IIT, IIM और विदेशों में पढ़ाई कर करोड़ों कमाने वाले गाय पालने के लिए लौटे गांव, किसानों को बताते हैं फायदे

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करोड़ो की कमाई छोड़कर युवा लौट रहे हैं गांव, गायों के सहारे कर रहे हैं गांवों का कायापलट...

देश में ऐसे युवाओं की कमी नहीं जो समाज के लिए कुछ कर गुजरने के लिए सारी सुख सुविधाओं को तिलांजलि दे देते हैं। हम आपको ऐसे दो युवाओं से रु-ब-रु करा रहे हैं जिन्होंने करोड़ों की कमाई को छोड़कर समाज के लिए, किसानों के लिए काम करना शुरू कर दिया है।

1. IIT और IIM से पढ़ाई करने वाले यसबैंक के वायस प्रेसिडेंट गाय पालने गांव लौटे, बेच रहे हैं गाय का दूध 

कुछ दिन पहले की बात है जब जयपुर में सुबह-सुबह लोगों के पास फोन आने शुरु हुए कि आपको गाय का शुद्ध दूध चाहिए तो हम होम डिलवरी कर सकते हैं. साथ ही फोन करनेवाला गाय के दूध की खूबियों के बारे में भी लोगों को समझाता है. शुरू-शुरू में लोगों को अटपटा लगा कि गाय के दूध की होम डिलवरी के लिए कौन फोन करने लगा. दरअसल ये काम करते हैं आईआईटी दिल्ली से बायोकेमिकल इंजीनियरिंग और आईआईएम कोलकत्ता से एमबीए की पढ़ाई करने वाले विज्ञान गड़ोदिया. यस बैंक में वाईस प्रेसिडेंट रहे विज्ञान गड़ोदिया के लिए शुरू से गायें बेहद दिल के करीब थीं. ऐसा किसी धार्मिक आस्था कि वजह से नही बल्कि गांव में दादी-नानी से गाय और उसके दूध की खूबियों के बारे में तो सुने हीं थे, आगे की पढ़ाई करते हुए देखा कि गाय के दूध में अकेले इतनी न्यूट्रिशन वैल्यू है कि देश में कुपोषण के मामले को तो दूर किया ही जा सकता है, गौ पालन को बढ़ावा देकर गांव की अर्थव्यवस्था को भी पूरी तरह बदला जा सकता है. आज अकेले जयपुर में विज्ञान के 250 ग्राहक हैं.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसानों को उनके परंपरागत व्यवसाय में मजबूत करना होगा

विज्ञान जब 2005 में यस बैंक के माईक्रोफाइनेंस ब्रांच को हेड कर रहे थे गांव और किसानों के हालात को बेदह नजदीक से देखा और पाया कि माइक्रोफाइनेंस किसानों की समस्या का हल नही है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसानों को उनके परंपरागत व्यवसाय में मजबूत करना होगा. जुलाई 2006 में विज्ञान ने नौकरी को अलविदा कह और्गेनिक खाद, ग्रामीण बीपीओ जैसे कामों में हाथ आजमाया, लेकिन दिल में हमेशा रहा कि गाय को लेकर ही काम करना है. इसके बाद 2012 इन्होंने जयपुर से 70 किंमी. दूर लिसारिया गांव में 1.72 हेक्टेयर में गाय के दूध की सप्लाई के लिए डेयरी फार्म खोला.


विज्ञान ने योरस्टोरी को बताया, 

"देश में सब जानते हैं कि गाय के दूध में सबसे ज्यादा न्यूट्रिशन्स होता है, पेट में आसानी से पचता भी है. गाय एक ऐसा जानवर है जिसे आप जो खिलाओगे वैसा ही दूध देगी. लेकिन ज्यादा दूध के लिए गांव में लोग भैस पालते हैं. गाय पालते भी हैं तो जर्सी गाय पालते हैं जिसका रख रखाव महंगा पड़ता है. ऐसे में देशी गाय किसानों के लिए सबसे अच्छा है और इसका दूध भी सेहत के लिए अच्छा है."


