करुणा नंदी ने क्यों छोड़ दी देश के लिए विदेश की नौकरी

मैरिटल रेप के खिलाफ कानून बनाने की वकालत करने वाली करुणा नंदी महिला सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण हैं। उनकी देशभक्ति और भारतीय समाज से उनका लगाव उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है।

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दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ीं करुणा ने न्यूयॉर्क में लैंगिक अधिकारों के लिए काम करते हुए काफी योगदान दिया और वहीं से वह इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल और संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए काम करने लगीं। संवैधानिक कानून, कॉमर्शियल मुकदमे, मीडिया कानून और लीगल पॉलिसी में महारत करुणा को उनकी उपलब्धियों के आधार पर फोर्ब्स मैगज़ीन द्वारा 'माइंड दैट मैटर्स' में जगह दी गई है।

आप चाहे माने या न मानें भारत में कानून व्यवस्था पुरुषों के आधिपत्य वाला क्षेत्र है जहां पर महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है। इस हालत में अगर कोई युवा महिला कई हाई प्रोफाइल और जरूरी मुद्दों वाले केस जीतती है तो सबकी नजर में आ जाना लाजिमी है। पिछले कुछ सालों से करुणा नंदी ने भोपाल गैस त्रासदी, ऑनलाइन फ्री स्पीच जैसे कई बड़े केस में कामयाबी हासिल कर पुरुष आधिपत्य वाले क्षेत्र में अपना नाम बुलंद कर दिया।

यदि आपको याद हो, तो शारीरिक रूप से अक्षम जीजा घोष को स्पाइसजेट की फ्लाइट से उतारे जाने वाला केस करुणा नंदी ने ही लड़ा था और फ्लाइट कंपनी के खिलाफ जीत हासिल की थी। सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाली नंदी महिला अधिकारों के लिए भी काफी मुखर रहती हैं। दिल्ली के वीभत्सतम निर्भया केस के बाद एंटी रेप बिल बनाने में भी उन्होंने काफी मदद की और वे हमेशा से मैरिटल रेप पर कानून बनाने की बात करती आई हैं। करुणा कहती हैं, 

'मैं विचारशील लोकतंत्र में यकीन रखती हूं, जहां आपको बोलने का अधिकार होता है और जहां आपकी बात सुनी भी जाती हो।'

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दुनिया की टॉप यूनिवर्सिटी मानी जाने वाली कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री लेने के बाद करुणा ने न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से फेलोशिप हासिल कर वहां से अपनी पढ़ाई पूरी की। वह कमर्शियल वकील हैं और भारत आने से पहले वे यूनाइटेड नेशंस और इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल्स के लिए काम करती थीं। वे कहती हैं,

'मुझे पहले से ही मालूम था कि मैं कोई अच्छे मकसद वाले पेशे में जाऊंगी, जहां मैं दुनिया को कुछ दे सकूं और कुछ बदलाव ला सकूं।'

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करुणा के सपनों को पूरा करने के लिए उनके पिता ने हार्वड मेडिकल स्कूल की नौकरी छोड़ दी और समाजिक काम करने के लिए भारत आ गए। यहां उन्होंने प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान एम्स में काम करना शुरू कर दिया। उनकी मां को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से प्रतिष्ठित हिस्ट्री प्राइज मिल चुका है। उन्होंने भी इंडिया आने का फैसला कर लिया और उत्तर भारतीय लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया। करुणा लंदन में अच्छा खासा काम कर रही थीं, लेकिन वह भारत के लिए कुछ करना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने वापस देश लौटने का फैसला कर लिया। करुणा का मानना है, कि हमारा देश अभी भी आर्थिक और सामाजिक बदलावों के मामले में काफी पीछे है। वे कहती हैं,

'मुझे लगा कि भारत ही वह जगह है जहां मैं मानव अधिकार के लिए काम करने के साथ-साथ सामान्य से वकील के तौर पर भी बड़ा योगदान दे सकती हूं। मुझे लगा कि यही वह जगह है जहां मैं बड़े समय से काम करना चाहती थी। क्योंकि मुझे यहां के समाज की अच्छी समझ है फिर बात चाहे भाषा की हो या फिर संस्कृति की।'

अभी फिलहाल करुणा नंदी  मानवाधिकार, मीडिया कानून, संवैधानिक कानून और महिलाओं के अधिकारों से संबंधित मामले देखती हैं। सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली से पढ़ीं करुणा ने न्यूयॉर्क में लैंगिक अधिकारों के लिए काम करते हुए काफी योगदान दिया और वहीं से वह इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल और संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए भी काम करने लगीं। संवैधानिक कानून, कॉमर्शियल मुकदमे, मीडिया कानून और लीगल पॉलिसी में महारत करुणा को उनकी उपलब्धियों के आधार पर फोर्ब्स मैगज़ीन द्वारा 'माइंड दैट मैटर्स' में जगह दी गई।

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2012 में दिल्ली के निर्भया रेप केस के बाद करुणा नंदी ने रेप के अपराधियों के खिलाफ एक मजबूत कानून बनाने की मांग उठाई और एक बड़े आंदोलन का आंदोलन का नेतृत्व किया।

करुणा हमेशा से बलात्कार पीड़ितों और यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ती रही हैं। करुणा कुछ अन्य वकीलों के साथ अभी एक बिल पर काम कर रही हैं जिसका नाम है 'विमेनिफेस्टो'। उनका कहना है कि फौरी तौर पर स्कूलों में बच्चों को सार्वजनिक शिक्षा कार्यक्रम के तहत ऐसे गंभीर मुद्दों के बारे में शिक्षित करने पर जोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि तभी पितृसत्ता का खात्मा संभव हो सकेगा। वह इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय मानती हैं। करुणा अभी एक और बिल पर काम कर रही हैं जो 'मैरिटल रेप' से सीधे तौर पर जुड़ा है। नंदी हमेशा मीडिया कार्यक्रमों में महिलाओं के मूलभूत अधिकारों पर मुखर होकर बात करती हैं।

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