जंगल थर्राए, पहाड़ के जानवर हुए आदमखोर

हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में लोगों का रहना दूभर होता चला जा रहा है। हाथी, गुलदार, भालू, सूअर, खूंखार बंदर, गाएं बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान ही नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि पर्यटकों पर आक्रमण भी करने लगे हैं।

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हिमाचल, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार निर्माण कार्य, वन्य जीवों का अवैध शिकार, जंगली आग, विकास के नाम पर विस्फोट, वनों में घटता आहार, लुप्त होते पानी के स्रोत ने जंगलों को वन्य प्राणियों के लिए सहनीय नहीं रहने दिया है। उनके आदमखोर होने की यही सब खास वजहें हैं। पिछले कुछ वर्षों में वन्य जीवों के हमलों में सैकड़ों लोग जान से हाथ धो चुके हैं। आत्मरक्षा में जंगल का कानून तो आड़े आता ही है, साथ ही मारे जा रहे लोगों के परिजनों को मिलने वाली मुआवजा राशि भी प्रायः सवालों के घेरे में रहती है...

फोटो साभार: awesomwallpaper
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एक जानकारी के मुताबिक अब तक अकेले उत्तराखंड में ही विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में 317 लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं। इनमें सर्वाधिक 204 से अधिक लोग गुलदारों के हमलों में मरे हैं। वन्यप्राणी विशेषज्ञों की मानें, उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों पर जंगली परिक्षेत्रों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप जानवरों के खूंख्वार, आदमखोर होने की एक बड़ी वजह है।

 उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों पर जंगली परिक्षेत्रों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप जानवरों के खूंखार और आदमखोर होने की एक बड़ी वजह है।

हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में लोगों का रहना दूभर होता चला जा रहा है। हाथी, गुलदार, भालू, सूअर, खूंखार बंदर, गाएं बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान ही नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि पर्यटकों पर आक्रमण भी करने लगे हैं। खौफ खाए ग्रामीण अपने ठिकाने बदल रहे हैं। आतंकित ग्रामीण चारे के अभाव में अपने मवेशियों को औने-पौने दामों में बेचने लगे हैं। एक जानकारी के मुताबिक अब तक अकेले उत्तराखंड में ही विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में 317 लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं। इनमें सर्वाधिक 204 से अधिक लोग गुलदारों के हमलों में मरे हैं। 

वन्यप्राणी विशेषज्ञ बता रहे हैं, कि उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों पर जंगली परिक्षेत्रों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप जानवरों के खूंखार और आदमखोर होने की एक बड़ी वजह है। दिन-रात पर्यटकों के वाहनों की तो आवाजाही लगी ही रहती है, जगह-जगह हेलीपैड बन जाने, हेलीकाप्टरों की गड़गड़ाहट से जानवरों में भगदड़ मची रहती है। उनका यह भी कहना है कि प्राकृतिक आपदा के बाद से पहाड़ के वन्य प्राणी और अधिक बौखलाए हैं। पहाड़ों पर लगातार निर्माण कार्य होने, वायु यात्राओं से परिवेश वन्य जीवों के लिए सहनीय नहीं रह गया है। इसके साथ ही जंगलों के खत्म होते अस्तित्व का असर भी जानवरों की बेचैनी के रूप में देखा जा रहा है।

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"कुछ समय से वन्य प्राणियों और आबादी के बीच ‘भूख’ मिटाने की जंग सी छिड़ गई है। कभी-कभी दोनों पक्षों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। गुलदारों और बाघों के शिकार होने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या अधिक है।"

आज उत्तराखंड में शायद ही ऐसा कोई जिला हो, जहां पर आदमखोर गुलदार का आतंक न हो। खूंखार जानवरों को ठिकाने लगाने में कानून आड़े आ रहा है। गुलदार को मारने पर सात साल कैद का प्रावधान है। ग्रामीणों की एकमात्र उम्मीद वन विभाग से लगी रहती है। हालत यह है, कि कई स्थानों पर लोग आदमखोर गुलदार के डर से शाम ढलते ही घरों में दुबक जाते हैं। वन्य आदमखोरी के शिकार लोगों के परिजनों को शासन से मिलने वाली अनुग्रह राशि भी हमेशा से सवालों के घेरे में है।

जानकारों का यह भी कहना है, कि वन्य जीवों का अवैध शिकार, जंगली आग, विकास के नाम पर विस्फोट, वनों में घटता आहार, लुप्त होते पानी के स्रोत जंगली जानवरों को बस्तियों की ओर धावा बोलने के लिए विवश कर रहे हैं। वन विभाग के सामने चुनौती है कि वह इन जंगली जीवों को आए दिन होने वाली प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं अवैध शिकार से कैसे बचाया जाए। यद्यपि इस गंभीर हालात को देखते हुए कई स्तरों पर व्यवस्थाएं बनाई भी गई हैं।

जंगली इलाकों में गुलदार एवं मैदानी इलाकों में ट्रांजिट रसेन्यू सेन्टरों की स्थापना की गई है। अवैध शिकार और वन्य जीव अपराधियों को पकड़ने के लिए डॉग स्क्वायड की व्यवस्थाएं की गई हैं। रैपिड एक्शन फोर्सहाईव पैट्रोल की स्थापना भी की गई है। संरक्षित क्षेत्रों में इको विकास समितियां भी गठित की गई हैं।

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लेकिन फिर भी इतने सारे इतंजामों और रोक के बावजूद एक ओर वन्य जीव मौत के घाट उतारे जा रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर आबादी पर जानवरों का गुस्सा रह रह कर टूट रहा है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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