मैं तन से भोगी और मन से योगी: गोपालदास नीरज

हमें अकेला छोड़ गए कवि नीरज, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी...  

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'ए भाई जरा देख के चलो', 'जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाएं, जैसी मशहूर पंक्तियां लिखने वाले देश के प्रतिष्ठित हिंदी कवि गोपालदास नीरज का गुरुवार को दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में देहांत हो गया। वे काफी दिनों से गंभीर रूप से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्हें ऑक्सीजन पर रखा गया था। उनके फेफड़ों में फंगस का संक्रमण होने से मवाद पड़ गया था। उन्हें बेहतर उपचार के लिए दिल्ली स्थित एम्स ले जाया गया। इसके पहले तक उनका उपचार आगरा के लोटस हॉस्पिटल में चल रहा था। 

गोपालदास नीरज
गोपालदास नीरज
नीरज की कविताई में रूमानियत की ऐसी कई मिसालें हैं। नीरज के दिमाग में अपनी एक मोबाइल डायरेक्टरी है। वह आपसे मिलेंगे, आपका फोन नंबर पूछेंगे और उसे याद कर लेंगे। कहीं लिखने की जरूरत नहीं है।

कई पीढ़ियों के दिलों को एक साथ गुनगुनाहट की वजह देने वाले कवि गोपालदास नीरज का 93 वर्ष की उम्र में देहांत हो गया। अपने समय का महान कवि अपना कारवां लेकर आगे बढ़ गया लेकिन उनका गुबार सदियों तक कायम रहेगा। सिर से पांव तक खुद को ढके नीरज को लगभग हर रोज दवाई खानी पड़ती रही है। बावजूद इसके वह इन बातों से घबराये नहीं। बीमारी की हालत में उन्होंने कहा था, 'मैं तो पैदा ही बीमार हुआ था, इसलिए आज भी बीमार हूं। मैं तन से भोगी और मन से योगी रहा हूं। इसीलिए तन कष्ट में है, लेकिन मन आज भी मुक्त है, जैसे हमेशा से था। उन्होंने अभी अपनी कालजयी रचना नहीं लिखी। वह इसे अपनी अंतिम इच्छा भी मानते हैं। कहते हैं, बस शरीर थोड़ा साथ दे दे तो अपनी कालजयी रचना लिख लूं।'

गोपालदास नीरज हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे। वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। कवि नीरज को मूलतः उनके मशहूर गीतों की वजह से जाना जाता है लेकिन कम लोगों को पता है कि उन्होंने खूबसूरत दोहे भी लिखे हैं -

कवियों की और चोर की गति है एक समान।
दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान।।
दोहा वर है और है कविता वधू कुलीन।
जब इसकी भाँवर पड़ी जन्मे अर्थ नवीन।।
जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल।
जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल।।
भूखा पेट न जानता क्या है धर्म-अधर्म।
बेच देय संतान तक, भूख न जाने शर्म।।
दूरभाष का देश में जब से हुआ प्रचार।
तब से घर आते नहीं चिट्ठी पत्री तार।।
भक्तों में कोई नहीं बड़ा सूर से नाम।
उसने आँखों के बिना देख लिये घनश्याम।।
ज्ञानी हो फिर भी न कर दुर्जन संग निवास।
सर्प सर्प है, भले ही मणि हो उसके पास।।

नीरज ने मेरठ कॉलेज मेरठ में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया किन्तु कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएँ न लेने व रोमांस करने के आरोप लगाये गये जिससे कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे। कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को बम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में नई उमर की नई फसल के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा, बेहद लोकप्रिय हुए, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे।

फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा। बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका जी बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये। नीरज की कविताई में रूमानियत की ऐसी कई मिसालें हैं। नीरज के दिमाग में अपनी एक मोबाइल डायरेक्टरी है। वह आपसे मिलेंगे, आपका फोन नंबर पूछेंगे और उसे याद कर लेंगे। कहीं लिखने की जरूरत नहीं है। उनके आस-पास के लोगों के लिए यह अचम्भे जैसा है। लोग कहते हैं कि बाबूजी को करीब 1,200 नंबर जुबानी याद हैं। कहीं रूठना है, कहीं मनुहार, कहीं गोरी के रूप का बखान है तो कहीं पुरवाई की महक।

