राजधानी की कोख में एक लावारिस मां की मौत!

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जब किसी इंजीनियर बेटे की बीमार-परित्यक्ता मां का शव नोएडा के पॉश इलाके में फ्लैट के भीतर पड़ा-पड़ा सड़ जाए, बदबू असहनीय हो जाने पर ही पड़ोसियों का भी होश ठिकाने लगे, फिर पुलिस को सूचना मिले, इसे सभ्य-भारतीय समाज में क्या कहेंगे? देश की राजधानी की कोख में एक और ऐसी ही मां की मौत।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
हमारे देश में किसी खाते-कमाते परिवार वाले मां-बाप के इस तरह से दुनिया छोड़ जाने की यह कोई पहली घटना नहीं। हम कैसे समय में जी रहे हैं? हमारी औलादें क्या इतनी क्रूर हो चुकी हैं?

जब कोई मां घर-गृहस्थी की तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने बेटे को बेहतर परवरिश, ऊंची पढ़ाई-लिखाई से जीवन में कामयाब बना दे, फिर भी जिंदगी के आखिरी दौर में खराब सेहत के कारण किसी पॉश कॉलोनी के सूने फ्लैट में उसे लावारिस मर जाना पड़े, उसकी लाश पड़े-पड़े सड़ जाए, इसे क्या कहेंगे? नोएडा के सेक्टर-99 में सुप्रीम सोसाइटी के टावर नंबर-एक में किराए के फ्लैट में अकेली रह रहीं बबीता ऐसी ही एक दुर्भाग्यशाली मां रहीं, जिनका 28 वर्षीय बेटा सिद्धार्थ बसु बेंगलरु स्थित एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। बबीता मूलतः पश्चिम बंगाल के दक्षिणी कोलकाता की रहने वाली थीं। नोएडा के इस फ्लैट में वह अकेली रहती थीं। उनकी दोनों किडनियां खराब हो गई थीं। हर हफ्ते दिल्ली के एक अस्पताल में उनका डायलेसिस होता था। कुछ दिनो के लिए सिद्धार्थ उनको देखभाल के लिए अपने साथ बेंगलुरु ले गया लेकिन बाद में उन्हें नोएडा के इस सूने फ्लैट में अकेले रहने के लिए छोड़ गया।

फ्लैट का झाड़ूपोंछा, बर्तन सफाई, दोनो वक्त का भोजन, सारा काम भी उन्हें खुद ही कर लेने के लिए छोड़ दिया गया। बताते हैं कि पिछले तीन सप्ताह से फ्लैट अंदर से बंद पड़ा था। कोई पड़ोसी तक ने भूलकर भी उनकी सुधि नहीं ली। दोनों किडनियां खराब होने के कारण उनकी अचानक मौत हो गई। जब फ्लैट से फूटती असहनीय बदबू ने आसपास के फ्लैट्स में रह रहे लोगों का सांस लेना दूभर कर दिया, तब कहीं जाकर पुलिस को सूचित किया गया। मौके पर सेक्टर-39 से पुलिस पहुंची और उसने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

बबीता का पंद्रह वर्ष पहले अपने पति से तलाक हो गया था। अब मामले की जांच की जा रही है। किस बात की जांच की जा रही है, इंजीनियर बेटे की नृशंसता की, पड़ोसियों की अमानवीयता की या पड़ोसियों के सामाजिक सरोकार पत्थर हो जाने की? हमारे देश में किसी खाते-कमाते परिवार वाले मां-बाप के इस तरह से दुनिया छोड़ जाने की यह कोई पहली घटना नहीं। हम कैसे समय में जी रहे हैं? हमारी औलादें क्या इतनी क्रूर हो चुकी हैं? क्या इस नृशंसता की जड़ें हमारी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और भोथर हो चुकी संस्कृति में हैं? पॉश कॉलोनियों की संस्कृति के तो वैसे भी क्या कहने। सोसायटियां बन गई हैं। ऐसे परिसरों के भीतर हर वक्त चारो तरफ मुर्दा सन्नाटा पसरा रहता है।

