मोबीक्विक की फाउंडर उपासना: अमेरिका की नौकरी छोड़ इंडिया में शुरू किया स्टार्टअप

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कश्मीर की उपासना टाकू ने पढ़ाई के दिनो में स्टार्टअप के लिए मजबूती से दिमाग बना लिया था। माता-पिता रोकते, समझाते रह गए लेकिन वह नहीं मानीं, अमेरिका की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ भारत लौट आईं, दस-पंद्रह सेकंड में लोन उपलब्ध कराने का 'मोबिक्विक' नामक कंपनी से काम शुरू किया और आज उनके प्लेटफॉर्म से दस करोड़ सात लाख लोग जुड़ चुके हैं।

उपासना टाकू (फोटो साभार- ट्विटर)
उपासना टाकू (फोटो साभार- ट्विटर)
टाकू बताती हैं कि वह जब वर्ष 2008 में अमेरिका में पेपॉल कंपनी में काम कर रही थीं, उससे पहले वह एचएसबीसी में काम कर चुकी थीं। उस दौरान उन्हें पेपॉल ने कुछ ऐसे अवसर दिए जिससे उनमें भी खुद कुछ बड़ा कर गुजरने का जज्बा बना। 

मोबिक्विक डिजिटल प्लेटफार्म की को-फाउंडर एवं डायरेक्टर उपासना टाकू की मूलतः कश्मीर की रहने वाली हैं। उन्होंने जालंधर एनआईटी से इंजीनियरिंग की है। बाद में वह अमेरिका चली गईं। वहां के स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी पढ़ाई की। बाद में वहां के डिजिटल वैले पेपाल में ऊंची तनख्वाह पर नौकरी करने लगीं। उन्हें अमेरिका का ग्रीन कार्ड भी मिल गया लेकिन उन पर अपने मुल्क में खुद कुछ बड़ा कर गुजरने का जुनून था, सो भारत लौट आईं। उनका जुनून रंग लाया और उनके काम का नेटवर्क दस करोड़ लोगों से जुड़ गया। आज वह सफलता की बुलंदियों से गुजर रही हैं। उनकी कंपनी मोबिक्विक मोबाइल फोन के जीपीएस लोकेशन के आधार पर मात्र पंद्रह सेकेंड में लोन सैंक्शन कर लेती है। कंपनी अब तक एक लाख लोगों को लोन भी दे चुकी है।

उपासना टाकू इस कंपनी की को-फाउंडर एवं डायरेक्टर हैं। वह बताती हैं कि उनकी कंपनी ने एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रिस्क स्कोरिंग मॉडल विकसित किया है, जिसके माध्यम से जब कोई मोबिक्विक के ऐप पर लोन के लिए अप्लाई करता है, उसके जीपीएस लोकेशन से कंपनी पता लगा लेती है कि उसकी इनकम क्या है। यहां तक कि उससे कंपनी को अप्लिकेंट की ट्रेवलिंग का भी डिटेल मिल जाता है। साथ ही बैंकिंग ब्योरे भी उसके संज्ञान में आ जाते हैं। यह सब मात्र 15 सेकंड में कलेक्ट हो जाने के बाद कर्ज मंजूर हो जाता है। टाकू बताती हैं कि मोबिक्विक ऐप के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी जरूरत के मुताबिक साठ हजार रुपए तक कर्ज ले सकता है, जिसे नौ किस्तों में चुकाना होता है। इस काम के लिए उनकी कंपनी का कुछ नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कॉरपोरेशन से टाइअप है। लोन आसानी से मिल तो जाता है लेकिन उस पर चौबीस फीसदी तक ब्याज अदा करना पड़ता है। उनकी कंपनी से ज्यादातर वे लाखों युवा लोन ले रहे हैं, जिनकी मामूली वेतन पर पहली नौकरी होती है। उन्हें अन्य बैंकों से आसानी से लोन नहीं मिल पाता है।

