दाम के लिए जानबूझ कर बदनाम हो रहे भंसाली!

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चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद जानवर को चिढ़ाना कभी-कभी दर्शक को भारी पड़ जाता है। सच पूछिए तो भंसाली, प्रकाश झा और उनके जैसे फिल्म निर्माता-निर्देश इस देश के करोड़ो-करोड़ फिल्म दर्शकों की मासूमियत से खेल रहे हैं। और वह खेल सत्ता नायकों को भी अपने काम का लगा, तो सियासी फसल काटने के लिए लगे हाथ वे भी मुट्ठियां लहराने लगते हैं।

साभार: ट्विटर
साभार: ट्विटर
लेकिन इन सबके बीच में सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या संजय लीला भंसाली देश के मिजाज से अपरिचित हैं?

पद्मावती की पटकथा बुनने वाले को सचमुच ये मालूम नहीं था कि हिंदू रानी और मुस्लिम योद्धा की कहानी इस तरह परोसने के क्या अंजाम होंगे? अच्छा तरह से मालूम था। दरअसल, वे इसके आदती हो चले हैं, स्टंट की तरह।

चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद जानवर को चिढ़ाना कभी-कभी दर्शक को भारी पड़ जाता है। सच पूछिए तो भंसाली, प्रकाश झा और उनके जैसे फिल्म निर्माता-निर्देश इस देश के करोड़ो-करोड़ फिल्म दर्शकों की मासूमियत से खेल रहे हैं। और वह खेल सत्ता नायकों को भी अपने काम का लगा, तो सियासी फसल काटने के लिए लगे हाथ वे भी मुट्ठियां लहराने लगते हैं। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वे देश के मिजाज से अपरिचित हैं? पद्मावती की पटकथा बुनने वाले को सचमुच ये मालूम नहीं था कि हिंदू रानी और मुस्लिम योद्धा की कहानी इस तरह परोसने के क्या अंजाम होंगे? अच्छा तरह से मालूम था। दरअसल, वे इसके आदती हो चले हैं, स्टंट की तरह।

जब से फिल्म 'पद्मावती' को लेकर देश में तूफान मचा हुआ है, कई एक राज्यों के मुख्यमंत्री तक ताल ठोक रहे हैं, ललकार रहे हैं, ऐसे में एक सवाल बार-बार मन में नाच रहा है कि 'पद्मावती' की पटकथा लिखते समय और, फिर उसे फिल्माते समय संजय लीला भंसाली को ऐसे बवंडर का अंदेशा नहीं रहा होगा? क्या वह इतने मासूम हैं कि देश की राजनीतिक दीन दशा से एकदम अनभिज्ञ हैं? इन दोनो प्रश्नों का उत्तर है- नहीं। आज के हालात में भंसाली के पक्ष में चाहे जो भी कहा जाए, एक बात एकदम साफ है कि वह ऐसा जानबूझ कर करते हैं। बल्कि वही नहीं, पिछले कुछ वर्षों से कई एक निर्माता-निर्देशक इस तरह के रिस्क पर काम करने लगे हैं, यहां तक कि आमिर खान जैसे लोग भी। और इसके पीछे उनकी सिर्फ एक मंशा होती है, फिल्म रिलीज होने से पहले ऐसा तूफान खड़ा कर दो कि वह पहले ही पॉपुलर हो जाए, दर्शक सिनेमा हॉलों पर उमड़ पड़ें। ऐसा करना, सीधे-सीधे दर्शकों को धोखा देना होता है। 

लेकिन आज का बाजारवादी गिमिक खेलने के आदती होते जा रहे भंसाली बस इस बार फंस गए हैं। कटिया में चारा तो डाला फिल्म दर्शकों के रूप में मछलियां फंसाने के लिए, मगर कांटा घड़ियाल के गले में जा अटका है और वह उन्हें कटिया समेत दरिया में खींच रहा है। भंसाली बखूबी जानते रहे होंगे कि फिल्म की पटकथा में झूठा इतिहास रचने की आड़ में वह जो मसाला इस्तेमाल कर रहे हैं, उसका असर क्या होगा। दरअसल, होता ये है कि चिड़ियाघर के पिंजरे में बंद जानवर को चिढ़ाना कभी-कभी दर्शक को भारी पड़ जाता है। 

