फर्जी मुठभेड़ का शोर: मानवाधिकार की चीख या पुलिस एनकाउंटरों पर लगाम लगाने की कवायद 

देश भर में हो रहे फर्जी एनकाउंटर्स पर एक विशेष रिपोर्ट...

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उत्तर प्रदेश में अनवरत होते पुलिस एनकाउंटरों के दरम्यान फर्जी मुठभेड़ों के आर्तनाद ने पुलिसिया कार्यवाइयों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वैसे भी पुलिस और फर्जी मुठभेड़ का चोली-दामन का साथ रहा है। इनाम और समय पूर्व प्रोन्नति के चक्कर में आनन-फानन में मुठभेड़ों को गैर जिम्मेदाराना अंदाज में अंजाम दिये जाने की सैकड़ों दास्ताने पुलिस फाइलों में दर्ज हैं। पूर्व में भी फर्जी मुठभेड़ों की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं। आज फिर उ.प्र. पुलिस के दामन पर फर्जी मुठभेड़ों के अनचाहे दाग दिखाई पड़ रहे हैं। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीते एक साल में 1,200 से ज्यादा एनकाउंटर्स में 40 कथित अपराधियों को मार गिराया है। इसी दौरान 247 कथित अपराधी घायल भी हुए।

सांकेतिक  तस्वीर
सांकेतिक  तस्वीर
राज्य मानवाधिकार आयोग को मिली शिकायतों का आंकड़ा देखें, तो एक अप्रैल 2017 से लेकर 30 नवम्बर 2017 के बीच मानवाधिकार उल्लंघन की कुल 22,655 शिकायतों में से 12,771 शिकायतें पुलिस के खिलाफ थीं। 

उत्तर प्रदेश में अनवरत होते पुलिस एनकाउंटरों के दरम्यान फर्जी मुठभेड़ों के आर्तनाद ने पुलिसिया कार्यवाइयों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। वैसे भी पुलिस और फर्जी मुठभेड़ का चोली-दामन का साथ रहा है। इनाम और समय पूर्व प्रोन्नति के चक्कर में आनन-फानन में मुठभेड़ों को गैर जिम्मेदाराना अंदाज में अंजाम दिये जाने की सैकड़ों दास्ताने पुलिस फाइलों में दर्ज हैं। पूर्व में भी फर्जी मुठभेड़ों की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं। आज फिर उ.प्र. पुलिस के दामन पर फर्जी मुठभेड़ों के अनचाहे दाग दिखाई पड़ रहे हैं। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीते एक साल में 1,200 से ज्यादा एनकाउंटर्स में 40 कथित अपराधियों को मार गिराया है। इसी दौरान 247 कथित अपराधी घायल भी हुए। लेकिन एनकाउंटर्स की वर्तमान श्रंखला में यूपी पुलिस पर कई बार फर्जी एनकाउंटर का आरोप भी लगाया जा चुका है। नोएडा में हुए फर्जी एनकाउंटर ने आम लोगों के मन में पुलिस के प्रति दहशत पैदा कर दिया है। आपको याद होगा कि बीते तीन फरवरी की रात को एक जिम ट्रेनर और उसके साथी को एक प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर ने गोली मार दी थी। फिर उक्त घटना को फर्जी मुठभेड़ का रूप दे दिया गया। यह वाकया पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अनेक मामलों में तो मानवाधिकार आयोग से नोटिस भी आ चुकी है। गाहे-बगाहे फर्जी मुठभेड़ मामले पर शीर्ष अदालत भी वर्दी में अपराधियों जैसा व्यवहार करने का आरोप लगाकर सख्त सजा देने की वकालत कर चुकी है। हाल की कई घटनाओं से पुलिस महकमे की कार्यशैली पर गहरे सवाल खड़े हुए हैं।

यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह कहते हैं कि करीब एक हजार मुठभेड़ की घटनाओं में तीस-पैंतीस अपराधियों का और दो-चार पुलिसकर्मियों का मारा जाना कोई ऐसा नहीं है कि पुलिस बेलगाम हो गई है। हां, फर्जी एनकाउंटर जरूर चिंता बढ़ाने वाले हैं और पुलिस को उनसे हरसंभव बचने की कोशिश करनी चाहिए। हालांकि प्रकाश सिंह इस बात को स्वीकार करते हैं कि जब एनकाउंटर की घटनाएं बढ़ेंगी तो उनमें फर्जी होने की आशंकाएं भी बढ़ेंगी लेकिन केवल मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को कानून का डर न हो, ये भी ठीक नहीं है।

दीगर है कि पुलिस एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि हर एनकाउंटर की तुरंत एफआईआर दर्ज हो, जब तक जांच चलेगी, तब तक संबंधित पुलिस अधिकारी को प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड नहीं मिलेगा। पुलिस मुठभेड़ के मामले में एफआईआर दर्ज कर इसे तत्काल मजिस्ट्रेट को भेजना होगा। अगर पीडि़त पक्ष को लगता है कि एनकाउंटर फर्जी था तो वह सेशन कोर्ट में केस दर्ज करा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ों पर व्यापक गाइडलाइंस जारी की है जिन्हें सेक्शन 144 के तहत एक कानून माना जाएगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें अदालती निर्देश के पालन में कितनी तत्परता और ईमानदारी दिखाती हैं। वैसे आज देश भर में एक फर्जी एनकाउंटर को लेकर बहस चल रही है। लेकिन इस बहस की आड़ में नेता अपना राजनीतिक हित साध रहे हैं, उनकी मंशा को देखकर यही अंदाजा लग रहा है कि वो खुद ही नहीं चाहते कि इस तरह के प्रायोजित एनकाउंटर बंद हों। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक 2002 से 08 के बीच देश भर में कथित फर्जी मुठभेड़ों की 440 घटनाएं दर्ज की गईं थीं, जबकि 2009-10 से फरवरी 2013 के बीच संदिग्ध फर्जी मुठभेड़ों के 555 मामले दर्ज किए गए। अब, सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी दिशा-निर्देशों से इस मामले में कायम अनिश्चितता और संदेह दूर करने में आसानी होगी।

राज्य मानवाधिकार आयोग को मिली शिकायतों का आंकड़ा देखें, तो एक अप्रैल 2017 से लेकर 30 नवम्बर 2017 के बीच मानवाधिकार उल्लंघन की कुल 22,655 शिकायतों में से 12,771 शिकायतें पुलिस के खिलाफ थीं। इन शिकायतों में एनकाउंटर के नाम पर हत्या, पुलिस हिरासत में मौत, बिना एफआईआर थाने में बैठाने, पूछताछ के नाम पर हिरासत में लेने, जांच के नाम पर उत्पीडऩ करने जैसी शिकायतें शामिल हैं। दूसरे नंबर पर शिकायतों में जमीन और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े मामले हैं। वैसे फर्जी मुठभेड़ तो राजनीतिक संस्कृति हो गयी है। बंगाल ने सत्तर के दशक में तो पंजाब ने अस्सी के दशक में इसका व्यापक इस्तेमाल देखा। उत्तर प्रदेश में ऐसे सैकड़ों मामले हैं, जिसकी जनसुनवाई मानवाधिकार जन निगरानी समिति के तत्वावधान में जस्टिस सच्चर के नेतृत्व में हुयी और वह रपट भी आ चुकी है। पुलिस हिरासत और जेल में जो होता है, उसके लिये एक दर्दनाक उदाहरण सोनी सोरी हैं। गुजरात, मुंबई, कश्मीर, मणिपुर से लेकर तमिलनाडु तक सर्वव्यापी राजनीतिक भूगोल है फर्जी मुठभेड़ों का, जिसकी सीधे तौर पर राजनीतिक वजहें हैं और राजनेताओं के इशारे पर ही इन काण्डों को अंजाम दिया जाता है।

