एक ड्राइवर के इंजीनियर बेटे क्यों जुटे हैं गरीब बच्चों को बेहतर तालीम देने में...

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आर्थिक तकलीफों के कारण जिस शख्स ने अपनी स्कूली पढ़ाई बमुश्किल पूरी की वो आज इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। अपने साथी छात्रों का साल खराब ना हो इसके लिए उनको पढ़ाने का काम शुरू किया। ये सिलसिला चलता रहा और अब वो सैकड़ों स्कूली बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने का काम कर रहा है अपने संगठन ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ के जरिये। अजीज-उर-रहमान बिहार के गया जिले के हमजापुर गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता एक ड्राइवर हैं। रहमान बचपन से ही पढ़ने में काफी अच्छे थे। जब वे 9-10वीं में थे तो उनका परीक्षाफल देखकर उनके पिता और उनके दो बड़े भाईयों ने उन्हें पढ़ने के लिए पटना भेज दिया। 12वीं करने के बाद उनका चयन इंजीनियरिंग के लिए पुणे के एमआईटी कॉलेज में हो गया।


पुणे आने के बाद जब अजीज-उर-रहमान अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि कोई भी साथी छात्र अगर किसी एक विषय में कमजोर रह जाता है तो उसका पूरा साल खराब हो जाता है। रहमान की गणित पर बहुत अच्छी पकड़ थी इस कारण उन्होंने अपने साथियों को जो गणित में कमजोर थे, उन्हें पढ़ाना शुरू किया। ये काम उन्होंने पहले और दूसरे साल तक जारी रखा।


समय के साथ अजीज-उर-रहमान को अहसास हुआ कि वो अच्छा पढ़ा लेते हैं। यही बात कॉलेज प्रशासन को पता चली। असर ये हुआ कि उन्हें दूसरे कॉलेजों में भी इंजीनियरिंग के छात्रों को पढ़ाने की अनुमति मिल गई। इस दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ दूसरे छात्रों को भी गणित पढ़ाने का काम जारी रखा। धीरे धीरे उनके मन में विचार आया कि क्यों ना अपने इस काम का विस्तार किया जाए और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी शिक्षित किया जाये। रहमान गरीब परिवार से आते हैं इस कारण उन्हें पता था कि बहुत से गरीब बच्चों में योग्यता होती है लेकिन पैसे की कमी के कारण वो आगे नहीं बढ़ पाते। तब उन्होंने ऐसे गरीब बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया। रहमान कहते हैं  

“सब बच्चे मेरी तरह खुशनसीब नहीं होते क्योंकि अगर मुझे मेरे दो बड़े भाईयों का सहयोग ना मिला होता तो मैं आज इंजीनियरिंग नहीं कर रहा होता।” 

इस तरह एक दिन अजीज-उर-रहमान खुद एक सरकारी स्कूल में गये और वहां के प्रिसिपल से अपनी इच्छा बताई कि वो इन बच्चों को कम्प्यूटर सीखाना चाहते हैं। वहां के प्रिसिपल ने उनको इसकी अनुमति दे दी। अकेले छोटे बच्चों को पढ़ाना उनके बस में नहीं था इसलिए उन्होंने उन छात्रों को अपने साथ जोड़ा जिनकी पढ़ाई में वो पहले मदद कर चुके थे।


इसके बाद अजीज-उर-रहमान ने साल 2014 में ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ की स्थापना की। इस ट्रस्ट का मकसद गरीब और स्लम में रहने वाले योग्य बच्चों की पढ़ाई में मदद करना है। ताकि वो बच्चे भी दूसरे बच्चों की डॉक्टर, इंजीनियर बन सकें। शुरूआत में उन्होंने पुणे से 25 किलोमीटर दूर आलंदी गांव के 2 स्कूल और कल्याण गांव के एक स्कूल को इसके लिए चुना। यहां पर वो और उनकी टीम बच्चों को गणित, अंग्रेजी और कम्प्यूटर पढ़ाते हैं। ये बच्चे प्राइमरी स्कूल के कक्षा 1 से 7वीं तक के बच्चे हैं। इन बच्चों को वो शनिवार, इतवार को पढ़ाते हैं। इसमें वो इन विषयों की किताबें, एसाइनमेन्ट बच्चों को अपनी ओर से उपलब्ध कराते हैं।


