बंटवारे के वक्त मुल्क छोड़ गए मोहन कैसे बने अरबपति! 

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जब कोई कपड़े की एक मामूली सी दुकान से बिजनेस बढ़ाते-बढ़ाते सवा सौ अरब से अधिक का कारोबारी हो जाए, निश्चित ही संदेश मिलता है कि उसका बिजनेस कड़ी तपस्या का फल है। 'तोलाराम ग्रुप' के चेयरमैन मोहन वासवानी अपने पुरखों की उसी तपस्या को आज दुनिया के तमाम देशों में फैला चुके हैं। वह तरह-तरह के कारोबार में आगे बढ़ते जा रहे हैं। ग्रुप की कुल पूंजी 13,320 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है।

मोहन वासवानी मौजूदा समय में तोलाराम ग्रुप के चेयरमैन हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता ने कभी उनसे कहा था, 'तोलाराम ग्रुप' एक दिन पूरी दुनिया के तमाम देशों में फैल जाएगा।

जिस वक्त सन् 1947 में हिंदुस्तान का बंटवारा हो रहा था, मूल रूप से सिंधी मोहन वासवानी अपने पिता खानचंद के साथ सिंध प्रांत से इंडोनेशिया चले गए थे। वहां जावा द्वीप पर मलंग में उनके पिता ने अपनी एक दुकान खोल ली। उस समय मोहन वासवानी के बचपन के दिन थे। वह 1955 का साल था, जब वह टेक्सटाइल के मामूली से कारोबार में अपने पिता का हाथ बंटाने लगे। लगभग बीस साल की उम्र में तो वह पिता का पूरा कारोबार संभालने में जुट गए थे। उसी वक्त इस कारोबारी समूह का नाम रखा गया 'तोलाराम ग्रुप'। मोहन के दादा का नाम वैद्य सेठ तोलाराम वासवानी है। आज उनकी कंपनी दादा तोलाराम वासवानी के ही बताए आदर्शों पर काम कर रही है। पिता की विरासत ('तोलाराम ग्रुप') को बड़ा करते हुए उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका तक अपने बिजनेस का विस्तार कर दिया।

आज विश्व के 75 देशों में उनकी कंपनी 'तोलाराम ग्रुप' के तरह-तरह के कारोबार हैं, जिसका सालाना टर्नओवर 13,320 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। मोहन वासवानी के परिवार के लोग भी भले ही उसे संभालने में व्यस्त रहते हों, उनके हर तरह के कारोबार की प्रमुख जिम्मेदारियां पेशेवर लोगों पर रहती हैं। वासवानी का मानना है कि परिवार के लोगों के पास हिस्‍सेदारी है लेकिन काम का जिम्‍मा पेशेवर लोगों के पास है। इसकी वजह साफ है। कारोबार में कोई चूक हो जाने पर पेशेवर बाहरी व्यक्ति को काम से हटाया जा सकता है लेकिन अगर किसी परिजन से ऐसा हो जाए तो उसे हिस्सेदारी से अलग न कर पाना उनकी मजबूरी होती है।

मोहन वासवानी मौजूदा समय में तोलाराम ग्रुप के चेयरमैन हैं। वह बताते हैं कि उनके पिता ने कभी उनसे कहा था, 'तोलाराम ग्रुप' एक दिन पूरी दुनिया के तमाम देशों में फैल जाएगा। इस समय 'तोलाराम ग्रुप' का मुख्‍यालय सिंगापुर में है। ग्रुप अठारह तरह के बिजनेस कर रहा है। इस ग्रुप का इंडोनेशिया में बैंक, नाइजीरिया में बंदरगाह का निर्माण, एस्‍तोनिया में कागज की फैक्ट्री, अफ्रीका में खाद्य निर्माण और वितरण, इंडिया में बिजली सप्‍लाई का बिजनेस है। 'तोलाराम ग्रुप' अब डिजीटल कारोबार भी कर रही है।

ग्रुप ने तुनैकु के नाम से ऑनलाइन लोगों को कर्ज देने का बिजनेस भी शुरू किया है। ग्रुप ने अब तक लोगों को एक लाख करोड़ रुपए के लोन दिए हैं। सन् उन्नीस सौ सत्तर के दशक में पहली बार मोहन वासवानी ने इंडोनेशिया के बाहर अपनी कंपनी के कारोबार का विस्तार किया। उस समय कंपनी में कुल एक हजार कर्मचारी काम करते थे। इस समय ग्रुप के कर्मचारियों की संख्या दस हजार हो चुकी है। तोलाराम ग्रुप के सीईओ एवं मोहन वासवानी के भतीजे सजेन असवानी बताते हैं कि पिछले सत्तर साल में उनके ग्रुप ने अलग-अलग सौ तरह के कारोबारों में हाथ अजमाया है। इनमें से पचहत्तर प्रतिशत बिजनेस फेल हो गए लेकिन जो पचीस फीसद कारोबार बचा, वही आज इस मोकाम पर है।

मोहन वासवानी एवं उनके परिजनों का कहना है कि सत्तर साल पुरानी परंपराओं और जड़ों से जुड़े रहने की वजह से ही आज उनके ग्रुप को इतनी बड़ी सफलता मिली है। उनका ग्रुप बिजनेस के नए अवसर मिलते ही बड़े से बड़ा रिस्क लेने को तैयार रहता है। वह पूरे सिंधी समुदाय को बिजनेस में दक्ष मानते हैं। उनका कहना है कि खुद का बिजनेस, काम-धंधे के लिए पर्याप्त धन- संसाधन न होने पर भी इस समुदाय के लोग किसी और के लिए काम करने की बजाय खुद का बिजनेस शुरू करना पसंद करते हैं। तोलाराम ग्रुप से जुड़ी उनकी कंपनी नाईजीरिया में पोर्ट बना रही है। ग्रुप की हेज फंड में निवेश की भी योजना है। एस्टोनिया में ग्रुप का पेपर प्रोडक्शन का कारोबार है। इंडोनेशिया में एक बैंक का संचालन किया जा रहा है।

पूरे अफ्रीका में फूड प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन का बिजनेस आज वहां के ऐसे कारोबार में अग्रणी है। मोहन वासवानी कहते हैं कि आज दुनियाभर में उनके ग्रुप का सिक्का चलता है। उनका परिवार सिंगापुर में बस जाने के बावजूद वह उनके पुरखों का जुनून ही था कि जोखिम उठाने की हिम्मत और मेहनत-मशक्कत से तोलाराम ग्रुप का इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा हो सका है। उन्होंने 1957 में दस वर्ष की उम्र में अपने पारिवारिक बिजनेस में हाथ बंटाना शुरू किया था। धीरे-धीरे उनकी छोटी सी टेक्सटाइल शॉप बड़े रिटेल बिजनेस में तब्दील हो गई। उसके बाद तोलाराम ग्रुप फैब्रिक और गारमेंट के होलसेल और ट्रेडिंग का बिजनेस करने लगा। सन् 1968 में सिंगापुर में कंपनी का ऑफिस स्थापित किया गया था। बड़ा होते ही उन्होंने स्वयं पूरे ग्रुप का काम-काज अपने हाथों में ले लिया।

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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