जगमगा उठीं झालरें, जाग उठे बाजार

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दशहरा हो, दीपावली, होली हो या ईद, क्रिसमस के दिन। समाज के मन में जब भी सामूहिक उल्लास का मौसम आता है, दृष्टि कहीं की कहीं अस्त भी, व्यस्त भी हो जाती है। विवेक, यानी विचार मद्धिम होने लगते हैं, व्यवहार में आत्मसुख की तड़प बेकाबू सी हो जाती है। नवरात्र के दिनो में किसी भी बाजार के चौराहे पर, गली में गुजरते हुए कुछ ऐसा ही हर मौके-दर-मौके।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
छोटी फैंसी चुनरी बीस फीसद तक महंगी, 20 रुपए से लेकर 250 रुपए तक, मेवे की कटोरी के दाम आसमान पर, देसी घी 440 से 500 रुपए तक और काला चना 70 रुपए किलो। बेचने वाले चाहे जितनी तसल्ली में, खुशहाली में लेकिन आस्था कि किताब के पन्ने बाजार क्यों चिंदी-चिंदी उड़ा रहा है आज।

आ गए अच्छे कारोबार के दिन। बाजार में उत्पादों पर अलग-अलग ऑफर। तरह-तरह के लुभावने उपहार। कहीं सोने के सिक्का, तो कहीं मोबाइल के पावर बैंक। इलेक्ट्रानिक से ऑटो मोबाइल, ज्वेलरी, रेडीमेट गारमेंट्स, बर्तन की दुकानों तक व्यापारी मालामाल। चलो, नोटबंदी, फिर बीएस-4 इंजन, फिर जीएसटी का झटका इधर से उधर तो हुआ। 

दशहरा हो, दीपावली, होली हो या ईद, क्रिसमस के दिन। समाज के मन में जब भी सामूहिक उल्लास का मौसम आता है, दृष्टि कहीं की कहीं अस्त भी, व्यस्त भी हो जाती है। विवेक, यानी विचार मद्धिम होने लगते हैं, व्यवहार में आत्मसुख की तड़प बेकाबू सी हो जाती है। नवरात्र के दिनो में किसी भी बाजार के चौराहे पर, गली में गुजरते हुए कुछ ऐसा ही हर मौके-दर-मौके। पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी, दो अक्तूबर, चौदह सितंबर जैसी यादगार तिथियां भी, हमे उनकी खासियत में डूबने, सीखने की बजाय, जैसे खुलकर अवकाश मनाने जैसे दिनो में तब्दील हो जाया करती हैं। तिरंगे को सैल्यूट करने के लिए वक्त नहीं होता हमारी दिनचर्या में, लेकिन किसी मनोरंजन स्थल पर झूमा-झटकी के लिए उसी बहाने कई-कई दिन हम किलोलें मचाते हुए गुजार लेते हैं। 

इन मनःस्थितियों के पीछे और कुछ नहीं, वही विवेक और मन की अलग-अलग आजादी और नैतिकता के अनुशासन का प्रश्न होता है, जिसे आदमी अनायास भरपूर आत्मकेंद्रित होने के नाते सामान्य दिनचर्या में अपने कार्यकलापों अथवा गतिविधियों को जीवन मूल्यों की प्राथमिकता से परे रख देता है। सोचता है, इस तनाव भरे दौर में, चलो न, आज जी भर स्वाधीन हो लें, जीवन के ये पल अपनी अभिरुचि भर जी लें। पहले भी ऐसा होता रहा है। कल शाम जब बाजारों से गुजरना हो रहा था, ऐसे कई दृश्य आंखों के सामने से बीतते गए, जो सवालों की तरह चुभने लगे कि देखो न, बाजारों में किस कदर भीड़ है। लोग एक-पर-एक गिरे जा रहे हैं। तो माजरा क्या है। बात और कोई नहीं, नवरात्र के दिन आ रहे हैं आने वाली सुबह से। आस्था बाजार में उतर पड़ी है।

हर किसी ऐसे मौके पर ऐसा होता ही होता है, जोकि पहले के जमाने में इस कदर अस्तव्यस्त सा नहीं होता था। तो बाजार से गुजरते हुए जो अपने आसपास से, ग्राहकों, दुकानदारों से सुनता-सोचता जा रहा था, कि वाह, नवरात्र की पूर्व संध्या पर बाजारों के इतने रंग! जैसे कोई कैमरा इन शब्दों को बरबस मन की किताब में उतारता जा रहा था कि बेचारी दुनिया की जीएसटी ने क्या गत बना दी, पूजा पाठ के लिए हवन सामग्री, देवी मां की चुनरी, फल, सब्जियां, मिष्ठान्न, आराधना के नाना प्रकार के सामना यक-ब-यक लोगों की जेब पर कहर बनकर कैसे टूट रहे। आस्था इतनी बेकाबू सी क्यों हो चली है। 