धीरे धीरे कॉलेज में सभी छात्रों को पता चल गया कि रहमान ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ चला रहे हैं। तब अपने काम के विस्तार के लिए उन्होंने अपने कॉलेज के 48 लोगों को इस काम के लिए चुना। इन चुने हुए छात्रों को उन्होंने कॉलेज कैम्पस में ही बच्चों के पढ़ाने की ट्रेनिंग दी। इस तरह हर साल एमआईटी कॉलेज के नये छात्र इनके साथ जुड़ते जा रहे हैं। आज जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट के साथ एमआईटी और दूसरे कॉलेज के 92 छात्र जुड़ चुके हैं। ये सभी छात्र इंजीनियरिंग के क्षेत्र से हैं।


‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ गरीब, अनाथ और दिव्यांग बच्चों को मुफ्त में कम्प्यूटर, गणित और अंग्रेजी की ट्यूशन देने का काम करता है। रहमान की कोशिश है कि ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ का काम पुणे के अलावा दूसरे शहरों में भी फैले। ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे उनकी इस कोशिश का फायदा उठा सकें। ये रहमान की ही कोशिशों का असर है कि पुणे से 25 किलोमीटर दूर आलंदी गांव में 40 बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर शुरू किया गया है। इसकी कक्षाएं सातों दिन शाम 5 बजे से 7 बजे तक चलती हैं। इसमें अजीज-उर-रहमान बच्चों को उनकी पढ़ाई में आने वाली दिक्कतों को दूर करते हैं। इसके अलावा जो बच्चे स्कूल नहीं जाते या जिन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया है ऐसे बच्चों को ये स्कूल में भर्ती कराते हैं।


इनकी टीम सप्ताहांत के किसी एक दिन दिव्यांग बच्चों को और एक दिन दूसरे बच्चों को बच्चों को पढ़ाती है। बच्चों को पढ़ाई के साथ ये लोग उनके कौशल में निखार लाने की कोशिश करते हैं। इसके लिए वो बच्चों को ग्रुप डिस्कशन, डिबेट, जनरल नॉलेज के साथ बच्चों को स्पोर्टस की भी ट्रेनिंग देते हैं। रहमान की टीम इन जैसे बच्चों के लिए समय समय पर वर्कशॉप भी चलाती रहती है। रहमान के इस काम में उनके कॉलेज के साथ 3 और कॉलेज भी जुड़े हुए हैं। अभी उन्होंने पुणे के एक गर्ल्स इंजीनियरिंग कॉलेज को भी अपने इस काम में शामिल किया है। रहमान का मानना है कि वो चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा यूथ उनके इस काम में उनके साथ जुड़े क्योंकि एक अकेला कुछ नहीं कर सकता।


रहमान ये सारा काम अपनी बचत और दोस्तों की मदद से मिलने वाले चंदे से कर रहे हैं। इसके लिए ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ के 10 ट्रस्टी हर साल 1 हजार रुपये देता है। साथ ही जो 25 मेंबर उनके साथ जुड़े हैं उन्हें भी सालाना 1 हजार रूपये देना होता है। इसके अलावा रहमान दूसरे छात्रों को कोचिंग देकर जो कुछ कमाते हैं उसका कुछ हिस्सा भी वो इसमें लगाते हैं। अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में उनका कहना है कि वो चाहते हैं कि नौकरी के दौरान उनके और साथी उनकी इस मुहिम में उनके साथ जुड़े ताकि ‘जिज्ञासा एजुकेशनल ट्रस्ट’ के जरिये ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अच्छी तालीम मिल सके। 


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I would like to quote myself as ‘a writer by chance’, as fate wants me to write. Now, writing has become my passion, my child, my engagement, and my contentment. Worked as a freelance writer in gathering social and youth oriented real stories.

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