कविता की दौड़ ने दिया जीवन का मूलमंत्र

कविता एक  ऐसी उद्यमी जो मैराथन भी दौड़ती है शौकिया चित्रकारी, अभिनय भी करती है और जिमनास्ट भी है

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कविता अय्यर रॉड्रिक्स के लिए उनकी माँ सबसे बड़ी प्रेरणा और मार्गदर्शन करने वाली बनीं। कविता की उम्र जब छह वर्ष की थीं तो वह पोलियो की शिकार हो गयीं थीं और उन्होंने पहले चार वर्ष के लिए अपनी स्कूली शिक्षा घर से ही पूरी की। अपनी विकलांगता को एक तरफ छोड़कर वे आगे बढती गयीं। उन्होंने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से विवाह किया, जिनसे वे अपनी इंटर्नशिप के दौरान उनके ऑफिस में मिलीं थी।, इसके बाद उन्होंने अपनी चार्टर्ड एकाउंटेंसी की पढाई पूरी की। उनका आत्म-विश्वास मजबूत करने में मां की भूमिका अहम है।

कविता अय्यर 'रॉड्रिक्स
कविता अय्यर 'रॉड्रिक्स

दक्षिण बैंगलोर के एक तमिल परिवार में परवरिश होने के चलते कविता के लिए शैक्षिक उपलब्धि के मानदंड काफी ऊँचे रखे गए थे। इन मानदंडों को कविता ने अपनी मेहनत के चलते काफी अच्छे तरीके से हासिल किया।

कविता एक ऐसी उद्यमी हैं जो लगातार कुछ नवया करने की कोशिश में रहती हैं। इसी का नतीजा है कि उन्होंने अबतक दो बायोटेक कंपनियों की सह-स्थापना कर ली है। कविता चालीस साल से कम उम्र की उन सात महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने फार्च्यून इंडिया 2014 की सूची में अपना स्थान बनाया। यह उनके लिए सिर्फ व्यवसायिक सफलता है, वे व्यक्तिगत जीवन में भी काफी गतिशील रही हैं। वे कई मैराथन दौड़ में भाग ले चुकी हैं, वे एक शौकिया चित्रकार हैं, नाटकों में अभिनय करती हैं। इसके अलावा भी वे अपनी अन्य कई प्रतिभाओं का प्रदर्शन कर चुकी हैं।

बचपन से ही प्रतिभावान

कविता एक संयुक्त परिवार से आती हैं, जहाँ किसी भी वक़्त 12 से कम रिश्तेदारों का आना-जान नहीं होता था। माता-पिता दोनों ही काम करते थे इसलिए वे अपने दादा-दादी की देखरेख में बड़ी हुईं।

वे ऐसे माहौल में पली-बढीं जहाँ शैक्षणिक क्षेत्र में प्रदर्शन करने का भारी दबाव था, लेकिन उन्होंने निराश नहीं किया। अपने स्कूल की पढाई के दौरान कई मेडल जीते और पढाई में डिस्टिंक्शन प्राप्त किया। यही नहीं कॉलेज के बाद आईआईएम बैंगलोर से एमबीए की पढाई के दौरान भी यही प्रदर्शन जारी रखा। स्कूल के बाद उनका चयन एमबीबीएस के लिए हुआ, लेकिन उन्होंने बीएससी करना ज्यादा अच्छा समझा ताकि उन्हें अपनी कला की रूचि को पूरा करने का समय मिल सके।

बैंगलोर के माउंट कार्मेल कॉलेज ने एक बेढब किशोरी के व्यक्तित्व को एक युवा वयस्क में बदला जिसने वहां सांस्कृतिक समारोहों में भाग लिया और अपनी प्रतिभा को लोगों के सामने रखा, हिमालय में पैदल सफर तय किया है और कई सामाजिक में भाग लिया।

वे कहती हैं, ‘मुझे ज़रा भी आभास नही था कि एक दिन मैं उद्यमी बनूँगी। मैंने सोचा था कि यूएस जाकर पीएचडी करूंगी। मुझे केएमसी मणिपाल से अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद वुज्बर्ग में एमफिल प्रोग्राम में एडमिशन भी मिला गया था। केएमसी में गुजारे दिन मस्ती वाले थे। इस दौरान पैरामेडिकल में मास्टर्स करने के साथ-साथ पढ़ाने का मौका भी मिला ।

