व्हाट्ज़एप के जरिये घर बैठे साड़ियां बेचकर प्रतिमाह लाखों रुपये कमा रही है यह महिला उद्यमी

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चेन्नई की रहने वाली शनमुगा प्रिया व्हाट्ज़एप के माध्यम से प्रतिदिन करीब 50 से 80 साड़ियां बेच लेती हैं और त्यौहारों के दिनों में तो यह संख्या बढ़कर 100 से भी ऊपर का आंकड़ा पार कर लेती है। बेहतरीन बात ये है कि वर्ष 2016-17 के दौरान प्रिया का कुल कारोबार 2.4 करोड़ रुपये का रहा।

शनमुगा प्रिया
शनमुगा प्रिया
"प्रिया को अपनी सास से प्रेरणा मिली जो घर-घर जाकर साड़ियां बेचने का काम करती थीं। वर्ष 2014 में उनकी सास का अचानक निधन हो गया, जिसके चलते प्रिया को परिवार की देखभाल के लिये अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी और परिवार की आर्थिक मदद करने के इरादे से उन्होंने बेचने के लिये कुछ साड़ियां मंगवाईं। क्या पता था कि शुरूआत इतनी आगे तक जायेगी।"

सिर्फ मैसेजिंग एप व्हाट्ज़एप का इस्तेमाल कर एक महिला बीते तीन से भी अधिक सालों से साड़ियां बेच रही हैं और 3,000 से अधिक रिसेलरों का एक वृहद नेटवर्क तैयार कर चुकी हैं। सोशल मीडिया एक दोधारी तलवार है। समझदारी से इसका इस्तेमाल करें तो आप नकारात्मकता से खुद को दूर रख सकते हैं, जिसके परिणाम ईनाम के तौर पर सामने आयेंगे। कुछ ऐसा ही अनुभव किया शनमुगा प्रिया ने जब उन्होंने व्हाट्सएप का इस्तेमाल कर आॅनलाइन साड़िया बेचनी शुरू कीं। 

व्हाट्ज़एप द्वारा किये गए एक अध्ययन के मुताबिक बीते तीन सालों में प्रिया अबतक 400,000 डाॅलर की साड़ियां बेच चुकी हैं। ऐसा करते हुए वे न सिर्फ अपने जीवन में ही समृद्धि लाने में सफल रही हैं बल्कि उन्होंने ऐसी कई अन्य महिलाओं को रिसेलर बनाकर उनका जीवन संवारने में भी मदद की है जो अब तक दो जून की रोटी के लिये दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर थीं।

चेन्नई की रहने वाली प्रिया प्रतिदिन करीब 50 से 80 साड़ियां बेच लेती हैं और त्यौहारों के दिनों में तो यह संख्या बढ़कर 100 से भी अधिक के आंकड़े को पार कर लेती है। वर्ष 2016-17 के दौरान उनका कुल कारोबार 2.4 करोड़ रुपये का रहा। प्रिया कहती हैं, "दीपावली जैसे त्यौहारों के समय हमारी बिक्री में काफी वृद्धि देखने को मिलती है (हमने पिछले महीने ही 22 लाख रुपये की बिक्री की है)। आॅफ-सीजन के दौरान हमारी बिक्री 12 से 15 लाख रुपये प्रतिमाह के आसपास रहती है।" कुल मिलाकर उनके पास सात से 10 प्रतिशत का प्राॅफिट मार्जिन होता है। थोक की बिक्री में वे सात प्रतिशत का मार्जिन रखती हैं जबकि रिसेलरों के लिये दस प्रतिशत का।

वर्ष 2014 में परीक्षण के तौर पर परिजनों और दोस्तों के एक व्हाट्ज़एप ग्रुप के जरिये सबसे पहले 20 साड़ियों की बिक्री के साथ शुरू हुआ सफर आज एक सफल व्यापार का रूप ले चुका है। यहां तक कि प्रिया ने अब खुद ही साड़ियों के निर्माण का काम शुरू कर दिया है और अब वे सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि अमरीका, ब्रिटेन और आॅस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी साड़ियों की आपूर्ति कर रही हैं। प्रिया की कंपनी, यूनीक थ्रेड्स ने दो बुनकरों को भी काम पर रखा हुआ है जो उनके डिजाइनों के आधार पर साड़ियों को बुनते हैं। वे कहती हैं, "बीते कुछ सालों में मैं यह सीखने में सफल रही हूं कि बाजार में क्या बिकेगा और रंगों का क्या महत्व है। अपने इसी अनुभव के आधार पर मैं इनमें से कुछ साड़ियों को तैयार करवाती हूं। मेरा पूरा ध्यान हमेशा गुणवत्ता और सही रंगों के चयन पर रहता है।"

आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है

प्रिया को अपनी सास से प्रेरणा मिली जो घर-घर जाकर साड़ियां बेचने का काम करती थीं। वर्ष 2014 में जब उनका बेटा सिर्फ तीन महीने का था तभी उनकी सास का अचानक निधन हो गया, जिसके चलते प्रिया को परिवार की देखभाल के लिये अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। लेकिन अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के इरादे से उन्होंने बेचने के लिये कुछ साड़ियां मंगवाईं। एमएनसी कंपनी में नौकरी करने वाले उनके पति ने प्रिया की पूरी मदद और समर्थन किया। वे कहती हैं, "शुरू में मिली प्रतिक्रिया बिल्कुल भी सकारात्मक नहीं थी। यहां तक कि अपनी माँ से मिलने जाते समय भी मैं अपने बच्चे के साथ साड़ियों से भरा थैला लेकर जाती थी। लोग अक्सर मुझसे पूछते थे कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं। लेकिन एक बार काम चल निकलने के बाद लोगों की राय बदल गई। अब वे अपना व्यापार शुरू करने के इरादे से मेरी मदद मांगने आते हैं।"

