अवॉर्ड ठुकराने वाली महिला IPS डी रूपा

लेडी आइपीएस डी रूपा ने ठुकराया भाजपा पोषित एनजीओ अवॉर्ड 

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होम गार्ड एंड सिविल डिफेन्स, बेंगलुरू की मौजूदा पुलिस महानिरीक्षक डी रूपा कहती हैं- कोई लोकसेवक अपनी जिम्मेदारियों में तभी निष्पक्ष रह सकता है, जबकि वह राजनीति-पोषित संस्थाओं, संगठनों से भी उसी तरह समान दूरी बनाए रखे, जैसेकि अन्य किसी गलत काम से। उन्होंने भाजपा सांसद से पोषित 'नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन' का अवॉर्ड ठुकरा दिया है।

आईपीएस डी रूपा, फोटो साभार: सोशल मीडिया
आईपीएस डी रूपा, फोटो साभार: सोशल मीडिया
सन् 2000 बैच की आईपीएस डी रूपा 2004 में प्रोबेशन ख़त्म होने के बाद से ही सुर्खियों में हैं। तब उन्हें कर्नाटक धारवाड़ की यात्रा पर आईं मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। तभी से उनकी गिनती पुलिस विभाग के सख्त अधिकारियों में होने लगी।

सबसे धारदार होता है ईमानदारी का शस्त्र, जो देर से ही सही, यश-प्रतिष्ठा तो दिलाता ही है, जीवन में आत्मरक्षा के नए-नए ओर-छोर भी विकिसत करता रहता है। पहले एक निर्भीक महिला आइपीएस डी रूपा का एक पत्र पढ़िए, फिर जानते हैं उनकी ईमानदार कोशिशों का एक और अध्याय। होम गार्ड एंड सिविल डिफेन्स, बेंगलुरू की मौजूदा पुलिस महानिरीक्षक डी रूपा 'नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन' अवॉर्ड लेने का आमंत्रण ठुकराती हुई संस्था के अध्यक्ष को पत्र लिखती हैं - हर सरकारी कर्मचारी से अपेक्षा की जाती है कि वह तटस्थ रहे। जिन संस्थाओं के थोड़े से भी राजनीतिक ताल्लुकात हैं, उनसे समान दूरी बनाए रखने के साथ ही उनके प्रति तटस्थ भी रहना चाहिए। केवल ऐसी स्थिति में ही लोक सेवक लोगों की नजरों में अपनी स्पष्ट और निष्पक्ष छवि बनाए रख सकते हैं।

आगामी चुनावों के मद्देनजर यह अब और अधिक प्रासंगिक हो गया है। इसलिए उनका विवेक बड़ा कैश रिवार्ड वाले इस इनाम को स्वीकार करने की उन्हें इजाजत नहीं देता है। यहां उल्लेखनीय है कि 'नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन' भाजपा के राज्यसभा सदस्य राजीव चंद्रशेखर से वित्त पोषित बताया जाता है। आइपीएस डी रूपा पहली बार उस वक्त नेशनल मीडिया की सुर्खियों में आई थीं, जब वह बेंगलुरू सेंट्रल जेल में अन्नाद्रमुक नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता की क़रीबी रहीं वीके शशिकला के लिए स्पेशल किचन के कथित इंतजाम के लिए अपने बॉस से सार्वजनिक तौर पर उलझ गई थीं। उस वक्त रूपा से जेल विभाग के डिप्टी आईजी की जिम्मेदारी लेकर उन्हें ट्रैफिक और रोड सेफ्टी विभाग में कमिश्नर का चार्ज दे दिया गया था। 

इसके साथ ही उनके बॉस एचएन सत्यनारायण राव की भी डीजीपी (जेल) पद से छुट्टी कर दी गई थी। रूपा ऐसा मानती हैं कि नौकरशाही के राजनीतीकरण से लंबे अर्से में सिस्टम और समाज का भला नहीं होने वाला है। रूपा के अंतरविभागीय मुकाबलों को देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी भी सराहती हैं।

वैसे तो सन् 2000 बैच की आईपीएस डी रूपा 2004 में प्रोबेशन ख़त्म होने के बाद से ही सुर्खियों में हैं। तब उन्हें कर्नाटक धारवाड़ की यात्रा पर आईं मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह मामला सन् 1994 में हुबली ईदगाह मैदान में तिरंगा फहराने से जुड़ा था। उमा भारती जिस ट्रेन से कर्नाटक में दाखिल होने वाली थीं, रूपा उस ट्रेन में गोवा के लोंडा में ही सवार हो गईं। रूपा की उमा भारती से हुई बातचीत उस समय चैनलों पर भी लाइव हो गई थी। तभी से उनकी गिनती पुलिस विभाग के सख्त अधिकारियों में होने लगी। कर्नाटक के ही दावनगेरे की रूपा सिटी आर्म्ड रिज़र्व में पोस्टिंग से पहले प्रदेश के कई अन्य ज़िलो में भी पुलिस की कमान संभाल चुकी थीं। उसके बाद उन्होंने आला अधिकारियों और नेताओं को आवंटित अतिरिक्त सरकारी गाड़ियों के मामले में भी हस्तक्षेप किया।

हमारे देश में डी रूपा ही नहीं, कई एक ऐसी महिला आइपीएस हैं, जिन्होंने अपनी ईमानदार कार्यप्रणाली के आगे बड़े-बड़े सियासतदां को तो मुंह की खाने के लिए विवश किया ही है, वह अपने विभाग के आला अधिकारियों की भी एक नहीं सुनती हैं। डी रूपा के अवॉर्ड ठुकराने के निर्णय ने निश्चित ही इंडियन ब्यूरोक्रेसी में व्याप्त स्वेच्छाचारिता और सत्तापरस्ती के स्वभाव को एक और सबक की तरह किंचित विचलित किया है। उन्होंने राज्य के शीर्ष पद पर आसीन रहते हुए एक आईपीएस के रूप में गैर सरकारी संस्था से अवार्ड लेने से इनकार कर बेबाक तटस्थता का परिचय ही नहीं दिया है, यह उन अफसरों के लिए भी एक बड़ी सीख है, जो चाहे किसी को भी राजकीय पुरस्कारों से नवाजने का निर्णय देकर उसके महत्व को नीचे गिराते रहते हैं। इसीलिए डी रूपा 'नम्मा बेंगलुरू फाउंडेशन' के अध्यक्ष को लिखे पत्र में यह याद दिलाना भी नहीं भूलती हैं कि अर्ध-राजनीतिक और संघों से ताल्लुक रखने वाली संस्थाओं से हमारे जैसे अधिकारियों को क्यों दूर रहना जरूरी है। वह इस ओर भी ध्यान आकर्षित करती हैं कि चूंकि निकट भविष्य में राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए वह ऐसी संस्थाओं के किसी भी तरह के सम्मान से दूर रहना चाहेंगी, जिनकी निष्ठा-नाता किसी राजनेता या पार्टी से है। इसीलिए बीजेपी सांसद से पोषित एनजीओ की ओर से मिले अवॉर्ड के ऑफर में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। जो आइपीएस महिला प्रदेश में सत्ता के शीर्ष पर बैठी जयललिता जैसी अमोघ हस्ती से जुड़े मामले में झुकने को तैयार न हो, भला उसे और कौन झुका सकता है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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