खेल और फिटनेस के लिए प्यार

अपनी शैक्षणिक गतिविधियों के अलावा वे खेलकूद में भी अव्वल रहीं। उन्होंने जिम्नास्टिक्स क्लब भी ज्वाइन किया जब वे केवल सात वर्ष की थीं। उन्होंने तैराकी और एथलेटिक्स की प्रतिस्पर्धाओं में भी भाग लिया। कविता कहती हैं, ‘इन सभी गतिविधियों का मतलब होता था घंटों अभ्यास करना और स्कूल की क्लासेज बंक करना, इससे लोगों ने मुझे पहचाना, जो मुझे अच्छा लगता था। उस वक़्त मैं बड़ी बेढब थी, इसलिए खेलों पर निर्भर करती थी और किताबों से बहुत प्यार करती थी।’ लक्ष्य के प्रति उनके इस लगाव के चलते उन्हें जिम्नास्टिक्स में प्रदेश और वे अपने पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में कभी हार न मानने वाले मनोवृत्ति के लिए बचपन से प्रतिस्पर्धात्मक खेलकूद प्रतियोगिताओं में भाग लेने को श्रेय देती हैं।

खेलों और फिटनेस के लिए उनका लगाव आज भी जारी है। तीस वर्ष की आयु के बाद दौड़ को गंभीरता से लेने के बाद, वे कई मैराथन दौड़ों में भाग ले चुकी हैं। वे केवल इनमे भाग लेकर खुश नहीं होती हैं बल्कि वे इन्हें जीतने के लिए इनमें भाग लेती हैं। उन्होंने बैंगलोर अल्ट्रा, 2010 और कावेरी ट्रेल मैराथन, 2012 को पोडियम तक पहुँच कर समाप्त किया। वे इस बारे में चर्चा होने पर बड़ी प्रसन्नता के साथ कहती हैं, ‘मैराथन में दौड़ना एक चिकित्सीय इलाज की तरह है, दौड़ की दूरी स्वतंत्रता का एहसास देती है और वह अद्वितीय है। यह निश्चय ही एक स्टार्टअप उद्यम चलने से ज्यादा आसान है।’

वे अपने आपको आराम देने के लिए ताई-ची, वाटर कलर से चित्रकारी, सिरेमिक आर्ट और थिएटर का सहारा लेती हैं, उन्होंने कुछ नाटकों में अभिनय भी किया है।

पहली नौकरी और उद्यमिता के लिए छलांग

अपनी मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद कविता ने सीधा बायोकॉन में नौकरी की, इससे उन्हें विश्वस्तरीय बायोटेक कंपनी में काम करने का अनुभव मिला। बायोकॉन छोड़ने के बाद उन्होंने मिलीपोर इंडिया के साथ काम किया, यहाँ उन्होंने रिसर्च एंड डेवलपमेंट के साथ-साथ प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और प्रोसेस डेवलपमेंट में बेशकीमती अनुभव प्राप्त किया।

इसके बाद उन्होंने अवेस्ताजेन में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर ज्वाइन किया, जिसमे उन्हें बिज़नेस डेवलपमेंट के अन्य विधाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त हुआ। इस नौकरी के दौरान उन्होंने आईआईएम बैंगलोर से एग्जीक्यूटिव एमबीए पूरा क्या, जिसने उन्हें बिज़नेस चलाने के तौर-तरीकों का ज्ञान दिया।

यहाँ उन्होंने और उनके सहयोगी सोहाग चटर्जी ने बायोलोजिक्स में प्रोसेस डेवलपमेंट का अवसर देखा और अपना उद्यम शुरू करने का फैसला किया। कविता बताती हैं, ‘सोहाग और मैंने यह सोचा कि हम साथ में कुछ ऐसा शुरू कर सकते हैं जिसे हम मिलकर बेहतर बना सकते हैं और इस तरह इनबायोप्रो की शुरुआत हुई।’

उसके माता पिता और पति बहुत सहायक थे। सौभाग्य से, कार्यों में से कुछ के लिए वह घर में समर्थन किया था; उसकी माँ - एक सीए होने के अलावा भी आईआईएम-बी जैसे संस्थानों में पढ़ाती हैं - जो वित्तीय सलाहकार और सलाहकार बन गया।

उनके माता-पिता और पति ने उनका बहुत सहयोग किया। सौभाग्य से उनकी माँ जोकि एक सीए हैं और आईआईएम बैंगलोर में पढ़ाती भी हैं, ने उनके कई कामों में घर पर ही सहयोग दिया और वे उनकी वित्तीय सलाहकार बन गईं।