गांव वाले भी पालने लगे गाय

पिछले चार सालों में विज्ञान के डेयरी फार्म सहज डेयरी में बछड़ों को मिलाकर 150 गाय हो चुकी हैं, मगर अच्छी बात है कि इस वजह से आस-पास के लगभग 25 गांव के किसान गाय पालने लगे हैं. देवराला के सीताराम यादव कहते हैं, 

"हमें विज्ञान को देखकर प्रेरणा मिली. हमने जुलाई 2015 में पहले एक गाय खरीदी, फिर 6 महीने बाद दबसरी गाय खरीदी और अब अपनी तीन भैंस बेचकर 6 गाय खरीदी है और 50 लीटर दूध निकालकर बेचता हूं. इसमें लागत कम और मुनाफा ज्यादा है."


गांवों में खुल रहा है कलेक्शन सेंटर

सहज डेयरी की 50 गाय करीब 500 लीटर दूध देती है और इसके अलावा विज्ञान ने आस पास के गांवों के किसानों से दूध इकट्ठा करने के लिए कलेक्शन सेंटर भी खोल रखा है. सहज डेयरी में देसी गाय के छाछ,मक्खन, दही, घी और आईसक्रिम भी बनाया जा रहा है. देसी गाय पर विज्ञान के तकनीक को देखते हुए राजस्थान सरकार ने भी इनकी कंपनी सहज इनक्लूसिव आपरचुनेटी प्राईवेट लिमिटेड डेयरी एमओयू किया है जहां किसानों को भेजकर ट्रेनिंग कराई जा रही है. इसकी सफलता को देखते हुए आईआईटी दिल्ली से पालिमर इंजीनियरिंग कर पिछले 20 सालों से रिलायंस पालिमोर में नौकरी कर विज्ञान के भाई ने भी नौकरी छोड़कर गांव में विज्ञान के साथ काम करने का फैसला किया है.

अमेरिका से मास्टर्स, 4 करोड़ का भरापूरा बिजनेस छोड़ लोगों की जिंदगी बचाने गांव लौटे. गौमूत्र और गोबर को बनाया अपना हथियार. गाय पालने के लिए लोगों को कर रहे हैं प्रेरित

"जब भी गांव में फोन करता किसी न किसी की मौत की खबर मिलती. पिछले दो सालों में तो घर के हीं तीन लोगों की मौत हो गई फिर सोचा ऐसी जिंदगी जीने से क्या फायदा जहां घरवालों की जान हीं नही बचा पाऊं." 

मुंबई के श्यामलाल कॉलेज से बीटेक और कैलिफोर्निया की सैन जॉस यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रोनिक्स में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद मुंबई में डिपार्टमेंटल स्टोर्स के चेन खोलनेवाले श्रीगंगानगर के रणदीपसिंह कंग को पेस्टीसाइड्स से हुई इन मौतों ने इस कदर झकझोर दिया कि वो सब कुछ छोड़कर अपने गांव लोगों की जिंदगी बचाने चले आए हैं. सालाना चार करोड़ कमानेवाले कंग अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी छोड़कर गोमूत्र, गोबर, केंचुए और नीम से खाद बनाकर गांव वालों को उसे प्रयोग करने के लिए मनाने में लगे हैं. इसलिए कंग परिवार मुंबई से सबकुछ समेट कर अपने घर श्रीगंगानगर आ गया है.


गांव लौटे, गाय को बनाया जिंदगी बचाने का जरिया

रणदीप सिंह कंग को अमेरिका से लौटने के बाद 2006 में मल्टीनेशनल कंपनियों में लाखों के महीने के सैलरी पैकेज मिल रहे थे लेकिन तब उन्होंने बिजनेस की शुरुआत की और मुंबई में पहला डिपार्टमेंटल स्टोर खोला था. फिर एक-एक कर तीन डिपार्टमेंटल स्टोर खोल लिए .डिपार्टमेंटल स्टोर्स सालाना करीब चार करोड़ रुपए का मुनाफा दे रहे थे. जिंदगी मजे में कट रही थी. लेकिन एक बात रणदीप को परेशान करती रहती वो गांव से आती मौत की खबरें. इनका कारण एक ही रहता, कैंसर. वे इसके कारणों के पीछे गए तो पता चला खेतों में अंधाधुंध पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल खेतों और फसलों को जहरीला बना रहा है. जमीन की प्राकृतिक उर्वरता खत्म हो रही है। रणदीप सिंह को शुरु में विश्वास नही हो रहा था कि इस तरह से पेस्टीसाइड्स से कोई मर भी सकता है. लेकिन जब गांव आए तो देखा कि पेस्टीसाइड्स का अंधधुंध प्रयोग हो रहा है और राजस्थान का श्रीगंगानगर का इलाका कैंसर से हो रही मौतों के मामलों में पंजाब के रास्ते पर चल पड़ा है. कंग ने शुरुआत वहीं की जब उर्वरक नही था. जवाब मिला गोबर. लेकिन गोबर अकेले ज्यादा कारगर नही हो रहा था लिहाजा इसमें गौमूत्र और नीम का घोल बनाकर खाद बनाना शुरु किया. साथ हीं गाय पालने की मुहिम भी शुरु करनी पड़ी है.


