'जीनियस बाई बर्थ..इडियट बाई च्वाइस',एक इंजीनियर अपना करिअर छोड़ पूरा कर रही हैं ग़रीब बच्चों की इच्छाएं

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हर इंसान की अपनी जरूरतें, इच्छाएं और सपने होते हैं, जिसे वह पूरा और हासिल करना चाहता है। अपने सपनों को वह जीता है। उसके लिए संघर्ष करता है, और उसे अपने दिल-ओ-दिमाग में तबतक संजोए रखता है, जबतक वह पूरा न हो जाए। सपने देखना जहां एक बेहद निजी मामला है, पर कई बार इंसान इच्छाएं उसकी भी पूरी करता है, जो उसका कोई अज़ीज़ हो या दिल के बेहद करीब हो। लेकिन अगर दूसरों की जरूरतों, इच्छाओं और सपानों को पूरा कर उसके चेहरे पर खुशी लाना और उस एहसास को जीना ही किसी का ख़्वाब और पैशन हो, उसे आप क्या कहेंगे? वह भी उस उम्र में जब नौजवानों की हसरतें खुले आसमान में कुलांचें मारने को बेताब होती है। झटपट सबकुछ पा लेने, सबसे आगे निकल जाने की आपाधापी और बुलंदियों पर जाने की जिद्द होती है। लेकिन इन सबसे अलग, इन सबसे जुदा भोपाल की एक लड़की है। बिलकुल अपने तरह की। मन की करती है। मन की सुनती है। चाहे दुनिया जो कहे, जो सोचे। हम बात कर रहे हैं 24 वर्षीय उस युवा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर और ट्रेवल ब्लॉगर निकिता कोठारी की जिन्होंने जेनेटिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद इस क्षेत्र में एक पेशेवर करिअर की राह चुनने के बजाए फोटोग्राफी, लेखन और समाज सेवा का रास्ता चुना है। वह खूब लिखती हैं, घूमती-फिरती हैं और कुदरत के इस हसीन दुनियां के खास नज़ारों को अपने कैमरे में कैद करती है। उसे अपने से ज्यादा फिक्र है, उनकी जो गरीब है, वंचित और अभावग्रस्त हैं। आधुनिक समाज के बीच रहकर भी वह सुख-सुविधाओं से दूर है। जिनकी इच्छाएं, जरूरतें और सपने कभी पूरे नहीं हो पाते। उन्हें किसी की मदद नहीं मिलती। किसी का प्यार नहीं मिलता। उनकी बेहद जरूरत होने के बावजूद भी सुविधा संपन्न तबका उसे अपना नहीं बनाता, गले नहीं लगाता। लेकिन अब उन्हें निकिता कोठारी के रूप में एक हमदर्द मिल गया है, जो न सिर्फ ऐसे लोगों को समझती हैं, उनसे प्यार करती है बल्कि उसे अपना भी मानती है। उनकी खुशी के लिए काम करती है। निकिता के इस ईमानदार प्रयासों से एक तरफ जहां कुछ बच्चों के सपने हकीकत में बदल रहे हैं, वहीं समाज निकिता के इस साकारात्मक पहल को आशा भरी निगाहों से देख रहा है।


