दो दोस्तों ने नौकरी छोड़ शुरू किया बिजनेस, दो साल में टर्नओवर एक करोड़ पार

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आर्गैनिक खेती और, उसके जरिये बाजार में धाक जमा रहे आर्गैनिक प्रॉडक्ट्स ऐसे स्टार्टअप वाले तकनीकी युवाओं को देखते ही देखते करोड़पति बना दे रही हैं। यूरोप की बड़ी नौकरी ठुकराने वाले डॉ बाला और बाला, एक ही नाम के दो दोस्तों की नई-नई सी कंपनी 'बीएंडबी' दो साल में ही एक करोड़ का टर्नओवर पार कर गई है।

पुरस्कारक प्राप्त करते डॉ. बाला और बाला
पुरस्कारक प्राप्त करते डॉ. बाला और बाला
बाजार के झटके इतने तेज थे कि दोनों को मात्र तीस किलो ग्राम ऑर्गेनिक इडली राइस बेचने में महीनो बीत गए। नहीं बिकने पर आखिरकार उन्हें इडली राइस अपने परिवार के हिल्ले लगाना पड़ा। यह घटना उनके लिए बड़ी शॉकिंग रही।

बीएंडबी ऑर्गनिक्स प्रोडक्ट्स यानी डॉ बाला और बाला की कंपनी, जो दो-ढाई साल पहले ही एक मामूली से स्टोर से सक्रिय होकर आज दोनो साझेदारों को हर साल पंद्रह लाख की कमाई करा रही है। इतने कम समय में ही बीएंडबी का सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपए हो चुका है। हाल ही में इस कंपनी को 'प्राइड ऑफ तमिलनाडु अवॉर्ड-2018' से सम्मानित किया गया है। दोनों सहकर्मी दोस्तों में एक डॉ. बाला ने तो खुद कुछ कर दिखाने का भारी रिस्क लेते हुए अपनी यूरोप की बड़ी सैलरी वाली लगी-लगाई नौकरी को ठोकर मार दी। आजकल खासतौर से तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं का तेजी से आर्गेनिक खेती, आर्गेनिक प्रॉडक्ट्स के कारोबार की ओर झुकाव बढ़ता जा रहा है। आपने आईआईटी ग्रेजुएट कौस्तुभ खरे और साहिल पारिख के बारे में भी शायद सुना-जाना हो, जिनकी कंपनी खेतीफाई सिर्फ 19 हजार रुपये में 200 वर्ग मीटर की छत को खेत बनाकर 700 किलोग्राम तक सब्जियां उगाती है।

इसी कड़ी में एक चौंकाने वाली जानकारी ये भी आई है कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे तमाम इंटरप्रेन्योर और स्टार्टअप की आश्चर्यजनक सफलताओं की वजह से बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि लड़खड़ाने लगी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक पतंजलि ने अपने ऑर्गेनिक उत्पादों की वजह से ही पिछले साल तक घर-घर में अपनी पहुंच बनाकर 27 पर्सेंट से बढ़कर 45 फीसदी तक की ग्रोथ ले ली थी लेकिन अब वह पिछड़ती जा रही है। उसके हर्बल और ऑर्गनिक फूड प्रॉडक्ट्स की लगातार मांग घटती जा रही है। कंपनी को मीडिया से मिल रहा ओवर एक्सपोजर भी दम नहीं दे पा रहा है।

ऑर्गेनिक उत्पादन के क्षेत्र में कड़ी टक्कर दे रही 'बीएंडबी ऑर्गनिक्स प्रोडक्ट्स' दरअसल, हाल ही में बाजार के बीच दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके दो दोस्तों की कामयाबी की दास्तान है। उनके ऑर्गेनिक प्रॉडक्ट्स सक्सेज होने के पीछे एक खास वजह लोगों की स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता भी मानी जा रही है। डॉ बाला और बाला की दोस्ती कोयंबटूर स्थित तमिलनाडु एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी से हॉर्टिकल्चर में बीटेक करने के दौरान हुई। डॉ बाला जब बीटेक के स्वीडन से एनवायर्नमेंट साइंस में पीएचडी कर रहे थे, वहीं बाला एग्री क्लीनिक एंड एग्री बिजनेस स्कीम से पढ़ाई कर रहे थे। पीएचडी के बाद डॉ बाला यूरोप में ऊंचे वेतन पर नौकरी करने लगे लेकिन उसमें उनको संतुष्टि नहीं मिल रही थी। वह स्वयं का बिजनेस शुरू करने पर तेजी से सोचने लगे और एक दिन उन्होंने नौकरी छोड़कर भारत लौटने का मन बना लिया। उधर, इसी तरह की हलचल बाला के भी दिमाग में मची हुई थी। दोनों में बातचीत आगे बढ़ी और फिर, इस तरह वर्ष 2016 में 'बीएंडबी ऑर्गनिक्स प्रोडक्ट्स' नाम से कंपनी का जन्म हुआ।

दोनो दोस्तों के लिए आज के चुनौतीपूर्ण वक्त में किसी कृषि आधारित कारोबार की मुश्किलों पर पार पाना आसान नहीं था। जब उन्होंने यह काम शुरू किया, तमाम लोग नौकरी छोड़कर यह सब करने के उनके फैसले की आलोचना करने लगे। दोनो दोस्त वह सब सुनते-जानते हुए यदा-कदा विचलित भी हो जाते लेकिन मोरचे पर डटे रहे। धीरे-धीरे काम चल निकला। उनके प्रॉडक्ट्स की मांग बाजार में जोर पकड़ने लगी। डॉ बाला साइंटिस्ट तो उनके दोस्त बाला कंसल्टेंट, जबकि दोनो बाजार के दांव-पेंच से अनुभवहीन। दोनों को मार्केटिंग करने नहीं आता था लेकिन उन्हें अपने प्रॉडक्ट की गुणवत्ता का ही एक अदद भरोसा था। वह मान कर चल रहे थे कि उनके ऑर्गेनिक उत्पाद जब लोगों के घरों तक पहुंचेंगे, धंधा जरूर रंग लाएगा। बाजार के झटके इतने तेज थे कि दोनों को मात्र तीस किलो ग्राम ऑर्गेनिक इडली राइस बेचने में महीनो बीत गए। नहीं बिकने पर आखिरकार उन्हें इडली राइस अपने परिवार के हिल्ले लगाना पड़ा। यह घटना उनके लिए बड़ी शॉकिंग रही।

इस बीच धीरे-धीरे वह बाजार के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से अनुभव भी हासिल करते गए। इसके बाद उनके हाथ एक महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगा कि बिजनेस कामयाब करना है तो किसानों, गांवों, खेतों पर नजर गड़ानी होगी। यही ट्रिक काम कर गया। सबसे बड़ा ट्रिक ये रहा कि जब सूखा पड़ा, फसलें लड़खड़ा गईं, उस वक्त भी वे वाजिब दाम पर उनके उत्पाद खरीदते रहे। इससे उनके प्रति किसानों का विश्वास बढ़ता गया और दोनो दोस्तों का कारोबार भी। उनके प्रॉडक्ट्स जड़ जमाते जाने की एक और वजह थी, उनका उनका लैब टेस्ट में खरा होना। आज पंद्रह फीसदी अतिरिक्त कमाई के साथ उनकी कंपनी एक करोड़ का टर्नओवर पार करने लगी है।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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