अमानवीयता: फोर्टिस हॉस्पिटल के चंगुल में मासूम आद्या का शव

चिकित्सा का पेशा अब कदापि सेवा का माध्यम नहीं रहा। अनेक चिकित्सक सफेद लबादे में गरीबों का खून चूसने में जुटे हुए हैं...

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फोर्टिस अस्पताल में सात साल की बच्‍ची की डेंगू से मौत के बाद 16 लाख रुपए देने पर ही शव ले जाने देने जैसा वाकया कोई नया नहीं हैं। वह जमाना कोई और रहा होगा, जब डॉक्टरों को धरती के भगवान का दर्जा प्राप्त था। अब तो अस्पताल सरकारी हो या प्राइवेट, हर जगह मनमानी का बोलबाला है।

सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- शटरस्टॉक)
सांकेतिक तस्वीर (फोटो साभार- शटरस्टॉक)
 हमारे देश में पूरी चिकित्सा व्यवस्था ही ध्वस्त हुई पड़ी है। चारो तरफ जंगल राज है। चिकित्सा का पेशा अब कदापि सेवा का माध्यम नहीं रहा। अनेक चिकित्सक सफेद लबादे में गरीबों का खून चूसने में जुटे रहते हैं। पैसे ऐंठने के लिए मरीजों के साथ सबसे ज्यादा जोर-जबर्दस्ती उन कारपोरेट अस्पतालों में हो रही है, जो चमक-दमक का तनोवा तान कर लूटपाट में लगे हुए हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आद्या का मामला संज्ञान में आने के बाद फोर्टिस हॉस्पिटल प्रबंधन से पूरी रिपोर्ट तलब करते हुए ट्वीट किया है कि सभी जानकारी उन्हें भेजी जाएं तो वे कार्रवाई करेंगे।

गुड़गांव के फोर्टिस हॉस्पिटल में डेंगू पीड़ित सात साल की आद्या की मौत के बाद 16 लाख लेकर ही उसका शव परिजनों को देने की अमानवीय हठधर्मी कोई नई बात नहीं, यह तो हमारे देश की चिकित्सा व्यवस्था में एक भ्रष्टतम रिवाज सा हो चुका है। यद्यपि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने आद्या का मामला संज्ञान में आने के बाद फोर्टिस हॉस्पिटल प्रबंधन से पूरी रिपोर्ट तलब करते हुए ट्वीट किया है कि सभी जानकारी उन्हें भेजी जाएं तो वे कार्रवाई करेंगे।

गुड़गांव के फोर्टिस अस्पताल में सात साल की बच्‍ची की डेंगू से मौत के बाद 16 लाख रुपए देने पर ही शव ले जाने देने जैसा वाकया कोई नया नहीं हैं। वह जमाना कोई और रहा होगा, जब डॉक्टरों को धरती के भगवान का दर्जा प्राप्त था। अब तो अस्पताल सरकारी हो या प्राइवेट, हर जगह मनमानी का बोलबाला है। दिल्ली के द्वारका में रहने वाले जयंत सिंह सात साल की आद्या के पिता एवं आइटिशियन हैं। वह बताते हैं कि आद्या को डेंगू होने पर हमने 30 अगस्त को उसे गुड़गांव के फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती कराया। वहां 15 दिन इलाज के बदले 16 लाख का बिल चुकाने के लिए कहा गया। जब वह डॉक्टरों से बातचीत के बाद 14 सितंबर को आद्या को घर ले जाना चाहते थे, उसी दिन उसकी मौत हो गई।

अब अस्पताल वाले कह रहे हैं कि पहले 16 लाख जमा करो, फिर बच्ची की लाश ले जाओ। उनका कहना है कि बेटी के इलाज में वह नाते-रिश्तेदारों के पहले से लाखों के कर्जदार हो चुके हैं। अब 16 लाख और कहां ले आएं। जयंत के दोस्त ने @DopeFloat नाम के हैंडल से 17 नवंबर को हॉस्पिटल के बिल की कॉपी के साथ ट्विटर पर पूरी घटना शेयर करते हुए लिखा कि 'मेरे साथी की 7 साल की बेटी डेंगू के इलाज के लिए 15 दिन तक फोर्टिस हॉस्पिटल में भर्ती रही। हॉस्पिटल ने इसके लिए उन्हें 16 लाख का बिल दिया। इसमें 2700 दस्ताने और 660 सिरिंज भी शामिल थीं। आखिर में बच्ची की मौत हो गई। चार दिन के भीतर ही इस पोस्ट को 9000 से ज्यादा यूजर्स ने रिट्वीट किया। इसके बाद हेल्थ मिनिस्टर जेपी नड्डा ने हॉस्पिटल से रिपोर्ट मांगी। नड्डा ने रविवार को ट्वीट किया, 'कृपया अपनी सभी जानकारियां hfwminister@gov.in पर मुझे भेजें। हम सभी जरूरी कार्रवाई करेंगे।'