छोटी फैंसी चुनरी बीस फीसद तक महंगी, 20 रुपए से लेकर 250 रुपए तक, मेवे की कटोरी के दाम आसमान पर, पानी वाला नारियल 35 रुपए में, सूखा नारियल 20 रुपए में, सिंघाड़े का आटा 55 से बढ़ कर 60-70 रुपए किलो, व्रत वाले चावल 70 से 80 रुपए किलो, देसी घी 440 से 500 रुपए तक और काला चना 70 रुपए किलो। बेचने वाले चाहे जितनी तसल्ली में, खुशहाली में लेकिन आस्था कि किताब के पन्ने बाजार क्यों चिंदी-चिंदी उड़ा रहा है आज। हां, दुकानदारों की इतनी तसल्ली का राज समझ में आया कि इस बार चाइना का सामान लापता। तो देसी बिक्री के हौसले बुलंदी पर। फल मंडी की ओर रुख किया, क्या देख-सुन रहा कि केला 70 रुपये दर्जन सेब डेढ़, पौन दो सौ रुपए किलो, कुट्टे का आटा बीस रुपये और भारी तो नारियल 40 से 50 रुपए किलो, संतरा 80 से एक सौ रुपये, चीकू 60 से 80 रुपये पहुंच गया है और पपीता 40 से 60, अमरूद 30 से 45 पर।

तो आ गए अच्छे कारोबार के दिन। बाजार में उत्पादों पर अलग-अलग ऑफर। तरह-तरह के लुभावने उपहार। कहीं सोने के सिक्का, तो कहीं मोबाइल के पावर बैंक। इलेक्ट्रानिक से ऑटो मोबाइल, ज्वेलरी, रेडीमेट गारमेंट्स, बर्तन की दुकानों तक व्यापारी मालामाल। चलो, नोटबंदी, फिर बीएस-4 इंजन, फिर जीएसटी का झटका इधर से उधर तो हुआ। ज्वेलर्स के बिछुए, पायल, शाव के बच्चे, सोने चांदी के सिक्के, मूर्तियां उड़ने लगीं। हीरो के स्कूटरों पर 3000 हजार की छूट या फिर 75 ग्राम चांदी का सिक्का उपहार में। यामाहा एक स्क्रेच कार्ड के जरिये सोने का सिक्का, एलइडी, लैपटॉप, स्मार्टफोन सहित 10 आइटम ऑफर में। 

 टीवीएस शोरूम भी ऑफरों के गुल्लक से खुशहाल। सोनी इलेक्ट्रानिक्स शोरुम में सभी तरह के उत्पादों हेड फोन, स्पीकर, पावर बैंक, पैनड्राईव आदि पर अलग अलग गिफ्ट। गारमेंटस पर पहले से अधिक डिस्काउंट। वाह-वाह। और आज तड़के सुबह क्या देखा कि झालरों की रोशनी से मंदिर सराबोर। बाजारों से देवालयों तक भरपूर रौनक, फलाहारियों का शोर, मंत्रों की बुदबुदी, चकाचौंध। सड़कों के किनारे देवी मां के श्रृंगार, माला, अखंड जोत, मूर्तियां, चोया, कपूर, लौंग, फलाहार की सामग्रियों से लदी-फदी दुकानें। इतनी बेसुधी तो कल शाम तक नहीं थी। कल का दिन कुछ और था हिसाब-किताब लगाकर चलने वाले काइयां बाजार के लिए। क्योंकि अगले नौ दिन पूजा-पाठ के, तो क्यों न हो आमिष-निरामिष का द्वंद्व।

बीती देर रात तक देखा, उछल पड़ा कि ये क्या भाई, इतनी धकम-पेल क्यों यहां, उधर, और उधर। चांदी के सिक्कों में उछाल तो समझ में आ रहा मगर इस मीट मार्केट की चुहल का सबब क्या है? श्राद्ध और नवरात्र के बीच सिर्फ चंद घंटों का समय मिला तो मदिरा प्रेमियों की शराब की दुकानों पर भी भीड़ उमड़ पड़ी। एक ही दिन में शराब की सामान्य से तीस प्रतिशत ज्यादा बिक्री। तो पता चलते देर न लगी कि नवरात्रा आ रहा है जी, सुबह से, इतना भी मालूम नहीं क्या! पितृ पक्ष में 15 दिन से तरस रहे तरस-तड़प रहे थे। 

बुधवार आया तो बस तेरह घंटे की मोहलत लेकर, आगे नौ दिन नवरात्र रहेगा। तो मीट मार्केट के कारोबार का ग्राफ 50 फीसदी तक उड़ान पर। शौकीनों की भीड़, मांसाहारी होटलों पर बेशुमार रौनक। डटकर मटन-चिकन उड़ाते लोग। कच्चे मीट का फुटकर बाजार फिर भी सन्नाटे में। क्योंकि घर पर मीट बनाने से परहेज इस रात। तो इस तरह लाखों-करोड़ों में खुलकर खेला मीट मार्केट भी। कनागत और नवरात्र पर मीट कारोबार हिल जाता है। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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