किसके लिए बाल दिवस? हर साल कुपोषण से मर रहे 10 लाख बच्चे

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आज बाल दिवस पर यह हकीकत चौंकाती है कि हमारे देश के करीब 44 करोड़ बच्चों में से 14 करोड़ बाल श्रमिक हैं। हर साल अकेले कुपोषण से ही 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जा रही है। लगभग 10 करोड़ बच्चों को स्कूल नसीब नहीं हैं। छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
दुनिया में 26 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं और लगभग 17 करोड़ बच्चे बाल श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं, जिनमें से आधे तो खनन, कचरा बीनने और कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं।

आज 14 नवंबर, बाल दिवस है। 27 मई 1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद पहली बार सर्वसहमति से फैसला लिया गया था कि उनके जन्मदिन, 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इससे पहले बाल दिवस 20 नवंबर को मनाया जाता था। संयुक्त राष्ट्र ने 1954 में 20 नवंबर को बाल दिवस मनाने का ऐलान किया था। आज भी कई देश 20 नवंबर को और कई देश पहली जून को बाल दिवस मनाते हैं। इस अवसर पर देश-दुनिया में करोड़ों बच्चों के अत्यंत दुखद हालात से गुजरने की यह ताजा आकड़ों की हकीकत किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है।

विश्व बैंक की मानव विकास रिपोर्ट में भी बताया गया है कि भारत में 10 से 14 करोड़ के बीच बाल श्रमिक हैं। बाल अधिकारों के हनन के सर्वाधिक मामले भारत में ही होते हैं। प्रगति के लंबे-चौड़े दावों के बावजूद भारत में बच्चों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। भारत में हर साल अकेले कुपोषण से ही 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है। लगभग 10 करोड़ बच्चों को स्कूल नसीब नहीं। इसके साथ ही स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। एकल परिवारों में बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं। ताजा जनगणना रिपोर्ट में ऐसे बच्चों और उनकी हालत के बारे में कई गंभीर तथ्य सामने आ चुके हैं।

देश में फिलहाल एक करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो पारिवारिक वजहों से स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करने पर भी मजबूर हैं। छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं। डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (डाइस) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पा रहे हैं। देश में पांच से 14 साल तक के उम्र के बाल मजदूरों की तादाद एक करोड़ से ज्यादा है। एक रिसर्च के मुताबिक सबसे दुखद सच ये है कि हमारे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बाल मजदूरों का योगदान 11 फीसदी है।

हमारे देश में 2007 में विधायी संस्था के रूप में गठित, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में इस समय 1300 गैरपंजीकृत चाइल्ड केयर संस्थान (सीसीआई) हैं यानी वे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रजिस्टर नहीं किए गए हैं। देश में कुल 5850 सीसीआई हैं और कुल संख्या 8000 के पार बताई जाती है। इस डाटा के मुताबिक सभी सीसीआई में करीब दो लाख तैंतीस हजार बच्चे रखे गए हैं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने देश में चलाए जा रहे समस्त सीसीआई को रजिस्टर करा लेने का आदेश दिया था। लेकिन सवाल पंजीकरण का ही नहीं है, पंजीकृत तो कोई एनजीओ करा ही लेगा क्योंकि उसे फंड या ग्रांट भी लेना है, लेकिन कोई पंजीकृत संस्था कैसा काम कर रही है, इसपर निरंतर निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था नदारद है।

डिजीटलाइजेशन पर जोर के बावजूद आज भी हमारी सरकारें अपने संस्थानों और अपने संरक्षण में चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता की निगरानी का कोई अचूक सिस्टम विकसित नहीं कर सकी हैं। देश के ढाई सौ से ज्यादा जिलों में चाइल्डलाइन सेवाएं चलाई जा रही हैं। बच्चों के उत्पीड़न और उनकी मुश्किलों का हल करने का दावा इस सेवा के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन लगता नहीं कि मुजफ्फरपुर या देवरिया में बच्चियों की चीखें इन चाइल्डलाइन्स तक पहुंची होंगी।

सर्वेक्षणों में एक सच ये भी सामने आया है कि दुनिया के कई देशों में बच्चा न चाहने के चलते जनसंख्या स्तर गड़बड़ाने लगा है। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की कुल बाल आबादी में से 19 फीसदी बच्चे भारत में हैं। देश की एक तिहाई आबादी में, 18 साल से कम उम्र के करीब 44 करोड़ बच्चे हैं। भारत सरकार के ही एक आकलन के मुताबिक 17 करोड़ यानी करीब 40 प्रतिशत बच्चे अनाश्रित, वलनरेबल हैं, जो विपरीत हालात में किसी तरह जी रहे हैं। कहीं संकटग्रस्त इलाकों में फंसे, तो कहीं बाल विवाह जैसी कुरीति का शिकार बन कर स्कूलों से निकाले गए, दुनिया के हर चार में से एक बच्चे का बचपन ऐसे ही छीना जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय चैरिटी 'सेव द चिल्ड्रेन' ने 'बचपन का अंत' नाम की एक सूची बनायी है और उसमें विश्व के 72 देशों की रैंकिंग की है। ये वह देश हैं, जहां बच्चे बीमारियों, संघर्षों और कई तरह की सामाजिक कुरीतियों के शिकार हो रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित हैं पश्चिम और केंद्रीय अफ्रीका के बच्चे, जहां के सात देश इस सूची के सबसे खराब 10 देशों में शामिल हैं। अपनी तरह की इस पहली सूची में सबसे बुरे हालात हैं नाइजर, अंगोला और माली में जबकि सबसे ऊपर रहे नॉर्वे, स्लोवेनिया और फिनलैंड। 'सेव द चिल्ड्रेन' का कहना है कि इन 70 करोड़ बच्चों में से ज्यादातर विकासशील देशों के वंचित समुदायों से आते हैं। इन समुदायों में बच्चों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीकी विकास का फायदा नहीं पहुंच पाया है। इनमें से तमाम बच्चे गरीबी और भेदभाव के एक जहरीले प्रभाव से ग्रस्त हैं।

दुनिया में 26 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं और लगभग 17 करोड़ बच्चे बाल श्रमिकों के रूप में काम कर रहे हैं, जिनमें से आधे तो खनन, कचरा बीनने और कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं। कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब 16 करोड़ बच्चों का विकास कुंद है। किड्सराइट्स इंडेक्स के मुताबिक मानदंडों पर आधारित रैंकिंग - यानी बच्चों के जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, संरक्षण आदि के अधिकारों की छानबीन से पता चला है कि सबसे अधिक सकारात्मक रुझान यूरोप में नजर आते हैं। 165 देशों की कुल सूची के टॉप 10 में आठ स्थान पर यूरोपीय देश शामिल हैं। पहले स्थान पर पुर्तगाल, दूसरे पर नॉर्वे, इसके बाद स्विजरलैंड, आइसलैंड, स्पेन, फ्रांस और स्वीडन हैं। चाड, सीरिया लियोन, अफगानिस्तान और मध्य अफ्रीकन गणराज्य का स्थान 165 देशों की सूची में सबसे नीचे है। इस सूची में 156वां स्थान ब्रिटेन का है। अध्ययन के मुताबिक भारत की तरह ब्रिटेन भी बाल अधिकारों को लागू करने के मामले में काफी पिछड़ा हुआ देश है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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