कमला दास ने सिखाया ज़िन्दगी के बिना भी कैसे रहा जाए ज़िन्दा  

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कमला दास उस अजेय स्त्री लेखिका का नाम है, जिसका आजीवन कदम-कदम पर विवादों और संघर्षों से साबका पड़ता रहा। जन्मभूमि बदल दी लेकिन कठिन हालात से कभी हार नहीं मानी। और नहीं तो, 'माय स्टोरी' लिखकर स्त्री-शोषक रीति-रिवाजों, परंपराओं पर अमिट कालिख पोत दी। इस किताब से कुछ वक्त के लिए साहित्य जगत में मानो भूचाल सा आ गया।

कमला दास (फाइल फोटो)
कमला दास (फाइल फोटो)
वह अपने जीवन में बदलाव की जरूरत को पहचानती और शिद्दत से महसूस तो करती रहीं लेकिन एक परंपरावादी स्त्री के चक्रव्यूह से वह लगातार मुक्ति की राह भी खोजती रहीं। उनके शब्द जीवन और समाज के पाखंडों से लड़ते रहे।

मलयालम और अंग्रेजी भाषा की जानी-मानी लेखिका कमला दास पर सर्च इंजन गूगल ने आज डूडल बनाया है। उनका आजीवन तरह-तरह के विवादों और संघर्षों से साबका पड़ता रहा। जब उन्होंने कलम उठाई थी, सबसे पहले लिखा, 'तुम एमी हो या कमला या कि माधवी कुट्टी, अब वक्त आ गया है, एक नाम एक रोल चुनने का।' वर्ष 1976 में जब 'माई स्‍टोरी' नाम से उनकी खुद की जीवनी प्रकाशित हुई तो साहित्य जगत में मानो भूचाल सा आ गया। अपने जीवन में असहनीय विपरीत हालात का सामना करते हुए कमला दास ने मैत्रेयी पुष्पा की 'गुडि़या भीतर गुड़िया' की तरह 'मॉय स्टॉरी' में विवाहेतर संबंधों, प्यार पाने की अपनी नाकामयाब कोशिशों, पुरुषों से मिले अनुभवों को दृढ़ता और बेबाकी से रेखांकित किया।

उस पर तरह तरह से विवाद उभर कर सामने आने लगे। पुस्तक इतनी चर्चित हुई कि लोग चाहे जैसे भी उपलब्ध कर उसे पढ़ने लगे। बाद में यह किताब 15 विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई। बाद में उन्होंने इसे फिक्शन घोषित कर दिया, पर एक बच्चे की भोली बेबाकी से यह जोड़ना न भूलीं, कि ‘मुझे तो प्यार की तलाश थी। और अगर प्यार घर में न मिले, तो पैर तो भटकेंगे ही।’ उनकी रचनाओं में जीवन के बिंदास बोल कुछ इस तरह मुखरित होते थे -

मुझे नहीं दरकार छलनामय घरेलू सुखों,
गुड-नाइट चुंबनों या साप्ताहिक खतों की
जो, ‘माय डियरेस्ट’ संबोधन से शुरू होते हैं
उन वैवाहिक कस्मों का खोखलापन
और डबलबैड का अकेलापन भी मैं जन चुकी हूं,
जिस पर लेटा मेरा संगी स्वप्न देखता है किसी और का
जो उसकी बीबी से कहीं बड़ी छिनाल है..