पुलिस की तानाशाही व्यवस्था और सरकार को गुमराह करने वाली पुलिसिया नीति आखिर कहीं-न-कहीं बहुत से ऐसे कार्यों को अंजाम देती है, जिससे न्यायिक व्यवस्था शर्मशार जरूर होती होगी। इसी पुलिसिया नीति ने बहुत-सी फर्जी मुठभेड़ों को भी अंजाम दिया है। तकरीबन पंद्रह वर्ष पहले यूपी पुलिस ने भदोही में चार लोगों को मुठभेड़ में मार डाला और दावा किया कि इनमें से एक इनामी अपराधी है। इस दावे की असलियत कुछ वक्त बाद तब खुली जब उक्त इनामी आरोपी ने समर्पण किया, तत्पश्चात वह पहले विधायक और फिर सांसद तक बना।

प्रमाणित है कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में जिन लोगों को मारा, वे निर्दोष थे। इसी तरह कुछ साल पहले राजधानी दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में पुलिस ने दो व्यापारियों को दुर्दात अपराधी बताकर शूटआउट में मार डाला। ऐसे और तमाम वाकये समय-समय पर होते रहे हैं। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे में जरूरी है कि पुलिस सुधार की प्रक्रिया को तत्काल आरंभ किया जाए। पुलिस को सियासी शिकंजे से बाहर निकालने, उसकी जवाबदेही तय करने और सबसे बढ़कर कानून-व्यवस्था व जांच की विंग को विभाजित करने की तत्काल आवश्यकता है। अन्यथा पुलिस इसी तरह बेगुनाहों का शिकार करती रहेगी, तमंचा बरामद करके और 'चोरी की नीयत से छुपे लोगों को गिरफ्तार करके अपनी पीठ थपथपाती रहेगी। इसके साथ ही उन कठिनाइयों को दूर करने की जरूरत है जिनके मध्य हमारे पुलिसकर्मी काम कर रहे हैं। उनकी जायज जरूरतों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए और उनके काम के घंटे तय होने चाहिए। यह सब सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित पुलिस सुधार को लागू करके किया जा सकता है।

पुलिस द्वारा सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए जाने वाले ऐसे हत्याकांड लोकतंत्र पर प्राणघातक हमला होते हैं, समाज में पुलिस का खौफ बढ़ाते हैं और न्याय की आत्मा पर भी प्रहार करते हैं, फिर भी सच यही है कि देश में आए दिन फर्जी मुठभेड़ें होती रहती हैं। वैसे तो देश में बहुत सारी फर्जी मुठभेड़ हुई हैं, जिनमें बाटला हाउस, इशरत जहां इन्काउण्टर, सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़, रणवीर फर्जी मुठभेड़ उल्लेखनीय है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार विगत 17 वर्षों में कुल 1224 फर्जी मुठभेड़ हुई हैं। इनमें सबसे ऊपर उत्तर प्रदेश, फिर बिहार, आंध्र प्रदेश और उसके बाद महराष्ट्र तथा सबसे नीचे गुजरात है।

मुठभेड़ों के इतिहास पर गौर करें तो इसका चलन सन साठ के दशक में शुरू हुआ था। तब पुलिस की डाकुओं से बीहड़ों में सीधी मुठभेड़ हुआ करती थी और राज्य सरकारें अपने बहादुर पुलिसकर्मियों की हौसलाफजाई एवं उन्हें सम्मानित करने के लिए नगद राशि और समय से पहले पदोन्नति दिया करती थीं। लेकिन बीते दो दशकों में फर्जी मुठभेड़ों की संख्या जिस तरह से बढ़ी है, वह चिंतित करने वाली है और मानवाधिकार की निगरानी करने वाली संस्थाओं की कार्यशैली पर सवाल खड़ी करती है। ऐसी बहुत सारी मुठभेड़े हैं जिन्हें फर्जी माना जा चुका है और कुछ मामलों की जांच चल रही है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) का मानना है कि कई राज्यों में होने वाली फर्जी मुठभेड़ों में से ज्यादातर पुलिस की होती हैं, सेना की नहीं होती।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 7 अगस्त 2009 को लखनऊ में एक रिपोर्ट जारी की जिसका शीर्षक है: 'ब्रोकेन सिस्टम, डिस्फंक्शनल एब्यूज एण्ड इम्प्यूनिटी इन इण्डियन पुलिस। इस रिपोर्ट की शुरुआत एक पुलिस अधिकारी के इस कुबूलनाम से होती है कि 'इस हफ्ते मुझे एक एनकाउण्टर करने के लिए कहा गया है, मैं उसकी तलाश कर रहा हूं, मैं उसे मार डालूंगा हो सकता है कि मुझे जेल भेज दिया जाय लेकिन यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी नौकरी चली जाएगी। यह कुबूलनामा उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली के बारे काफी कुछ बताता है।

