छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों मे रहने वाले युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये प्रशिक्षित करते डा. फरमान अली

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डा. फरमान अली नें दिल्ली में अच्छी तनख्वाह वाली एक शिक्षक की नौकरी छोड़कर राजस्थान के एक छोटे से शहर में एक कोचिंग सेंटर की नींव डाली और कभी मात्र 2 छात्रों के साथ प्रारंभ हुआ उनका यह कोचिंग सेंटर आज 50 से भी अधिक कर्मचारियों की मदद से 3500 छात्रों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहा है।

दिल्ली के सुप्रसिद्ध जामिया मिलिया इस्लामिया से हिंदी में परस्नातक (एमए) करने के बाद फरमान अली ने पीएचडी पूरी की और फिर उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू काॅलेज में छात्रों को पढ़ाना प्रारंभ कर दिया। इसके अलावा उन्होंने छात्रों को पढ़ाने के लिये राजस्थान विश्वविद्यालय का भी रुख किया। हालांकि वे इस सम्मानजनक नौकरी से काफी खुश और संतुष्ट थे लेकिन समाज के लिये कुछ करने की इच्छा और अपने से कुछ बड़ा करने की लालसा उन्हें हमेशा कुछ नया करने के लिये प्रेरित करती। ऐसे में उन्होंने अपने गृहनगर अलवर वापस जाने और एक कोचिंग सेंटर खोलने का निश्चय किया।

डा. फरमान, एक उद्यमी

फरमान अलवर जैसे इलाके में शिक्षा के क्षेत्र से संबंधित तमाम परेशानियों और चुनौतियों से भली-भांति परिचित थे। वे खुद ऐसे कई छात्रों को व्यक्तिगत तौर पर जानते थे जो बेहद प्रतिभाशाली होने के साथ जीवन में आगे बढ़ने के इच्छुक थे लेकिन अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के दौर में वे देश के बाकी हिस्सों के प्रतिभागियों से प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते थे। नतीजतन ऐसे छात्र या तो अलवर और आसपास के इलाकों में छोटी-मोटी नौकरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहे थे या फिर उन्होंने पढ़ाई को छोड़ दिया था। फरमान ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों के लिये कुछ सकारात्मक करना चाहते थे।

फरमान ने वर्ष 2009 में अपनी नौकरी को अलविदा कहा और अलवर में राजस्थान इंस्टीट्यूट की नींव डाली। उन्हें अपने पूरे परिवार का भरपूर समर्थन मिला, विशेषकर उनके पिता ने उन्हें अपनी योजनाओं के साथ कदम आगे बढ़ाने के लिये बहुत अधिक प्रोत्साहित किया। फरमान दावा करते हैं कि अलवर में रहने वाले अधिकतर लोग अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं और जिन चुनिंदा लोगों ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफलता पाई है उन्होंने शहरों का रुख करते हुए अपने लिये एक बेहतर भविष्य चुनने को प्राथमिकता दी। ऐसे में जब उन्होंने अपनी आकर्षक नौकरी के छोड़कर घर वापसी का निर्णय किया तो उनका मजाक बनाने वालों की भी कोई कमी नहीं थी।

फरमान अपने गृहनगर के युवा छात्रों के जीवन में सुधार लाने के लिये दृढ़संकल्प थे। उन्हें अपनी यह यात्रा प्रारंभ करने के लिये मात्र 2 छात्र ही मिले लेकिन जल्द ही लोगों के बीच उनकी ख्याति फैली और अधिक छात्र इनके पास आए। अपने लिये एक बेहतर भविष्य की आस लगाए दूरदराज के गांवों के लड़के और लड़कियां इनके इंस्टीट्यूट में दाखिला लेने लगे। अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और मौखिक प्रशंसा और प्रचार के बल पर बहुत ही जल्द राजस्थान इंस्टीट्यूट अलवर के छात्रों के बीच एक जाना-माना नाम बन गया।

आज 3500 छात्र उनके इस इंस्टीट्यूट का हिस्सा हैं और वे यहां पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। वर्तमान में इनके केंद्र में 20 शिक्षक और 32 गैर-शिक्षण कर्मचारी कार्यरत हैं। कभी इनके यहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके छात्र वर्तमान में राज्य और केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं में कार्यरत होने के अलावा प्रशासनिक सेवाओं, शैक्षणिंक संस्थानों और पुलिसबल इत्यादि में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनके यहां नाममात्र की फीस ली जाती है जो छोटे शहरों के परिवारों के बजट के हिसाब से है। डा. फरमान अली याॅरस्टोरी को बताते हैं, ‘‘राजस्थान के रहने वाले कई बच्चों के पिता भारतीय सेना के साथ कार्यरत हैं जिनमें से कई तो देश के लिये अपनी जान तक कुुर्बान कर चुके हैं। हम उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये ऐसे शहीदों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते हैं। इसके अलावा हम विधवाओं के बच्चों को भी निःशुल्क कोचिंग की सुविधा देते हैं। साथ ही विभिन्न अक्षमताओं से जूझ रहे छात्रों की मदद के लिये भी हमारे पास विस्तृत योजनाएं हैं।’’