इन सबके साथ इसी तर्ज पर बुने गए फिल्मी गानों की भी लंबी फेहरिस्त है। यही वजह है कि नीरज को इस सदी के महान श्रृंगार कवियों में से एक माना जाता है लेकिन नीरज इस उपाधि को स्वीकार नहीं करते। वह कहते हैं कि प्रेम कविताओं को लोकप्रियता ज्यादा मिली है, मगर उनसे इतर भी मैंने बहुत कुछ लिखा है। मैंने शृंगार के प्रतीक से लेकर दर्शन लिखा है। नीरज ने भले अपने प्रेम गीतों से हिंदी साहित्य को आकाश सा विस्तार दिया हो, गीत या दोहे ही नहीं, ग़ज़लों में भी उन्होंने खूब हाथ आजमाए हैं-

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यूँ ये समझने के लिए
हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए।
जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
गीत उन्मन है ग़ज़ल चुप है रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए।

उनके कहे गए मुक्तक की तो बात ही क्या है। नीरज के मुक्तक बेहिसाब सराहे गए। इसका एक कारण नीरज की मिली जुली गंगा जमुनी भाषा थी जिसे समझने के लिए शब्दकोष उलटने की जरूरत नहीं थी। इसमें हिंदी का संस्कार था तो उर्दू की ज़िंदादिली। इन दोनों खूबियों के साथ नीरज के अंदाजे बयाँ ने अपना हुनर दिखाया और उनके मुक्तक भी गीतिकाओं के समान यादगार और मर्मस्पर्शी बन गए। 'कारवां गुजर गया...' जैसी काव्य रचनाएं और 'शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब...' जैसे फिल्मी गीत लिखने वाले कवि गोपालदास नीरज को फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के गाने के लिए साल 1972 में फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था।

नीरज को खुद एहसास है अपने कीमती होने का, इसीलिए उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्होंने अपनी चंचलता.. चपलता... रूमानियत और चेहरे की चमक को बाकायदगी से सहेज के रखा। जीने की लालसा के दम पर ही इस बूढ़े कवि ने ई-कविता, यू-ट्यूब पर साहित्य, पुस्तक मेलों और सोशल साइट वाली टीआरपी के वक्त में भी खुद को ओल्ड फैशन्ड होने से बचा लिया। कविताओं से लेकर जीवन तक में नीरज पर प्रेम खूब बरसा है। यहां तक कि मायानगरी भी उनकी दीवानी रही है। लिहाजा प्रेम पर उनकी राय के अपने मायने हैं। उनके एक फिल्मी गीत की पंक्तियां आज हर भारतीय की जुबान पर तैरती रहती हैं -

ऐ भाई! जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी
दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी
ऐ भाई!
तू जहाँ आया है वो तेरा- घर नहीं, गाँव नहीं
गली नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, बस्ती नहीं
दुनिया है, और प्यारे, दुनिया यह एक सरकस है
और इस सरकस में- बड़े को भी, चोटे को भी
खरे को भी, खोटे को भी, मोटे को भी, पतले को भी
नीचे से ऊपर को, ऊपर से नीचे को
बराबर आना-जाना पड़ता है
और रिंग मास्टर के कोड़े पर- कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो पैसा है, कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह-तरह नाच कर दिखाना यहाँ पड़ता है
बार-बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है
गिरने से डरता है क्यों, मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब न खाएगा, पास किसी ग़म को न जब तक बुलाएगा
ज़िंदगी है चीज़ क्या नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है चला जाएगा
कैसा है करिश्मा, कैसा खिलवाड़ है
जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है
खाता है कोड़ा भी रहता है भूखा भी
फिर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है
और इन्साण यह- माल जिस का खाता है
प्यार जिस से पाता है, गीत जिस के गाता है
उसी के ही सीने में भोकता कटार है
हाँ बाबू, यह सरकस है शो तीन घंटे का
पहला घंटा बचपन है, दूसरा जवानी है
तीसरा बुढ़ापा है
और उसके बाद- माँ नहीं, बाप नहीं
बेटा नहीं, बेटी नहीं, तू नहीं,
मैं नहीं, कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ वो- ख़ाली-ख़ाली कुर्सियाँ हैं
ख़ाली-ख़ाली ताम्बू है, ख़ाली-ख़ाली घेरा है
बिना चिड़िया का बसेरा है, न तेरा है, न मेरा है

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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