हैरत में डाल देती हैं कंप्यूटर से भी फास्ट पंजाब की 'गूगल बेबे' 

 चौथी कक्षा तक पढ़ीं पंजाब की कुलवंत कौर हैं "गूगल बेबे" 

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आगरा में मात्र चौथी कक्षा तक पढ़ीं पंजाब की कुलवंत कौर अपनी हाजिर जवाबी और गजब की याद्दाश्त से अपने जिले की बड़ी हस्तियों में शुमार हो चुकी हैं। वहां के लोग अब उनको इसलिए 'गूगल बेबे' कहने लगे हैं क्योंकि वह खुद को कंप्यूटर से भी फास्ट साबित कर चुकी हैं। पिछले दिनो जब पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के विद्वानों ने बेबे से एक-एक कर छह सवाल पूछे और बेबे उनके झटपट जवाब देती चली गईं तो उन्होंने भी हैरत से दांतों तले अंगुलियां दबा लीं।

गूगल बेबे
गूगल बेबे
मानव मस्तिष्क न केवल शरीर का सबसे जटिल अंग है, बल्कि यह इस दुनिया की भी सबसे जटिल मशीन है। इंसान की सबसे खराब आदतों में एक है, बातें भूल जाने की आदत। यदि किसी छात्र में यह खराब आदत हो, उसका तो पूरा भविष्य ही दांव पर लग जाता है।

फतेहगढ़ साहिब (पंजाब) के गांव मनैला की कुलवंत कौर को वहां के लोग अब 'गूगल बेबे' कह कर पुकारने लगे हैं। जिस तरह गूगल सर्च इंजन की रफ्तार, उससे भी फास्ट गूगल बेबे की स्पीड। अब तक 'गूगल ब्वॉय' सुने-पढ़े जाते रहे हैं, अब गूगल बेबे भी सुर्खियों में आ गई हैं। अपने सामने वाले के हर सवाल का झटपट जवाब। अपनी हाजिर जवाबी से बड़े-बड़ों को हैरत में डाल देने वाली पचपन वर्षीय बेबे अब तो अपने जिले की हस्तियों में शुमार हो चुकी हैं। एक बार जो किताब उनकी नजर से गुजर जाए, उसकी बारीक से बारीक बातें भी बेबे के दिमाग में हमेशा के लिए बैठ जाती हैं।

दो-ढाई दशक के दौरान बेबे डिस्कवरी ऑफ इंडिया, हिस्ट्री ऑफ इंडिया, डिस्कवरी ऑफ पंजाब, हिस्ट्री ऑफ पंजाब के अलावा अनेक धर्मग्रंथों का अध्ययन कर चुकी हैं। बेबे के घर में खुद की एक छोटी सी लाइब्रेरी भी है, जिसमें उपरोक्त ग्रंथों के अलावा पत्रकार खुशवंत सिंह, पत्रकार कुलदीप नैय्यर, बाबा बंदा सिंह बहादुर आदि की पुस्तकों के साथ ही सिख धर्म के भी कई एक धर्मग्रंथ सहेजे गए हैं। हम आए दिन याद्दाश्त तेज करने के नुस्खे, जानकारियां पढ़ते, सुनते रहते हैं, अनेक कुशाग्र प्रतिभाएं पहले भी प्रकाश में आती रही हैं, साइंस के ऐसे शोध भी आ चुके हैं कि अच्छी और गहरी दोस्ती याददाश्त तेज कर मस्तिष्क की क्षमता बढ़ा देती है, 80 वर्ष या उससे अधिक के उम्रदराज प्रबंधकों, जिनके पास अच्छे दोस्त होते हैं, उनकी संज्ञानात्मक क्षमता 50 या 60 साल के लोगों के समान होती है, साथ ही उनकी यह क्षमता उनके उन हमउम्र प्रबंधकों की तुलना में भी बेहतर होती है जिनके पास अच्छे दोस्त नहीं होते हैं, ऐसा भी बताया जाता है कि गहरी नींद लेने वालों का दिमाग दूसरे लोगों से तेज होता है लेकिन बेबे के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। आज के तेज रफ्तार जमाने में कंप्यूटर की स्पीड फेल कर देने वाली मेमोरी तो किसी को भी अचंभित किए बिना नहीं रह सकती है। उसी अचंभे का सबब बन चुकी हैं कुलवंत कौर उर्फ गूगल बेबे।

