। इसके साथ ही उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे उन्हें बहुत ज्यादा आय तो नहीं होती थी, लेकिन वह कहती हैं कि उनकी उस आमदनी से बच्चे भूखे नहीं रहते थे और किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता था। नसरीन अकेले घर संभाल रही थीं।

कुछ समय बाद जब बच्चे बड़े हुए तो वह टीचिंग छोड़ एक गैर सरकारी संगठन 'सदभावना ट्रस्ट' से जुड़ीं और यहां कंप्यूटर पर काम करना सीखा। पिछले साल 2016 के अप्रैल महीने में उनके पति का इतंकाल हो गया। पति की मौत के बाद से वह अपने बच्चों की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठा रही हैं। नसरीन कहती हैं, कि 'जीवन में बहुत मुश्किलें आयीं और मुसीबतें सर पर रहीं लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मुझे ख़ुशी है कि मैंने ज़िन्दगी के हाथों हार कबूल नहीं की और हर काम सीखा।' साथ ही वो ये भी कहती हैं, कि 'मैं चाहती हूँ मेरी जैसी तमाम बहनें और महिलाएं हिम्मत करें और सामने आएं। मैं खुद उनकी मदद के लिए तैयार हूँ। हमें हमेशा एक बात याद रखनी चाहिये कि एक महिला अगर कुछ करने की ठान ले तो वो उसे पा कर ही रहती हैं और यही हमारी जीत है।'

नसरीन के चार बेटे-बेटियां हैं। वह कहती हैं, 'हम घर से बाहर निकले हमने काफी कुछ सीखा और अपने दम पर खड़े हुए। अगर हम ये सब नहीं रहते तो चूल्हे चौके में कहीं दबे रह जाते। लेकिन हां हम कह सकते हैं कि हमने हिम्मत की। हमें लगता है कि औरतें किसी से कम नहीं होतीं। अगर औरतें ठान लें तो वे कुछ भी कर सकती हैं। आगे हम चाहेंगे कि बाकी महिलाएं भी इसी तरह घर से बाहर निकलें और अपने दम पर अपनी मेहनत से समाज को दिखा दें कि महिलाएं क्या कर सकती हैं।'

नसरीन आज उन तमाम महिलाओं के लिए नजीर हैं जो छोटी-सी मुश्किल से हार मान जाती हैं। 

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