कथित संभ्रांत जन-परिजन घर में टीवी, मोबाइल से चिपके रहते हैं, बाहर कभी-कभार झांक लेते हैं, बंद गाड़ियों में बाहर निकलते हैं और लौटकर उसी तरह चुपचाप अपने दड़बों में कैद कर लेते हैं, यदा-कदा किसी बच्चे या कुत्ते की आवाज सुनाई पड़ जाती है अथवा किसी के यहां हो रही बर्थडे पार्टी के डैक सन्नाटा देते हैं। बबीता के फ्लैट का दरवाजा अंदर से बीस दिन से बंद था, किसी पड़ोसी में इतनी भी इंसानियत नहीं बची थी कि जानने, पूछने की जहमत उठा लेता। पहले ऐसा नहीं था। पहले भी संतानें इंजीनियर, डॉक्टर, अफसर हुआ करती थीं। नालायक औलादें भुला दें तो पड़ोसी दुख-दर्द में शामिल हो जाते थे। आज हमारी उस संस्कृति को लकवा मार गया है।

बबीता का शव हफ्तों फ्लैट में लावारिस पड़ा सड़ता रहा और बगल के मकानों में टीवी, मोबाइल से लोग गुलजार होते रहे। मुर्दाघाट पर भी ऐसा सन्नाटा, ऐसी अजनबीयत नहीं होती, कुत्ते-कौवे वहां मंडराया करते हैं। जब बदबू से उन पड़ोसियों की जिंदगी में खलल पड़ा तो उनकी तंद्रा टूटी। इन पॉश कॉलोनियों में मुर्दा-सन्नाटा पसरे रहने की वजह बेसबब नहीं। मान लीजिए, समाज का जो हिस्सा ऐसी रिहायशों तक पहुंच रहा है, ऐसी जीवन शैली का भूखा है, आदती हो चुका है, उससे किसी तरह की इंसानियत की उम्मीद करना नासमझी नहीं, मूर्खता होगी। और नालायक औलादों की तो कुछ पूछिए ही मत।

पुलिस बबीता के किराए के फ्लैट का मुख्य दरवाजा तोड़कर अंदर दाखिल होती है। भीतर असहनीय बदबू का भभका उठता है। सिद्धार्थ के मां के शव में कीड़े बजबजा रहे हैं। तब वहां खड़े लोग पुलिस को बताते हैं कि बबीता किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं। इसके बाद पुलिस से सूचना मिलने पर शिद्धार्थ हवाई जहाज से बेंगलुरु से नोएडा पहुंचता है। शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया जाता है। मामले में कोई लिखित शिकायत नहीं। आसपास कोई बदबू नहीं, सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। फिर वही मुर्दा सन्नाटा। शुतुरमुर्ग की तरह अपनी-अपनी रेत में सिर धंसाकर टीवी-मोबाइल में डूब जाने की खुदगर्जियां। उफ्। अंतिम बार सिद्धार्थ की अपनी मां से पिछले महीने 19 सितंबर को फोन पर बात हुई थी। उसके बाद वह बीच बीच में और भी कई बार फोन लगाता रहा लेकिन कोई जवाब न मिलने के बावजूद अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी में जुटा रहा। काश, उसने फ्लैट के मालिक या किसी पड़ोसी से ही अपनी मां की खोज-खबर ले लिया होता!

बताते हैं कि बबीता कभी-कभार सोसायटी के पार्क में टहलने बाहर निकला करती थीं। हमेशा दुखी रहा करती थीं। उनका दुख कौन बांटता, जब खुद का बेटा ही उन्हें अकेला कर गया था। अशक्त हो जाने के बावजूद उन्हें कभी किसी पड़ोसी से भी कोई मदद नहीं मिली। हमारे देश की कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहां तक शासन-प्रशासन और सरकार के मानवीय सरोकारों की बात है, बगल में देश की राजधानी है लेकिन आधुनिक सुविधाओं से लैस नोएडा में ऐसे बेसाहारा वरिष्ठ नागरिकों के रहने-खाने, देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं है। महानगर के सेक्टर-62 में प्राधिकरण ने 'दादा-दादी' पार्क जरूर बनवा रखा है, वह खुद ही लावारिस पड़ा है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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