कंग ने योर स्टोरी को बताया, 

"किसानों को दुकानदार एक ढक्कन पेस्टीसाइड्स डालने को कहता है तो मालिक सोचता है कि दुकानदार ने शायद कम बताई हो इसलिए मजदूर को वो डेढ़ ढक्कन डालने को कहता है, फिर मजदूर सोचता है कि मालिक ने कम ही बताया है वो आधा ढक्कन अपनी तरफ से बढ़ा देता है और फिर वो पेस्टीसाइस की मात्रा दुगनी हो जाती है. साथ ही समय के साथ कीड़ों में सहने की क्षमता बढ़ती जाती. लेकिन देशी तकनीक इतनी प्रभावी है कि खेतों की उर्वरा तो बढ़ाती ही है साथ ही पहले से मौजूद खेतों के जहर को भी खत्म कर रही है. "

गोबर और गौमूत्र पर शुरु किया काम, किसानों को प्रैक्टिकल फायदे दिखाए

अब रणदीप को दिशा मिल गई थी. उन्होंने यही काम अपने गांव के किसानों के लिए करने की ठान ली. 2012 में बिजनेस समेटकर श्रीगंगानगर गए. श्रीकरणपुर के अपने 100 बीघा के खेत को ही प्रयोगशाला बना डाला। डेयरी से गोमूत्र इकठ्ठा करते. उसमें आक, नीम, तूंबा, लहसुन का मिश्रण कर उबालने के बाद बोतलों में भर लेते और किसानों को समझाने गांव-गांव निकल पड़ते. किसानों पर पढ़े-लिखे रणदीप की बातों का असर होना शुरू हुआ. किसानों ने खेतों में जैविक उर्वरक प्रयोग किए और फायदे दिखे तो बात को मान गए. रणदीप कहते हैं कि 

"हालांकि यह काम आसान नहीं था लेकिन खुद साधन-संपन्न होने के कारण वे यह कर पाए. सबसे बड़ी बात है कि किसानों को गाय पालने के लिए तैयार करना पड़ रहा है. जबतक हर किसान गाय नही पालेगा इतनी बड़ी मात्रा में गौमूत्र और गोबर कहां से आएगा"


गोमूत्र में 16 प्रकार के पोषण, पौधों को 14 ही चाहिए

रणदीपके अनुसार गोमूत्र में 16 प्रकार के न्यट्रिशंस होते हैं जबकि पौधों को 14 प्रकार के ही चाहिए होते हैं. गोमूत्र फंगस और दीमक को खत्म करता है और पोषण बढ़ाता है. इसके बाद किसी प्रकार की खाद की जरूरत नहीं होती। फिर, कृत्रिम पेस्टीसाइड्स डाले गए खेत में जहां 2-3 दिन में पानी देने की जरूरत होती है वहीं गोमूत्र पेस्टीसाइड्स वाले खेत में 7-8 दिन से पानी देना पड़ता है. इस कसरत का एक पहलू और है. रणदीप अब एक गौशाला से प्रतिदिन 500 लीटर गोमूत्र 5 रुपए लीटर के भाव से खरीद रहे हैं. इससे उस गौशाला को दान पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही.

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पिछले सात सालों से पत्रकारिता से जुड़ी हूं. व्यक्तिगत सफलता और सामाजिक बदलाव की कहानियां लिखती हूं जिसका मकसद समाज और देश में बदलाव लाना रहता है. राजस्थान से प्रकाशित पाक्षिक Changing Tomorrow अखबार के हिंदी पृष्ठ पर दो साल से नियमित तौर पर सामाजिक सरोकार से जुड़ी कहानियां लोगों तक पहुंचाती हूं. राजस्थान में आमलोग और खासकर महिलाएं अपनी तरह से विकास और बदलाव के के नए आयाम लिख रहे हैं इनकी कहानियां लोगों के प्रेरणा देने और संघर्ष के लिए हौसला देने का काम करती है और मेरी कोशिश होती है कि ये कहानियां कभी भी अनकही ना रहे.

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