इस कॉलेज के स्टूडेंट्स ने समझी अन्न की कीमत, खुद के खाने के लिए उगाया चावल

कॉलेज के लगभग 200 छात्रों ने शहर के किनारे बसे गांव कोनाजे में धान की फसल उगाई... 

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 मंगलौर के डॉ. पी दयानंद पई और सतीश पई गवर्नमेंट कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर अपने खाने के लिए चावल उगाया है। बीते बुधवार को जब छात्रों को भोजन मिला तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि जो खाना वे खा रहे थे उसमें उनकी भी मेहनत थी....

खेत में काम करते छात्र (तस्वीरें साभार- न्यूजमिनट)
खेत में काम करते छात्र (तस्वीरें साभार- न्यूजमिनट)

कैसा हो अगर हर नागरिक को पता हो कि वह जो अन्न खा रहा है उसे उगाने में किसान की कितनी मेहनत लगी है। अक्सर बड़े शहरों में लोग खेती-किसानी से अनजान होते हैं। यही वजह है कि अन्न की काफी बर्बादी होती है। लेकिन मंगलौर के डॉ. पी दयानंद पई और सतीश पई गवर्नमेंट कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर अपने खाने के लिए चावल उगाया। बीते बुधवार को जब छात्रों को भोजन मिला तो उन्हें खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि जो खाना वे खा रहे थे उसमें उनकी भी मेहनत थी। कॉलेज के लगभग 200 छात्रों ने शहर के किनारे बसे गांव कोनाजे में धान की फसल उगाई थी। ग्राम पंचायत ने भी छात्रों की मदद की थी।

बीते साल 15 अगस्त के मौके पर इस कार्य की शुरुआत हुई थी। ये सभी छात्र राष्ट्रीय सेवा योजना का हिस्सा भी हैं। डीपीएसपी गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिसिंपल राजशेखर हेब्बर ने कहा, 'हमें ये महसूस हुआ कि हमारे स्टूडेंट्स को इस बात का आइडिया ही नहीं है कि उनके लिए जो खाना आता है उसके पीछे किसान की कितनी मेहनत लगी होती है। इसलिए हमने उन्हें खेती से रूबरू कराने और उनके भीतर किसान के प्रति प्यार जगाने के लिए यह फैसला किया।' द न्यूजमिनट के मुताबिक यह प्रॉजेक्ट बीते साल अगस्त में शुरू हुआ था जिसकी फसल अब अन्न में तब्दील हुई है। खेती के लिए कोनाजे गांव की 6 एकड़ जमीन को चिह्नित किया गया था।

खेत में छात्रों ेक साथ टीचर्स (फोटो साभार- सोशल मीडिया)
खेत में छात्रों ेक साथ टीचर्स (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

यह जमीन काफी लंबे समय से परती पड़ी थी। इसकी देखरेख पास के एक चर्च प्रबंधन द्वारा की जा रही थी लेकिन वे फसल उगाने में असमर्थ थे। एनएसस के कोऑर्डिनेटर नवीन कोनाजे और जेफरी रोड्रिग्यूज ने इस अभियान का नेतृत्व किया। उन्होंने कहा, 'हमारी तरफ से देश के किसानों को सैल्यूट करने की एक कोशिश भर है।' नवीन ने स्टूडेंट्स का गांव वालों से परिचय भी कराया। गांव वालों ने भी स्टूडेंट्स की पूरी मदद की। छात्रों ने सबसे पहले खेत को साफ किया और वहां उग आईं झाड़ियों को भी हटाया। इसके लिए हर रविवार को सभी स्टूडेंट्स एकजुट होकर खेत में जाकर काम करते थे। सिर्फ 12 दिनों में खेत धान रोपने लायक हो गया।

लेकिन धान की फसल सिर्फ 4 एकड़ में ही रोपी गई। बाकी की जमीन पर दूसरी फसल और पेड़ लगाए गए। इस काम में लड़कियां भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं हालांकि कुछ स्टूडेंट्स शुरू में खेत में जाने से डर रहे थे क्योंकि उन्हें शरीर में मिट्टी लग जाने का डर था। एक छात्रा निक्षिता ने कहा, 'मैंने इससे पहले कभी खेत में काम नहीं किया था। लेकिन खेत में काम करके हम सभी को काफी मजा आया।' उसने कहा कि हममें से कई लोग हाथ गंदे होने के डर से खेत नहीं जा रहे थे, लेकिन एक बार खेत में जाकर सभी की झिझक दूर हो गई। सभी छात्रों को खेत में काम करने के लिए 17 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी। इतना ही नहीं छात्रों ने गांव वालों के पास जाकर उन्हें कई सारे मुद्दों पर जागरूक करने का भी प्रयास किया।

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