पंद्रह साल की किशोर वय में ही कलकत्ता के रिजर्व बैंक के उच्चाधिकारी माधव दास से शादी हो जाने के बाद के दिनो में उन्हें लेखन की घरेलू दुश्वारियों का सामना करना पड़ा। यदि घर के लोग जाग रहे हों तो वह रसोईघर में ही कलम चलाती रहती थीं। जब तक परिवार के लोग रात में जगे रहते, वह लिख नहीं पाती थीं। उनके सो जाने के बाद वह कलम उठा लेतीं और रात-रात भर लिखती-पढ़ती रहती थी। सोलह वर्ष में ही वह माँ बन गईं। उन्होंने मां होने के कड़वे अनुभवों पर भी कलम चलाई। वह अंग्रेज़ी में कमला दास और मलयालम में माधवी कुट्टी नाम से लिखने लगीं। वह पेंटिंग भी करती थीं।

अपने जिंदगीनामा पर रोशनी डालती हुई वह बताती हैं कि किस तरह पति की मौत के बाद तीन बेटों के बावजूद वे लगातार एकाकी होती चली गईं। उपेक्षित मां और समृद्ध लेकिन नौकरों पर आश्रित पर्दानशीं विधवा के सूने जीवन ने उन्हें एक बार मृत्यु का वरण करने को बहुत उकसाया तो घर के नौकरों से छिपकर वह बुर्के में एक पेशेवर हत्यारे के पास पहुंच गई थीं। उन्होंने उस पेशेवर खूनी पूछा कि क्या तुम पैसे लेकर लोगों की हत्या करते हो? हत्यारा पहले तो चौका, फिर गुस्से में उसने पूछा - तुम कौन हो? किसने मेरा पता दिया तुम्हें?

उन्होंने सीधेपन में पता बताने वाले का नाम जुबान पर ला दिया। इसके बाद हत्यारे ने पूछा कि किसको मारना है तो कमलादास का जवाब था- मुझको। मैं जीवन से उकता चुकी हूं। अपने हाथों से अपनी हत्या करने का साहस मुझमें नहीं है। मुझे मारने के बदले में तुम्हें जितना पैसा चाहिए, एडवांस में ले लो लेकिन उस दरिंदे ने उन्हें उल्टे समझा-बुझाकर लौटा दिया। ऐसी ही कठोर मनःस्थितियों में एक दिन उन्होंने यह 'आईना' कविता लिखी थी -

आसान है एक मर्द की तलाश जो तुम्हें प्यार करे
बस, तुम ईमानदार रहो कि एक औरत के रूप में तुम चाहती क्या हो
आईने के सामने उसके साथ नग्न खड़ी हो
ताकि वह देख सके कि वह है तुमसे ज़्यादा मजबूत
और इस पर भरोसा करे
और तुम और ज्यादा कोमल जवान प्यारी दिखो
स्वीकृति दो अपनी प्रशंसा को ।
उसके अंगों की पूर्णता पर ध्यान दो
झरने के नीचे लाल होती उसकी आँखें
बाथरूम की फ़र्श पर वही शर्माती चाल
तौलिये को गिराना, और उसका हिला कर पेशाब करने का तरीका
उन सभी बातों का प्रशंसनीय ब्यौरा जो उसे मर्द बनाती है
तुम्हारा इकलौता मर्द ।
उसे सब सौंप दो
वह सब सौंप दो जो तुम्हें औरत बनाती है
बड़े बालों की ख़ुशबू
स्तनों के बीच पसीने की कस्तूरी
तुम्हारी माहवारी के लहू की गर्म झनझनाहट
और तुम्हारी वे सब स्त्री भूख ।
हाँ, आसान है एक मर्द पाना जिसे तुम प्यार कर सको
लेकिन उसके बाद उसके बिना रहने का सामना करना पड़ सकता है ।
ज़िन्दगी के बिना ज़िन्दा रहना
जब तुम आसपास घूमती हो
अजनबियों से मिलती हो
उन आँखों के साथ जिन्होंने अपनी तलाश छोड़ दी है
कान जो बस उसकी अन्तिम आवाज़ सुनते हैं कि वह पुकारता है तुम्हारा नाम
और तुम्हारी देह जो कभी उसके स्पर्श से चमकते पीतल-सा जगमगाती थी
जो अब फीकी और बेसहारा है ।