लाहौर (पाकिस्तान) में जन्मे बेबे के पिता इंजीनियर प्रीतम सिंह जब अपने काम के सिलसिले में आगरा आए तो वहीं इस मामूली माली हालत वाले परिवार में बिटिया कुलवंत कौर की पैदाइश हुई। चौथी क्लास तक आगरा में ही उनकी पढ़ाई लिखाई हुई। घरेलू परिस्थितियों ने उनकी आगे की पढ़ाई रोक दी। आगरा के दिनो को याद करती हुई बेबे बताती हैं कि बचपन में जब उनके घर कपड़ा व्यवसायी रामलाल 'डग्गी वाले' आया करते तो वह उनके पिता के साथ घंटों विभिन्न धर्मों के बारे में बातें किया करते। हम सभी भाई-बहन डग्गी वाले को घेरकर बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनते रहते थे। वही से उनके दिल-दिमाग पर धर्म-कर्म की बातों और किताबी दुनिया के संस्कार बने। कुछ और बड़ी हो जाने पर उन्हें किताबें पढ़ने का हर वक्त जुनून सा रहने लगा। पढ़ते-पढ़ते उन्हें कुछ वक्त बाद पता चला कि सिर्फ एक-एक मर्तबा पढ़े गए समस्त पाठ उन्हें तो कंठस्थ हो चुके हैं।

बेबे पंजाबी यूनिवर्सिटी के धर्म अध्ययन विभाग में दाखिला लेकर धर्म पर पीएचडी करना चाहती हैं। हाल ही में बाबा बंदा सिंह बहादुर इंटरनेशनल फाउंडेशन (लुधियाना) में एक समारोह में अंतरराष्ट्रीय समाज सेवी एसपी सिंह ओबरॉय की बेबे पर नजर पड़ी। कार्यक्रम के बाद ओबरॉय ने उनके घर जाकर आर्थिक मदद के रूप में उनकी प्रतिमाह तीन हजार रुपए पेंशन मोकर्रर की। साथ ही उनके मोबाइल पर पंजाबी यूनिवर्सिटी (पटियाला) के अधिकारियों से बेबे की बात कराई तो एक-एक कर उनके आधा दर्जन प्रश्नों का बेबे झटपट जवाब देती चली गईं। बेबे की इस कुशाग्रता और याद्दाश्त से यूनिवर्सिटी के कई एक विद्वान भी हैरत से दांतों तले अंगुलियां दबा चुके हैं।

मानव मस्तिष्क न केवल शरीर का सबसे जटिल अंग है, बल्कि यह इस दुनिया की भी सबसे जटिल मशीन है। इंसान की सबसे खराब आदतों में एक है, बातें भूल जाने की आदत। यदि किसी छात्र में यह खराब आदत हो, उसका तो पूरा भविष्य ही दांव पर लग जाता है। व्यवसायी में भूलने की आदत हो तो पूरा धंधा ही बैठ जाए। याद्दाश्त कमजोर होने के कारण कई बार व्यक्ति को बड़ी कीमत चुकानी पड़ जाती है। आजकल बाजार में स्मरण शक्ति तेज करने के तरह-तरह के प्रॉडक्ट छाए हुए हैं लेकिन गजब की स्मरण शक्ति की धनी बेबे से ऐसी तमाम जानकारियां बात-बात में मिल जाती हैं कि कब, किस तरह, किस-किसने हिंदुस्तान पर हमला किया, हारा-जीता, राज-पाठ किया।

यहूदी, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, हिंदू, सिख धर्म गुरुओं, उनके माता-पिता, उनकी शिक्षाओं, वाणियों, उपदेशों आदि की बेबे की जुबान पर मानो हर वक्त टिप्स तैयार रहती है। सवाल करते ही बेबे बताने लगती हैं कि भारत में आर्य कब आए, हिंदुस्तान पर किस वक्त पहला हमला मोहम्मद बिन काजम ने किया था। इसके अलावा हमारे देश पर सत्रह हमले करने वाला महमूद गजनवी, धर्मस्थलों को क्षतिग्रस्त करने वाला अलाउद्दीन खिलजी, यूनान के सिकंदर पोरस के हमले रोकने वाले चंद्रगुप्त मौर्य, बौद्ध अनुयायी बन गए अशोक सम्राट, महाराजा रणजीत सिंह, जस्सा सिंह रामगढ़िया, जस्सा सिंह आहलूवालिया, राजा-महाराजा आदि की विस्तृत जानकारियां उनके मस्तिष्क में हर वक्त तरोताजा रहती हैं। किसी भी वक्त कोई भी व्यक्ति इस सम्बंध में उनसे जुबानी पूरी जानकारी प्राप्त कर सकता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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