...ताकि सबके सपने साकार हों 

निकिता ने एक प्रोजेक्ट किया, जिसके तहत वह ऐसे गरीब और वचिंत तबके के बच्चों के उन छोटे-छाटे सपनों, जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करती हें जिसे अकसर आर्थिक या अन्य सामाजिक बाधाओं के कारण उनके अभिभावकों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस प्रोजेक्ट के तहत वह सरकारी या गैर सरकारी संगठनों द्वारा संचालित वैसे स्कूलों को टार्गेट करती हैं, जहां वंचित तबके के बच्चे पढ़ाई करते हैं। बच्चों को एक सफेद कागज देकर उनसे कहा जाता है कि वह कागज पर अपनी वैसी छोटी-छोटी इच्छाएं और जरूरतें लिखे जिसे वह हासिल करना चाहते हैं। बच्चों की इच्छाएं लेने के बाद उसे पूरा किया जाता है। बच्चों की वैसी ही इच्छाएं पूरी की जाती है, जो एक छोटे रकम से पूरी हो सकती हो। हाल ही में परवरिश नाम की एक संस्था द्वारा संचालित बच्चों ने अपनी तरह-तरह की इच्छाएं व्यक्त की। किसी को स्कूल जाने के लिए साइकिल की इच्छा थी, तो किसी को जीवन के हर रंग को कैमरे में कैद करने की तमन्ना। किसी ने डांस सीखना चाहा, तो किसी ने मंच पर अभिनय करना। कोई अपने घर के पास के बड़े स्कूल में पढ़ना चाहता है। किसी को कंप्यूटर चाहिए, किसी को वीडियो गेम। कोई अपने फटे कपड़े और जूते बदलना चाहता था तो किसी की जरूरत सिर्फ एक नए मोजे तक महदूद थी। इसी तरह बच्चों ने बैग, रिस्ट वाच, घुंघरू, पायल, चूड़ियां, किताबें और खिलौनों की इच्छाएं जाहिर की थी। ये बच्चे शहर के उन तमाम झुग्गी-झोंपड़ी में रहते हैं, जिनके माता-पिता उनकी इच्छाएं तो दूर उनकी जरूरते ही बड़ी मुश्किल से पूरी कर पाते हैं। निकिता ऐसे तमाम बच्चों की छोटी-मोटी ख्वाहिशों को पूरी करती है। वह अकसर उन बच्चों के साथ वक्त गुजारती है और उन्हें समझने की कोशिश करती हैं।


विश ग्रांटर करते हैं इच्छाएं पूरी

बुनियादी जरूरतों और इच्छाओं से महरूम ऐसे बच्चों की इच्छाएं पूरी करने के लिए कुछ लोगों का समूह है जो उन्हें पैसे या इच्छित वस्तुएं उपलब्ध कराते हैं। निकिता कोठारी वैश्विक संस्था वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम के सहयोगी संगठन वर्ल्ड शेपर्स कम्युनिटी से जुड़ी हैं। ये एक वैश्विक संस्था है, और दुनिया भर के वैसे युवाओं को आपस में जोड़ने का काम करती है, जिनमें नेतृत्व क्षमता और समाज को बदलने का कौशल और माद्दा हो। युवाओं को आपस में जोड़कर स्थानीय स्तर पर भी ये संस्था काम करती है। निकिता गलोबल शेपर्स कम्युनिटी के भोपाल हब की सदस्य हैं। इस संस्था से जुड़े अन्य लोग उनके समाजिक कार्यों में मदद करते हैं। बच्चों की विश लेने के बाद ये लोग उसे सोशल नेटवर्क साइट्स और ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के साइट पर शेयर कर देते हैं। यहां बच्चों के लिए सामान डोनेट करने की इच्छा रखने वाले लोग सामान उपलब्ध करा देते हैं। कई लोग ई-कामर्स मार्केटिंग के जरिए सीधे तौर पर सामान भेज देते हैं, तो कुछ लोग पैसे भेजते हैं। निकिता अब एक ऐसा फोरम बनाना चाहती है, जहां अमीर और सक्षम लोग अपने बच्चों के पुराने खिलौनों, किताब-कापियों, कपड़ों या जरूरत की अन्य चीजों को दान कर सकेंगे या उन्हें आधी कीमतों पर बेच सकेंगे। ऐसे में उन वंचित बच्चों की जरूरतें आसानी से पूरी की जा सकेगी, जिनके पास नए सामान खरदीने के पैसे नहीं है।


असमानता मिटाना है लक्ष्य

निकिता कहती हैं, 

"हमारा लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाना है, जहां कोई असमानता नहीं हो। किसी तरह का भेदभाव नहीं हो। बच्चों के बीच गरीब-अमीर का कोई फर्क़ न हो। गरीब बच्चों की भी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें भी जिंदगी में आगे बढ़ने का मौका और समान अवसर मिल सके। वह अपने आप को उपेक्षित महसूस न करें। ये जिम्मेदारी हम सब की होनी चाहिए।"