अभिव्यक्ति की आजादी का प्रश्न तो उनके जीवन में उन दिनो से कुलबुलाने लगा था, जब उन्हें पढ़ाई तक के लिए अपने आला ओहदेदार पिता के घर से बाहर नहीं जाने दिया गया था। उन्होंने 1984 में अपनी पार्टी बना कर चुनाव मैदान में भी उतरीं लेकिन जमानत ही जब्त हो गई। वर्ष 1999 में उन्होंने धर्मांतरण कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। इसके बाद वह अपना नाम कमला सुरैया लिखने लगीं। अभिव्यक्त की आज़ादी के लिए उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की पर्दाप्रथा की मुखालफत शुरू कर दी। उनकी कट्टर मुसलमानों से ठन गई। वह जब तक जीवित रहीं, स्त्रियों के अधिकार के लिए संघर्षरत रहीं। स्त्री के प्रेम और दुख का उन्होंने अपनी रचनाओं में बारीक रेखांकन किया।

उनका पुणे में 75 साल की उम्र में निधन हो गया। वर्ष 1984 में उनको नोबेल पुरस्‍कार के लिए नामित किया गया था। उन्‍हें अवॉर्ड ऑफ एशियन पेन एंथोलॉजी, केरल साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, एशियन पोएट्री पुरस्कार, केन्ट पुरस्कार, एशियन वर्ल्डस पुरस्कार, वयलॉर पुरस्कार, मुट्टाथु वरके अवॉर्ड, एज्हुथाचन पुरस्कार से सम्मानित हुईं। जीवन के सत्तर वसंत पार कर चुकी कमला दास को व्हील चेयर पर एशियाई साहित्य सम्मान से समादृत किया गया था। उनके नाना और मामा भी लेखक थे। उनके बड़े पुत्र प्रख्यात मलयालम दैनिक 'मातृभूमि' के प्रधान सम्पादक रहे। उनके रचना संसार में अलौकि प्रेम-प्यार के शब्द अलग ही तरह के अर्थ लेकर उमड़ते चले आते थे -

जब तक नहीं मिले थे तुम
मैने कविताएँ लिखीं, चित्र बनाए
घूमने गई दोस्तों के साथ
अब
जबकि प्यार करती हूँ मैं तुम्हें
बूढ़ी कुतिया की तरह गुड़ी-मुड़ी-सी पड़ी है
तुम्हारे भीतर मेरी ज़िन्दगी
शान्त…
.............
तुम्हें पाने तक
मैंनें कविताएँ लिखीं, तस्वीरें बनाईं,
और, दोस्तों के साथ गई बाहर
सैर के लिए....
और अब
मैं तुम्हें प्यार करती हूँ
एक बूढ़े पालतू कुत्ते की मानिन्द लिपटी
मेरा जीवन बसा है,
तुम में...

वह अपने जीवन में बदलाव की जरूरत को पहचानती और शिद्दत से महसूस तो करती रहीं लेकिन एक परंपरावादी स्त्री के चक्रव्यूह से वह लगातार मुक्ति की राह भी खोजती रहीं। उनके शब्द जीवन और समाज के पाखंडों से लड़ते रहे। जब जन्मभूमि और ससुराल की आबोहवा जैसे उनका दम घोटने लगी, वह मिट्टी छोड़ पुणे चली गईं और आखिरी सांस तक वहीं की होकर रह गईं। इंतकाल के बाद बेटों में विवाद हो गया। बाद में उन्हें इस्लामिक रीति से राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। उनकी एक चर्चित कविता है 'कीड़े' -

साँझ ढले, नदी के तट पर
कृष्ण ने आख़िरी बार उसे प्रेम किया
और चले गए फिर उसे छोड़कर
उस रात अपने पति की बाँहों में
ऐसी निष्चेष्ट पड़ी थी राधा
कि जब उसने पूछा
‘क्या परेशानी है ?
क्या बुरा लग रहा है तुम्हें मेरा चूमना, मेरा प्रेम’
तो उसने कहा
‘नहीं…बिल्कुल नहीं’
लेकिन सोचा --
‘क्या फ़र्क पड़ता है किसी लाश को
किसी कीड़े के काटने से !

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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