टाकू बताती हैं कि वह जब वर्ष 2008 में अमेरिका में पेपॉल कंपनी में काम कर रही थीं, उससे पहले वह एचएसबीसी में काम कर चुकी थीं। उस दौरान उन्हें पेपॉल ने कुछ ऐसे अवसर दिए जिससे उनमें भी खुद कुछ बड़ा कर गुजरने का जज्बा बना। उनको कंपनी की ओर से डिजिटल वैलेट लांच करने के लिए कई देशों में भेजा गया। वह स्पेन, जर्मनी, इजरायल गईं। टाकू कहती हैं कि वह वक्त उनके लिए बड़े ही असमंजस का था। नौकरी में अच्छी सेलरी मिल रही थी, कई देशों के सफर के भी अवसर थे लेकिन उस काम से उनका मन सिर्फ इसलिए उखड़ने लगा कि उन्हें तो अपना कुछ कर दिखाना है। उन्होंने एक दिन अचानक कंपनी को रिजिग्नेशन लेटर भेज दिया। घर वालों को पता चला तो वे हत्थे से उखड़ पड़े। माता-पिता से कई दिनों तक जमकर तूतू-मैंमैं होती रही। पापा फिजिक्स के प्रोफेसर हैं। उन दिनो वह अफ्रीका की यूनिवर्सिटी में पढ़ाने गए हुए थे। रिजाइन के बाद महीनो तक उनसे बोलचाल बंद रही। घर से सिर्फ नौकरी के संस्कार मिले थे। बिजनेस में कूदने का रिस्क उन्हें डरा रहा था लेकिन अपनी संगीत टीचर मम्मी से भी उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि वह इंडिया लौट रही हैं।

टाकू का एक खास बिजनेस आइडिया है कि गुलामी की मानसिकता से उबर कर आज के युवाओं को उस काम में हाथ डालना चाहिए, जिसके लिए दुनिया बावली बनी जा रही है। हमारी इस नाकाबिलियत की वजह से ही बाहरी देश भारत में स्टार्ट अप में पैसा लगा रहे हैं। चीन से, जापान से, अमेरिका से पैसा आ रहा है इंडिया के स्टार्ट अप में, लेकिन हमारे देश के बड़े बिजनेस हाउस पैसा बचाने में लगे हैं। दरअसल हमारे यहां के, खासकर निम्नमध्यम वर्गीय परिवारों में नौकरी को लेकर जितनी बेचैनी और निश्चिंतता रहती है, बिजनेस की ओर सिर्फ व्यावसायिक परिवारों के युवा ही रुझान कर पाते हैं। बाहरी कंपनियां इस मानसिकता का भी फायदा उठा रही हैं।

मोबीक्विक के फाउंडर उपासना और बिपिन प्रीत सिंह
मोबीक्विक के फाउंडर उपासना और बिपिन प्रीत सिंह

आज के समय में स्टार्टअप के लिए तो भारत सरकार भी प्रोत्साहित कर रही है। खुद के काम में जो स्वतंत्रता और कमाई है, उतनी नौकरी में कहां। आज उनकी कंपनी के लोन अमाउंट का प्रयोग यूजर्स एप के माध्यम से कई अलग-अलग प्रकार के भुगतान जैसे बिल, कैब पेमेंट्स के लिए कर सकते हैं। वहीं इन पेमेंट्स को यूजर्स चाहें तो ऑफलाइन व ऑनलाइन दोनों ही तरीके से कर सकते हैं। इसके अलावा कंपनी इस बात का भी आश्वासन दे रही है कि ये लोन यूजर को केवल 10 सेकेंड्स में ही मिल जाएगा, जिसके लिए उन्हें केवल एप पर तीन आसान स्टेप्स को फॉलो करना होगा।

ऐसी कंपनी का काम शुरू करने का उनमें दुस्साहस कहां से आया था, टाकू बताती हैं कि इसके पीछे एक जायज वजह है। जब वह एनआईटी जालंधर से बीटेक करने के बाद एमएस करने के लिए स्टैनफोर्ड पहुंची थीं, वहां की आबोहवा में, नेचर में एंटरप्रेन्‍योरशिप का हर तरफ उल्लास दिखता था। वहां के छात्रों के साथ बातचीत में भी यही सोच बनती थी कि पढ़ाई के बाद खुद कुछ करना है, नौकरी तो बस टाइम पास। वह बताती हैं कि भारत लौटने के बाद उन्होंने हालात से एक और सबक मिला। उनको मोबाइल का बिल जमा करने के लिए दुकान पर जाना पड़ता था। अलग-अलग बिल के लिए अलग-अलग साइट। तभी उनके दिमाग में ये बात आई कि क्यों न कोई ऐसा वैलेट प्लेटफार्म हो, जिसके माध्यम से बिना किसी झंझट के झटपट पेमेंट हो जाया करे। उस समय हमारे देश में एक फीसदी लोग भी डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं कर रहे थे। अगले साल उन्होंने इसी काम के लिए 'मोबिक्विक' नाम से अपना काम लांच कर दिया। आज उनके प्लेटफार्म से 10 करोड़ सात लाख लोग जुड़ गए हैं। इससे कंपनी का राजस्व हर साल चार गुना तक छलांग लगा रहा है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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