पिछले तमाम सालों में मुठभेड़ों के जरिये देश में हुई हत्याओं के लिए उत्तर प्रदेश कुख्यात रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि 2006 में भारत में मुठभेड़ों में हुई कुल 122 मौतों में से 82 अकेले उत्तर प्रदेश में हुई। 2007 में यह संख्या 48 थी जो देश में हुई 95 मौतों के 50 फीसदी से भी ज्यादा थी। 2008 में जब देश भर में 103 लोग पुलिस मुठभेड़ों में मारे गये तो उत्तर प्रदेश में यह संख्या 41 थी। 2009 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने 83 लोगों को मुठभेड़ों में मारकर अपने ही पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले। बीते साल अपराध प्रभावित मेरठ जोन में ही 359 एनकाउंटर हुए। वर्ष 2017 में जिन 26 अपराधियों को मार गिराया गया, उनमें से केवल मेरठ जोन में हुए पुलिस एनकांउटर में 17 अपराधी मारे गए. मेरठ जोन में मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद, हापुड़, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुजफ्फनगर, शामली, बागपत और बिजनौर जिले शामिल हैं। मेरठ के बाद आगरा जोन का नंबर है, जहां पिछले वर्ष 175 एनकाउंटर हुए। इस दौरान 469 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि गोली लगने से 17 घायल हो गए. तीन बड़े अपराधी मुठभेड़ में मारे गए। 2018 में भी नया इतिहास लिखने की तैयारी है।

दरअसल, फर्जी मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच के लिए अपने यहां कोई स्वतंत्र निगरानी तंत्र नहीं है। देश में प्रत्येक वर्ष सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ की शिकायतें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास आती हैं लेकिन आयोग के पास शक्तियां और संसाधन सीमित हैं। शिकायतों की जांच के लिए आयोग को पुलिस पर ही निर्भर रहना होता है। ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी आरोपी पुलिसकॢमयों को बचाने का ही प्रयास करते दिखते हैं। जबकि राज्य मानवाधिकार आयोग पूरी तरह से दंतविहीन हैं। हर एक मुठभेड़ के बाद पुलिस जोर-शोर से इसे सही साबित करने की कोशिश करती है, तो कुछेक मानवाधिकार संगठन मुठभेड़ की सत्यता की जांच को लेकर हंगामा मचाते हैं। लेकिन, फिर पुलिस ऐसी ही कोई दूसरी कहानी प्राय: दोहरा देती है।

खैर, कथित फर्जी मुठभेड़ों की निष्पक्ष जांच के लिए सबसे पहले जरूरी है कि इनकी न्यायिक जांच कराई जाए। फर्जी मुठभेड़ों में संलिप्त पुलिसकर्मयों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज होना चाहिए। न्यायिक जांच से ही मुठभेड़ों की असलियत सामने आ सकती है। दूसरी चीज, देश में जितना जल्दी हो सके पुलिस सुधारों को लागू किया जाए। पुलिस तंत्र में व्यापक सुधार किए जाने से फर्जी मुठभेड़ों पर काफी हद तक विराम लग सकता है। यह अलग बात है कि पुलिस सुधारों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई बार फटकार लगाए जाने के बाद भी राज्य सरकारों के कानों पर जू नहीं रेंगा है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी पुलिस सुधारों की राह में सबसे बड़ी बाधा है। फर्जी मुठभेड़ के मामलों में शिकायतों पर त्वरित सुनवाई, तंत्र की जवाबदेही, निष्पक्ष जांच से ही इस पर विराम लग सकता है।

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लेखक / पत्रकार

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