छत्तीसगढ़: दंतेवाड़ा में कलेक्टर सौरभ कुमार ने बदल दी सरकारी स्कूलों की तस्वीर

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छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित जिलों में से एक दंतेवाड़ा भारत के पुराने आदिवासी इलाकों में गिना जाता है। यह जिला अपने लोक नृत्य, अपने मधुर लोक गीतों की वजह से कभी जाना जाता था, लेकिन 80 के दशक में यहां माओवादियों के बढ़ते प्रभाव के कारण इसकी छवि धूमिल होती गई। हिंसा और आतंक के साये में मजबूर यह जिला अब फिर से प्रगति की राह पर चल निकला है और इसका श्रेय जाता है 2009 बैच के आईएएस ऑफिसर सौरभ कुमार को।

जिले के कलेक्टर सौरभ कुमार इस जिले में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जी जान से जुटे हैं। दंतेवाड़ा जिले का चार्ज मिलने के बाद ही सौरभ कुमार ने बदलाव की कमान संभाल ली थी।

छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित जिलों में से एक दंतेवाड़ा भारत के पुराने आदिवासी इलाकों में गिना जाता है। भारत के सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण के नायक भगवान राम ने यहाँ अपना वनवास काटा। इस क्षेत्र को रामायण में दंडकारण्य कहा गया जो भगवान राम की कर्मभूमि रही। यह जिला अपने लोक नृत्य, अपने मधुर लोक गीतों की वजह से कभी जाना जाता था, लेकिन 80 के दशक में यहां माओवादियों के बढ़ते प्रभाव के कारण इसकी छवि धूमिल होती गई। हिंसा और आतंक के साये में मजबूर यह जिला अब फिर से प्रगति की राह पर चल निकला है और इसका श्रेय जाता है 2009 बैच के आईएएस ऑफिसर सौरभ कुमार को।

दंतेवाड़ा जिला 1998 में अस्तित्व में आया, इससे पहले यह बस्तर जिले के अंतर्गत एक तहसील भर था। यह बस्तर का दक्षिणी हिस्सा है और यहाँ बस्तरिया संस्कृति अब भी अपने शुद्ध रूप में पूरी तरह से मौजूद है। यद्यपि भौगोलिक रूप से दुर्गम होने की वजह से यह हिस्सा लंबे समय तक बाहरी दुनिया से कटा रहा। फिर भी जिले भर में बिखरे ऐतिहासिक साक्ष्य और मंदिर इतिहास प्रेमियों और शोधवेत्ताओं को दुर्गम रास्तों के बावजूद यहाँ तक खींच लाए और इन्होंने यहाँ की समृद्ध विरासत के प्रति समझ बढ़ाने में बड़ा कार्य किया।

जिले के कलेक्टर सौरभ कुमार इस जिले में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए जी जान से जुटे हैं। दंतेवाड़ा जिले का चार्ज मिलने के बाद ही सौरभ कुमार ने बदलाव की कमान संभाल ली थी। उस वक्त जिले में न तो ढंग की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध थीं और न ही स्कूलों में शिक्षक। स्थानीय युवा शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण के आभाव में बेरोजगार घूमते थे तो वहीं इलाज के लिए लोगों को दूसरे जिलों में जाना पड़ता था। इसके साथ ही माओवादियों की हिंसा से जिला प्रभावित था ही।

आने वाली पीढ़ियों को अच्छी सुविधा देने और उनका भविष्य सुधारने के लिए सौरभ कुमार ने योजना बनाई और इस स्थिति को बदलने का संकल्प ले लिया। उन्हें लगा कि अगर बच्चों को सही शिक्षा मिलने लगे तो न वे माओवाद की तरफ जाएंगे और न उनका भविष्य बर्बाद होगा। सौरभ ने दंतेवाड़ा जिले में हायर सेकेंड्री स्कूलों को सुधारने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया। वे स्कूलों में जाने लगे और वहां बच्चों के साथ घंटों बातें करते। वे उन्हें सही रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शन देते।

सौरभ जिला मुख्यालय पर ही 'लन्च विद कलेक्टर' नाम से एक कार्यक्रम आयोजित करवाते जिसमें 50-100 बच्चों को बुलाकर उनसे वार्तालाप करते। इससे उन्हें पता चलता कि बच्चों को कौन-कौन सी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं और उनकी आकाक्षांए क्या हैं। वे अपने अधिकारियों से एक एक बच्चे की दिक्कतें नोट करवाते थे। इसके बाद वे हर एक समस्या को सुलझाने के रास्ते निकालते। इस नक्सल इलाके के बच्चों को पढ़ाई और करियर के बारे में कुछ मालूम ही नहीं था। कलेक्टर सौरभ बच्चों को तमाम करियर विकल्पों से रूबरू करवाते।

इस सेशन के बाद सौरभ सभी बच्चों के साथ भोजन भी करते थे। इस पहल से न केवल बच्चों के भीतर पढ़ाई के प्रति प्रेम जगा बल्कि उनके अंदर एक अलग तरह का आत्मविश्वास आ गया। इतना ही नहीं सौरभ हर 15 दिन पर बच्चों के माता-पिता और अध्यापकों के साथ बैठक करते हैं। इस बैठक से उन्हें पता चलता है कि बच्चों की प्रगति के लिए कौन से प्रयास किए जाने जरूरी हैं। कलेक्टर सौरभ की इस पहल से ग्रामीण उन पर विश्वास करने लगे। अपने कामों से सौरभ दंतेवाड़ा को विकास के रास्ते पर तो ले ही जा रहे हैं साथ ही वे देश के तमाम आईएएस अधिकारियों के लिए एक प्रेरणादायक नजीर पेश कर रहे हैं।

उन्होंने नोटबंदी के वक्त नक्सल प्रभावित पालनार गांव को कैशलेस बना दिया। यह एक ऐसा इलाका था जहां ढंग की सेल्युलर कनेक्टिविटी भी नहीं थी। लेकिन उनका काम बताता है कि अगर नीयत सही विकास करने की हो तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है। उनके इन्हीं सब कदमों के लिए 2017 में उन्हें प्राइम मिनिस्टर द्वारा पुरस्कृत भी किया गया।

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