#SareeNotSorry

जब प्रिया ने व्हाट्ज़एप पर शुरुआत की, तो उस समय उनसे साड़ियां खरीदने वालों में अधिकांशतः उनके मित्र और परिवार वाले ही थे। जैसे-जैसे लोगों को इस बारे में पता चलना शुरू हुआ, अधिक से अधिक महिलाओं ने सीधे उनसे साड़ियां खरीदनी शुरू कर उन्हें आगे बेचने का काम शुरू किया। अनजाने में ही वे धीरे-धीरे महिला रिसेलरों का एक पूरा तंत्र विकसित कर रही थीं। आज की तारीख में वे 2,000 से भी अधिक रिसेेलरों को साड़ियां और कपड़ा बेच रही हैं। प्रिया बताती हैं, "मैंने दोस्तों और परिजनों के ग्रुप से प्रारंभ किया और फिर मौखिक प्रचार के चलते मेरे पास अधिक लोग जानकारी के लिये आने लगे। इसके बाद मैंने व्हाट्सएप विक्रेताओं के लिये एक फेसबुक पेज भी शुरू किया। मेरा दांव बिल्कुल ठीक पड़ा और आज इस पर 70,000 से भी अधिक विक्रेता मौजूद हैं।"

सिर्फ इतना ही नहीं है, आज की तारीख में प्रिया करीब 11 व्हाट्ज़एप ग्रुप का संचालन करती हैं और जो लोग व्हाट्सएप पर मौजूद नहीं हैं उनसे संपर्क के लिये वे टेलीग्राम का इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा उनके पास आठ ऐसे लोगों की एक पूरी टीम मौजूद है जो फेसबुक ग्रुप के जरिये साड़ियों की बिक्री का काम देखते हैं, जहां से उनके अधिकांश आॅर्डर आते हैं।

तेजी से बढ़ती मांग और विकास

व्यापार के बढ़ने के साथ ही प्रिया ने अपने घर की पहली मंजिल को गोदाम में बदल दिया, जिसमें खरीददारों के लिये एक बिल्कुल अलग प्रवेश द्वार है ताकि जो खरीददार आकर माल देखना चाहते हैं वे ऐसा आसानी से कर सकें। वे आम लोगों को इक्का-दुक्का साड़ियां नहीं बेचती हैं लेकिन कहती हैं, "जब बात पड़ोसियों और जानने वालों की आती है तो मैं अमूमन ना नहीं कहती हूं।"

एक बार आॅर्डर मिलने के बाद, उनकी टीम सक्रिय हो जाती है और प्रतिदिन शाम को छः बजे पैकेज आगे भेजे जाने को तैयार होते हैं। वे कहती हैं, "हमनें विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिये सेवा और प्रतिष्ठा के आधार पर विभिन्न रसद/कोरियर कंपनियों के साथ साझेदारी की हुई है।"

प्रतियोगिता में आगे

बीते दो सालों में कई अन्य रिसेलरों के बाजार में उभर कर आने के बाद प्रिया को काफी कुछ नया करना पड़ा है। उन्होंने अपने उत्पादों की उच्च गुणवत्ता को सुनिश्चित कर प्रतिस्पर्धा का बखूबी सामना किया है। इसके अलावा उन्होंने अपने उपभोक्ताओं को उत्पाद पसंद न आने पर उसे वापस करने की सुविधा भी दी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक उनके रिसेलरों को उपभोक्ताओं से पैसा नहीं मिलता है तब तक वे उनसे पैसा न लेकर एक तरीके से उन्हें आर्थिक सहायता भी देती हैं। प्रिया बताती हैं, "कई बार ऐसा होता है कि वे लोग भुगतान करने में सक्षम नहीं होती हैं क्योंकि उन्हें उपभोक्ताओं से पैसे नहीं मिले होते हैं। ऐसे में मैं उनके लिये थोड़ा लचीलापन लाती हूं। ऐसा करके मैं प्रतिस्पर्धा में आगे रहती हूं, क्योंकि इसके चलते लोग दोबारा मेरे पास वापस आते हैं और मेरे इस कदम की सराहना भी करते हैं।" 

प्रिया को अपनी टीम पर काफी फक्र है और वो कहती हैं, "मेरे साथ चार साल पहले काम शुरू करने वाले लोग आज भी मुझसे जुड़े हुए हैं। मुझे इस बात की काफी खुशी है कि मैं अन्य महिलाओं की सहायता कर पाने में सक्षम हूं। मुझे सबसे ज्यादा इस बात की खुशी है कि मेरे मौके पर मौजूद रहे बिना भी काम सुचारू रूप से चलता रहता है।"

वे इस बात से काफी खुश हैं कि वे अपने परिवार को पूरा समय दे पाने के साथ ही अन्य महिलाओं को भी घर बैठे साड़ियां बेचकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में सहायता कर पा रही हैं। यहां पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा महिलाएं घर बैठे कर पा रही हैं और काम और परिवार दोनों को अपना समय बराबरी से बांट पा रही हैं।

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