इनबायोप्रो, स्ट्राइड्स का अधिग्रहण और थेरामिट की शुरुआत

इनबायोप्रो की शुरुआत वर्ष 2007 में मेकेंजी के एक सलाहकार आदित्य जुल्का द्वारा सोहाग और कविता के साथ उनके उद्यम में आने के साथ हुई थी। इस बायोटेक फर्म का मकसद था बायो-सिमिलर उत्पादों का विकास और प्रोसेस डेवलपमेंट में अपनी सेवाएँ देना। फर्म का सौभाग्य रहा कि उसे एक्सेल पार्टनर्स से 1.5 मिलियन डॉलर (रु। 6.5 करोड़) का निवेश प्राप्त हुआ, जिससे उन्हें अपनी लैब, मैनपावर नियुक्त करने और रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश करने में आसानी हुई। चार वर्षों तक विकास के पथ पर चलने के बाद कम्पनी ने कई बड़ी फार्मा कम्पनियों के साथ पार्टनरशिप की, जिनमे लूपिन, पनेसिया बायोटेक शामिल हैं।

इसके बाद कविता ने वर्ष में फार्मा सेक्टर की बड़ी कम्पनी स्ट्राइड्स एक्रोलैब्स को अपनी कम्पनी की 70 फीसदी हिस्सेदारी बेच दी, इससे उन्हें तीन वर्ष की अवधि में 65 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।

इनबायोप्रो छोड़ने के बाद सोहाग और कविता ने बायो-सिमिलर से बायो-बेटर की और बढ़ते हुए, जिसमें ड्रग डिजाईन और प्लेटफार्म टेक्नोलॉजी शामिल हों, के इरादे से 2013 में थेरामिट नोवोबायोलोजिक्स की शुरुआत की। उन्होंने अक्टूबर में आरिन कैपिटल, एक्सेल पार्टनर्स, आईडीजी वेंचर और कर्नाटका सरकार के उपक्रम किटवेन के सहयोग से 27.5 करोड़ रूपये एकत्र किये और अपनी नई लैब सुविधा का उद्घाटन जनवरी 2014 में किया। कविता और सोहाग अब थेरामिट को अपने पूर्व उद्यम से अधिक सफलता दिलाने पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं।

आरंभिक चुनौतियां और परिवार का सहयोग

कविता बताती हैं कि अपने पहले उद्यम इनबायोप्रो की शुरुआत करते समय उनके सामने मुख्य चुनौती थी अपने बच्चे की देखभाल करना और साथ में कंपनी चलाना। वे बताती हैं कि ऐसे चुनौतीपूर्ण और तनाव भरी स्थिति का सामना करने में उन्हें अपने पति नेस्टर रोड्रिग्स, परिवार, उनकी सास का प्यार और भरपूर सहयोग मिला। कविता उस वक़्त को याद करते हुए कहती हैं, ‘नेस्टर एक व्यवहारिक पिता हैं, जिससे उन्होंने जिमीदारियों को बांटना और निभाना आसान बना दिया। मेरे माता-पिता और मेरी सास ने मूल्यों को जीवित रखने और मेरा सहोयग करने में अहम् भूमिका अदा की।’

वे कम्पनी के बारे में यह भी कहती हैं कि वेंचर कैपिटलिस्ट द्वारा फंडिंग होने के चलते प्रारम्भिक चरणों यह एक बड़ा वरदान था और इनबायोप्रो को विकसित करने में बड़ा कदम था। शुरुआत में बड़ी फार्मा कंपनियों से आर्डर मिलने के चलते वे कंपनी शुरू होने के दूसरे वर्ष में ही कमाई करने लगी।

अभी शेष है

आपको लगेगा कि इतनी सफलता पाने के बाद कविता अपने आपको शाबासी देकर कहेंगी, ‘बहुत अच्छा काम किया।’ लेकिन वे अभी भी कहती हैं कि उन्हें वह नहीं मिला जिसे वे पाना चाहती थीं। वे कहती हैं, ‘एक तमिल ब्राह्मण परिवार से आने की वजह से हमेशा से सभी का ध्यान शैक्षणिक योग्यता पर केंद्रित रहा है, इसलिए यह कमी अभी भी मुझे कचोटती है, मैं पीएचडी नहीं कर पाई।’ कविता जैसे जैसे अपने लिए लक्ष्य ऊंचा करती जा रही हैं, उसे देखकर ऐसा ही लगता है कि उनका सर्वश्रेष्ठ अभी आना शेष हैं।