निकिता कहती है कि कोई जरूरी नहीं कि हम पैसे या सामान से ही ऐसे बच्चों की मदद करें। हमें अगर कोई स्किल कोई काम आता हो तो हम उसे ऐसे बच्चों को सिखा सकते हैं। उन्हें उस चीज़ की ट्रेनिंग दे सकते हैं, जो उसके भविष्य में काम आए। समाज का अगर प्रत्येक संपन्न आदमी अपने आसपास के किसी एक गरीब बच्चे की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी ले ले तो ऐसे में एक दिन पूरा समाज बदल जाएगा।


अपने ही घर में मिली प्रेरणा

निकिता को सोशल वर्क करने और दूसरों के दर्द को समझने की प्रेरणा खुद के घर में मिली है। उनके पिता एक कारोबारी हैं, जिनके कारखाने में कई मजदूर काम करते हैं। पिता और गृहणी मां का मजूदरों के प्रति रवैया निहायत ही उदार है। वह दोनों अकसर अपने कर्मचारियों की समस्याएं सुनते हैं और उसका निदान करने की कोशिश करते हैं। कर्मचारियों के घर परिवार और बच्चों तक की जरूरतों का ख्याल रखते हैं। निकिता अपने ही घर में काम करने वाली बाई, ड्राइवर और कारखाने के मजूदारों की समस्याएं देखा करती थीं। यहीं से उनके प्रति निकिता के अंदर हमदर्दी पैदा हुई और जब उन्हे मौका मिला तो उन्होंने उनके बच्चों की जिंदगी बेहतर करने की कोशिश शुरू कर दी।


जीनियस बाई बर्थ ... इडियट बाई च्वाईस

निकिता चेन्नई के एसआरएम यूनिवर्सिटी से जेनेटिक इंजिनीयरिंग में फस्ट क्लास डिस्टिंक्शन से ग्रेजुएट हैं। उन्होंने पहले ही प्रयास में गेट और आइसीएआर की परीक्षाएं पास की। निकिता मास कम्यूनिकेशन में गोल्ड मेडलिस्ट पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं। उनके पास नौकरी के आलावा आगे की पढ़ाई का भी शानदार ऑफर था। लेकिन निकिता ने इंजीनियरिंग के बजाए अपना अलग करिअर चुना। निकिता कहती हैं,  

"भारत में सफल छात्र उसी को माना जाता है, जिसने आईआईटी या आईआईएम की परीक्षा पास कर ली हो, कैंपस प्लेसमेंट में सालाना मोटी पगार की नौकरी पायी हो या फिर विदेश पढ़ाई करने गया हो। कुछ लोग पीएचडी को भी सफलता के पैमाने पर मापते हैं।" 

लेकिन निकिता ने थ्री इडियट फिल्म के पात्र फरहान कुरैशी का रास्ता अख्तियार किया, जिसने सिर्फ अपने मन की बात सुनी। जिंदगी में सिर्फ वही किया जिसे वह दिल से करना चाहती थीं, चाहे उसके फैसले के खिलाफ कितनी ही ऊंगलिया उठी हो। निकिता मजाकिया लहजे में कहती हैं, 

"मैं पैदा तो हुई थी जीनियस लेकिन इडियट रहने का फैसला मेरा अपना है, और अपने फैसले से मुझे बेहद प्यार है।" 

निकिता एक सफल वाइल्ड फोटोग्राफर, ट्रेवलॉग राइटर, फ्रीलांस रिर्सचर और सोशल वर्कर हैं। शुरूआत में उन्हें भी घर वालों, दोस्तों और रिश्तेदारों से इंजीनियरिंग छोड़ कर एक ऑड किस्म का करिअर अपनाने के लिए काफी विरोध का सामना करना पड़ा था, लेकिन आज वही लोग उनके काम की प्रशंसा करते हैं।


लेखक मीडिया शिक्षक, शोधार्थी और पत्रकार हैं। दिल्ली और एनसीआर के लगभग आधे दर्जन अखबारों में रिपोटिंग करने के बाद वर्तमान में दूरदर्शन भोपाल में आ. सहायक समाचार संपादक हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं और योरस्टोरी. कॉम से भी जुड़े हैं।

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