2050 तक एड्स से मुकाबला

विकासशील देशों में 52 लाख से ज़्यादा लोग एड्स वायरस के ख़तरनाक प्रभाव को खत्म करने वाली ज़रूरी दवाओं का सेवन करते हैं। जबकि 1.48 करोड़ से ज़्यादा लोगों को इनकी ज़रूरत है। विश्व के पिछड़े और ग़रीब देशों को बहुत पहले ही आगाह किया जा चुका है, कि वे एचआईवी/एड्स पर किये जाने वाले खर्चों में बढ़ोत्तरी करें।

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"एचआईवी का इलाज दशकों से शोधकर्ताओं को परेशान कर रहा है। एचआईवी की खोज में मदद करने वाली वर्ष 2008 की नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रैंकायस बरे सिनौसी ने दावा किया था, कि वैज्ञानिक एड्स के स्थायी इलाज के निकट पहुंच रहे हैं। 2050 तक एड्स को समाप्त किया जा सकता है।"

"इस समय दुनिया में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग एचआईवी से ग्रस्त हैं। इन दिनों भारत में लगभग 24 लाख के आसपास व्यक्ति एचआईवी/एड्स से पीड़ित हैं। और संभावित रोगियों की संख्या भी लाखों में है।" 

एड्स के इलाज में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सुस्ती मुख्य बाधा है। अॉस्ट्रेलिया और कनाडा की सरकारों के समर्थन से एड्स का इलाज खोजने में जुटी वैज्ञानिकों की इंटरनेशनल टीम ने कुछ साल पहले यह दावा किया था, कि एक जेनेटिक तरीके से शरीर एचआईवी वायरस से मुक्त हो सकता है, जिसका उन्होंने चूहों पर एक्सपेरिमेंट भी किया और वे कामयाब रहे। चूहे में एचआईवी का उसी तरह संक्रमण होता है, जैसे मनुष्य में। चूहों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षित स्तर तक बढ़ाने में कामयाबी मिली थी। शरीर में एचआईवी के इन्फेक्शन के बाद सर्वाधिक सक्रिय रहने वाला जीन रडउर-3 इस प्रयोग के केंद्र में रहा। टीम के सीनियर डॉ. ने हेपेटाइटिस बी, सी और टीबी के भी इलाज की संभावनाएं जताईं। वैज्ञानिकों ने आईएल-7 नामक हार्मोन का स्तर बढ़ाया तो रडउर-3 जीन ने काम करना बंद कर दिया और चूहे ने धीरे-धीरे एचआईवी वायरस को शरीर से बाहर कर दिया।

कुछ समय पहले ही वैज्ञानिकों को एक और बड़ी कामयाबी मिली थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था, कि आदमी की स्टेम कोशिकाओं में जेनेटिक तौर पर ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं, कि वे एक जीवित प्राण में एचआईवी इफेक्टिड कोशिकाओं को खोज सकें और उनका खात्मा कर सकें। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में आदमी के रक्त से स्टेम की इंजीनियरिंग की गई तो पता चला कि ऐसे सेल डेवलप किए जा सकते हैं, जो उन टिश्यूज को निशाना बनाएंगे जिनमें एचआईवी वायरस रहते हैं। यूनिवर्सिटी अॉफ मेलबर्न के वैज्ञानिक मैरिट क्रामस्की ने एक अन्य रिसर्च में इस बात का दावा किया था, कि गाय के दूध से तैयार विशेष प्रकार की क्रीम एचआईवी से सुरक्षित रख सकती है। उनके अनुसार, जब गर्भवती गाय को एचआईवी प्रोटीन का इंजेक्शन दिया तो उसने उच्च स्तर की रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला दूध दिया। यह क्रीम महिलाओं को एचआईवी से संक्रमित होने से बचा सकती है। चिकित्सा में प्रयोग के लिए इस क्रीम की उपलब्धता में अभी कई साल लग सकते हैं।

कुछ वैज्ञानिकों ने तो ये दावा भी किया है कि केले में पाया जाने वाला प्रोटीन एचआईवी दवाओं की तरह ही प्रभावी होता है, जिसका एचआईवी संक्रमण के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। एचआईवी टेस्ट किट के बारे में तो आपने सुना ही होगा, जिसे अमेरिका कुछ साल पहले ही मंजूरी दे चुका है। ओराक्विक इन होम एचआईवी टेस्ट नाम एस किट में व्यक्ति के मुंह की लार के नमूने को उसमें लगी शीशी में डाला जाता है। इस जांच के परिणाम लगभग तीस मिनट में मिल जाते हैं।

"द सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रीवेंशन का अनुमान है कि अमेरिका में करीब 12 लाख से ज्यादा लोग एचआईवी से पीड़ित हैं और प्रत्येक पांच में से एक व्यक्ति को यह बात मालूम भी नहीं है कि वह रोग से पीड़ित है। देश में एचआईवी के करीब 50 हज़ार नये मामले हर साल सामने आ रहे हैं।"

कुछ समय पहले लंदन से प्रसारित एक ताज़ा शोध से यह बात सामने आई थी, कि एचआईवी पीड़ितों के लिए इंटिग्रेस आई सेफ नामक एक ऐसी दवा तैयार की गई थी जिसमें चार दवाएं मिश्रित हैं। उस दवा को दिन में चार बार लेने की बजाए सिर्फ एक बार लेना होगा। शोधकर्ताओं और दवा निर्माताओं ने कई दवाओं को मिलाकर उस दवा का निर्माण किया था। 700 से अधिक एचआईवी पीड़ित रोगियों का इलाज कर चुके हार्वड मेडिकल स्कूल के एसोसिएट प्रोफेसर पॉल सैक्स का कहना है, कि एचआईवी रोगियों को दवा पर सबसे ज्यादा भरोसा रहता है, लेकिन यदि उसकी एक खुराक भी छूट जाये तो संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कई ऐसी दवाएं अब भी मौजूद हैं, जो काफी सुरक्षित और असरकारी हैं, लेकिन उनके सेवन से किडनी के प्रभावित होने का खतरा बना रहता है।

एचआईवी का इलाज दशकों से शोधकर्ताओं को परेशान कर रहा है। एचआईवी की खोज में मदद करने वाली वर्ष 2008 की नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रैंकायस बरे सिनौसी ने दावा किया था, कि वैज्ञानिक एड्स के स्थायी इलाज के निकट पहुंच रहे हैं और 2050 तक एड्स को समाप्त किया जा सकता है। शोधकर्ता, दवा निर्माता, डॉक्टर्स और वैज्ञानिक पूरी तरह से एचआईवी वायरस को खत्म करने की दवा के निर्माण में दिन-रात लगे हुए हैं। वे जिस तरह से शोध कर रहे हैं, उसे देखकर तो यही लग रहा है, कि आज नहीं तो कल और कल नहीं 2050 तक ऐसी कोई न कोई दवा ज़रूरी बन जायेगी जो एचआईवी/एड्स जैसी जानलेवा बीमारी को पूरी तरह खत्म करने में कारगर साबित होगी।

"हर पल में एक कहानी है और हर कहानी में अनगिनत पल... चलो उन अनगिनत पलों को एक साथ जोड़कर कोई कहानी गढ़ते हैं..."

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