एक सामाजिक कार्यकर्ता

इसके अलावा फरमान अलवर में कला, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों के लिये भी एक संरक्षक भूमिका का भी निर्वहन कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे अलवर मेें प्रतिवर्ष रामलीला का आयोजन करने वाले समूह का एक हिस्सा भी हैं और प्रतिवर्ष रामलीला के मंचन से पूर्व होने वाली पहली पूजा भी उनके ही हाथों से संपन्न होती है। वे अलवर और आसपास के गांवों के निरंतर चक्कर लगाते हैं और बच्चों और उनके माता-पिता का मार्गदर्शन करते हैं।

उन्होंने बीते कई वर्षों में अलवर और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के साथ अपना जीवन का अधिकतर समय व्यतीत किया है। इस दौरान वे स्थानीय लोगों के बीच शिक्षा की अलख जगाने और उन्हें शिक्षा के आवश्यकता के बारे में समझाने के अलावा बच्चों और उनके अभिभावकों को बेहतर भविष्य को लेकर समझाने में व्यस्त रहे हैं। इसके अलावा वे स्थानीय स्कूलों और कुछ एनजीओ के साथ मिलकर लगातार अपने प्रयासों में लगे हैं और वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि शिक्षा सिर्फ कुछ समृद्ध लोगों की पहुंच में ही बंधकर न रह जाए।

फरमान के अलावा उनकी जीवनसंगिनी भी अलवर के लोगों के उत्थान के मद्देनजर आयोजित होने वाली सामाजिक गतिविधियों का एक सक्रिय हिस्सा रहती हैं। उनकी पत्नी गांवों के निरंतर दौरे कर महिलाओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरुक करती रहती हैं। उनके दरवाजे हमेशा उन महिलाओं के लिये खुले रहते हैं जो शर्म के चलते बीमारी के समय में भी डाॅक्टर के पास जाने से हिचकते हैं या फिर जो चिकित्सा सुविधाओं के बारे में जानते ही नहीं हैं या फिर इलाज का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं।

एक सार्थक जीवन

फरमान ने अबतक अलवर और उसके लोगों के लिये किये गए अपने कामों के लिये किसी से भी किसी भी प्रकार की मदद नहीं ली है। वे राजस्थान इंस्टीट्यूट से प्राप्त होने वाले पैसे के दम पर ही ये सारे काम कर रहे हैं। वे एक बहुत ही व्यस्त जीवन जी रहे हैं लेकिन उसमें भी उन्होंने अर्थ खोज ही लिया है। वे प्रतिदिन सुबह-सवेरे ही अपने घर से निकलकर 12 घंटों के लिये छात्रों को पढ़ाते हैं और उसके बाद देर रात तक घर पहुंचने से पहले आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों को बच्चों को शिक्षित करने के महत्व के बारे में बताने में लगे रहते हैं। यहां तक कि वे अपनी छुट्टियां भी ग्रामीण बच्चों के साथ ही बिताते हैं।

फरमान का मानना है कि, ‘‘शिक्षा हमारी तमाम परेशानियों का इकलौता समाधान है। अगर भारत को एक बेहतर देश बनना है तो हम सबको मिलकर काम करना होगा और देशभर के प्रत्येक गांव और शहर में शिक्षा का प्रकाश फैलाने के लिये कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। ऐसा करना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि यह हमसब शिक्षित नागरिकों की भी जिम्मेदारी है।’’

एक ऐसे समाज में जहां शिक्षा के क्षेत्र में फैली खाई आसानी से देखी जा सकती है, जहां निजी शिक्षा सिर्फ चुनिंदा पैसेवालों के कब्जे में है और पब्लिक स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की बेहद कमी है वहां फरमान का दृष्टिकोण और उनके द्वारा किया जा रहा प्रयास वास्तव में उल्लेखनीय है। हाशिये पर रहने वालों के दरवाजे पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध्ध करवाने की उनकी लड़ाई ऐसे परिवारों के सामने अवसरों के नए द्वार खोलने में मददगार साबित होगी। हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में और अधिक उद्यमी उनके नक्शदम पर चलेंगे।

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Worked with Media barons like TEHELKA, TIMES NOW & NDTV. Presently working as freelance writer, translator, voice over artist. Writing is my passion.

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