कैटरीना को सोनिया गांधी बनाकर देश की राजनीति से जैसा फूहड़ जोक प्रकाश झा करते हैं, अथवा फिल्म बनाते-बनाते सांसद बनने के लिए खुद चुनाव मैदान में उतर जाते हैं, हार जाते हैं, फिर फिल्म बनाने लगते हैं तो देश का बौद्धिक मिजाज यह अच्छी तरह जानता है कि वह किस स्तर की नौटंकी कर रहे हैं। 'पद्मावती' की पटकथा बुनने वाले भंसाली प्रोडक्शन्स और वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स को क्या पद्मावती की काल्पनिक कहानी ही देश की समस्याओं के हिसाब से सबसे ज्यादा मौजू और जरूरी लगनी चाहिए थी। वह अच्छी तरह जानते हैं कि फिल्म में एक हिंदू रानी और मुस्लिम शासक की कहानी को उकसाने के अंदाज में परोसकर बिना हर्र-फिटकरी फिल्म का प्रमोशन कर लिया जाए। 

वह जानबूझ कर व्यावसायिक लाभ के लिए साम्प्रदायिक संवेदना को हवा देते हैं। जहां तक सिस्टम की खामियों अथवा ऐतिहासिक गलतियों का सवाल है, प्रकाश झा, भंसाली जैसों से ज्यादा ईमानदार तो हमे एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार लगते हैं, कम से कम वह सामने खड़ी जन समस्या और उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर सीधे सीधे उंगली उठाने की हिम्मत तो रखते हैं। भंसाली जैसे खोखले और पैसे के भूखे लोग उकसावे का खेल खेलते हुए अपने करतब को अभिव्यक्ति की आजादी का नाम देते हुए कितने हास्यास्पद हो जाते हैं।

जो इतिहास सम्मत न हो, उसे भी ऐतिहासिक कहानी के रूप में तोड़ मरोड़कर दर्शाना, जानबूझ कर फिल्मों में विवादित दृश्य डालना, रिलीज होने से पहले मीडिया के दड़बों में घुसकर कानाफूसी करना, यह सब क्या है, कोई क्रांतिकारी कदम है क्या, और नहीं तो, सिर्फ मनोरंजन है क्या? नहीं, कत्तई नहीं, यह सीधे-सीधे शरारत है। जनभावनाओं से खेलना है, साथ ही पिछले सत्तर साल से देश की जनभावनाओं से खेल रही राजनीति को प्रकारांतर से लाभ पहुंचाना है। मुझे लगता है, भंसाली अभी चाहे जितने दबाव में हों, वह इस बार तो अपने पहले के सारे रिकार्ड तोड़ते हुए सबसे ज्यादा कामयाब खेल खेलने में सफल होने जा रहे हैं। आज नहीं, तो कल 'पद्मावती' का प्रदर्शन होगा ही, तब देखिए, सिनेमा हॉलों पर किस तरह उन दर्शकों का हुजूम उमड़ता है, जो राजनीति से हजार बार छले जाकर भी मतदान केंद्रों पर सत्तर साल उमड़ता आ रहा है। बेचारा फिल्म दर्शक! बेचारा मतदाता!! 

फिलहाल तो निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' के साथ एकजुटता प्रकट करते हुए फिल्मकार से लेकर फिल्म कर्मियों तक सैकड़ों लोगों ने आज रविवार को 15 मिनट तक शूटिंग रोकने की घोषणा की है। इंडियन फिल्म्स एंड टीवी डायरेक्टर्स एसोसिएशन (आईएफटीडीए) ने कहा है कि देश भर में 19 अन्य फिल्म और टीवी उद्योग के संगठनों के साथ सृजनात्मक क्षेत्र में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की रक्षा के लिए 15 मिनट तक शूटिंग रोकी जाएगी। 

जब घर से लेकर बाजार तक, स्कूल से अदालत तक चारो तरफ राजनीति की माया है तो फिल्मकार उसे भुनाने के लिए आगे भी अपने इस तरह के जादू-मंतर दिखाते रहेंगे। आज जरूरत है, भंसाली जैसे लोगों की शिनाख्त करते हुए उन बौद्धिक शख्सियतों का सामने आना, जिनके आह्वान पर इस तरह के खेल-तमाशों का समय-समय पर शख्ती से पर्दाफाश होता रहे। ताकि आग को हवा देने के लिए राजस्थान के किसी किले में लाश लटकाने तक ड्रामा करने की नौबत आइंदा न आए। 

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पत्रकार/ लेखक/ साहित्यकार/ कवि/ विचारक/ स्वतंत्र पत्रकार हैं। हिन्दी पत्रकारिता में 35 सालों से सक्रीय हैं। हिन्दी के लीडिंग न्यूज़ पेपर 'अमर उजाला', 'दैनिक जागरण' और 'आज' में 35 वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। अब तक हिन्दी की दस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 6 मीडिया पर और 4 कविता संग्रह हैं।

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