अब फोर्टिस हॉस्पिटल के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन हेड अजेय महाराज की सुनिए। वह कहते हैं कि बच्ची के इलाज में सभी स्टैंटर्ड मेडिकल प्रोटोकॉल और गाइडलाइंस का ध्यान रखा है। डेंगू से पीड़ित बच्ची को गंभीर हालत में हॉस्पिटल लाया गया था। बाद में उसे डेंगू शॉक सिंड्रोम हो गया और प्लेटलेट्स गिरते चले गए। उसे 48 घंटे तक वेंटिलेटर सपोर्टर पर भी रखना पड़ा। हमने हॉस्पिटल से जाने से पहले फैमिली को 20 पेज का एस्टीमेटेड बिल दिया था। इसमें लगाए गए सभी तरह के चार्ज बिल्कुल सही थे। फाइनल बिल 15.70 लाख रुपए था। महाराज सब कुछ तो कह गए, मगर यह नहीं बोले कि लाश रोककर वसूली के लिए विवश करना कितना अमानवीय है। गौरतलब है कि 16 लाख के बिल में 2700 रुपए दस्‍ताने के हैं। क्या लूट मचा रखी है!

दरअसल, हमारे देश में पूरी चिकित्सा व्यवस्था ही ध्वस्त हुई पड़ी है। चारो तरफ जंगल राज है। चिकित्सा का पेशा अब कदापि सेवा का माध्यम नहीं रहा। अनेक चिकित्सक सफेद लबादे में गरीबों का खून चूसने में जुटे रहते हैं। पैसे ऐंठने के लिए मरीजों के साथ सबसे ज्यादा जोर-जबर्दस्ती उन कारपोरेट अस्पतालों में हो रही है, जो चमक-दमक का तनोवा तान कर लूटपाट में लगे हुए हैं। कई चिकित्सक ऐसे भी मिल जाते हैं, जो अपने पेशे के प्रति ईमानदारी रखते हुए आज भी मरीजों को जीवनदान देते रहते हैं। लूटने वाले चिकित्सक और हास्पिटल कमीशनखोरी के लिए तो कुख्यात हो ही चुके हैं, गैर-जरूरी टेस्ट, आपरेशन करके मरीज को किसी काम लायक नहीं रहने दे रहे हैं। वह मरीजों को रेफर करने में भी मोटी कमाई करते हैं।

हर प्राइवेट अस्पताल में मेडिकल स्टोर बने हुए हैं। चिकित्सक द्वारा लिखी दवाई केवल अस्पताल के ही मेडिकल स्टोर में मिलेगी। अस्पताल में मेडिकल स्टोर खोलने के इच्छुक लोगों को इसकी मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। एक बात और गौरतलब है कि प्राइवेट अस्पतालों में अर्द्धशिक्षित बेरोजगार युवा और युवतियों से मामूली वेतन पर चिकित्सा का काम लिया जा रहा है। ऐसे तमाम अर्द्धशिक्षित बाद में झोलाछाप डॉक्टर बनकर मरीजों की जिंदगी से खेलते रहते हैं। डाक्टर का अपना अस्पताल, इंडोर मरीज, बैड का मनचाहा किराया, इसके बावजूद डाक्टर विजिटिंग फीस भी वसूलते हैं। ये प्राइवेट अस्पताल आईसीयू के नाम पर भी वसूली की अंधेरगर्दी मचाए हुए हैं। कोई मरीज से आईसीयू में भर्ती करने का डेढ़ हजार ले लेता है तो कोई पांच-दस हजार तक। हमारे देश में कोई मेडिकल एक्ट न होने से यह सब मनमानी चल रही है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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